गौतम चौधरी
मध्य पूर्व की राजनीति में इज़रायल का सवाल लंबे समय से सबसे संवेदनशील और जटिल मुद्दों में से एक रहा है। 1948 में प्ेतंमस की स्थापना के बाद अधिकांश अरब और मुस्लिम देशों ने इसे मान्यता देने से इनकार कर दिया था। इसका मुख्य कारण फ़िलिस्तीन का प्रश्न, क्षेत्रीय संघर्ष और अरब जगत की सामूहिक राजनीतिक स्थिति थी। हालांकि समय के साथ कुछ मुस्लिम देशों ने अपने राष्ट्रीय हितों, कूटनीतिक रणनीतियों और बदलते वैश्विक समीकरणों को देखते हुए इज़रायल के साथ संबंध स्थापित किए।
इतिहास के अनुसार, Turkey इज़रायल को मान्यता देने वाला पहला मुस्लिम बहुल देश था। 28 मार्च 1949 को तुर्की ने आधिकारिक रूप से इज़रायल को मान्यता दी। उस समय तुर्की पश्चिमी देशों के साथ अपने रणनीतिक संबंध मजबूत कर रहा था और अंतरराष्ट्रीय राजनीति में एक अलग संतुलन बनाना चाहता था। इसलिए उसने इज़रायल के साथ राजनयिक संबंध स्थापित करने का निर्णय लिया।
अरब देशों में लंबे समय तक इज़रायल को मान्यता देने का कड़ा विरोध रहा। लेकिन 1979 में एक ऐतिहासिक मोड़ आया जब म्हलचज ने इज़रायल के साथ शांति समझौता कर लिया। यह समझौता Camp David Accords के बाद संभव हुआ, जिसमें मिस्र के राष्ट्रपति Anwar Sadat, इज़रायल के प्रधानमंत्री Menachem Begin और अमेरिका के राष्ट्रपति Jimmy Carter की महत्वपूर्ण भूमिका रही। इस समझौते के बाद Egypt–Israel Peace Treaty पर हस्ताक्षर हुए। इसके तहत Sinai Peninsula को मिस्र को वापस लौटा दिया, जिसे उसने Six-Day War (1967) के दौरान कब्जे में लिया था। हालांकि इस फैसले के कारण मिस्र को तत्काल अरब देशों की नाराज़गी का सामना करना पड़ा और कुछ समय के लिए उसे Arab League से निलंबित भी कर दिया गया।
मिस्र के बाद धीरे-धीरे कुछ अन्य देशों ने भी इज़रायल के साथ संबंध स्थापित किए। 1994 में Jordan ने इज़रायल के साथ शांति समझौता किया और राजनयिक संबंध स्थापित किए। इसके कई दशक बाद, 2020 में मध्य पूर्व की कूटनीति में एक और बड़ा बदलाव देखने को मिला जब तथाकथित “अब्राहम समझौतों” के तहत United Arab Emirates, Bahrain, Morocco और Sudan ने भी इज़रायल के साथ संबंध सामान्य करने की घोषणा की।
इज़रायल को मान्यता देने के पीछे हर देश के अपने रणनीतिक और आर्थिक कारण रहे हैं। कुछ देशों ने सुरक्षा सहयोग और तकनीकी साझेदारी को ध्यान में रखते हुए यह कदम उठाया, जबकि कुछ ने अमेरिका और पश्चिमी देशों के साथ अपने संबंधों को मजबूत करने के लिए ऐसा किया। फिर भी यह भी सच है कि आज भी कई मुस्लिम देश ऐसे हैं जो फ़िलिस्तीन के मुद्दे के समाधान तक इज़रायल को मान्यता देने के पक्ष में नहीं हैं।
इज़रायल को मुस्लिम देशों द्वारा मान्यता देने का इतिहास केवल कूटनीतिक फैसलों की कहानी नहीं है, बल्कि यह मध्य पूर्व की बदलती राजनीति, वैश्विक शक्ति संतुलन और राष्ट्रीय हितों के टकराव का प्रतिबिंब भी है। तुर्की से शुरू हुई यह प्रक्रिया मिस्र, जॉर्डन और हाल के वर्षों में कुछ खाड़ी देशों तक पहुंच चुकी है। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या यह प्रक्रिया आगे बढ़ती है या क्षेत्रीय संघर्ष इसे फिर से जटिल बना देता है।

बहुत सुंदर । मध्य पूर्व में आपकी पकड़ क़ाबिले तारीफ़ है