गौतम चौधरी
समकालीन बौद्धिक विमर्श में “उत्तर आधुनिकता” को लेकर बहसें जितनी तीखी हैं, उतनी ही उलझी हुई भी। कुछ आलोचक इसे पश्चिमी-विशेषकर अमेरिकी, सांस्कृतिक प्रभुत्व का औज़ार मानते हैं लेकिन कुछ चिंतक इसे मानवीय सभ्यता के विकास की एक सहज अभिव्यक्ति मानते हैं। ये दोनों तर्क आपसे में इतने उलझे हुए हैं कि निर्णय करना आसान नहीं है। कुछ चिंतक तो यहाँ तक कह देते हैं कि यह विचारधारा अमेरिका की “सांस्कृतिक हीनभावना” की उपज है। यह तर्क पहली नज़र में आकर्षक लगता है, परंतु क्या यह ऐतिहासिक और दार्शनिक कसौटियों पर खरा उतरता है? यही वह प्रश्न है, जो गंभीर विवेचन की मांग करता है।
सबसे पहले, अमेरिका को “संस्कृति-विहीन” मानने की धारणा पर विचार करना आवश्यक है। वस्तुतः अमेरिका एक प्रवासी समाज रहा है, जहाँ विभिन्न महाद्वीपों से आए समुदायों ने अपनी-अपनी परंपराओं को मिलाकर एक बहुलतावादी सांस्कृतिक संरचना विकसित की। इसके साथ ही वहाँ के मूल निवासियों की परंपराएँ भी इस सांस्कृतिक ताने-बाने का अभिन्न हिस्सा हैं। ऐसे में अमेरिका को “बिना संस्कृति” कहना न केवल अतिरंजना है, बल्कि उसकी जटिल सामाजिक संरचना की अनदेखी भी।
हालाँकि, यह भी उतना ही सत्य है कि अमेरिकी इतिहास का एक पक्ष गहरे हिंसक अनुभवों से जुड़ा है। उपनिवेशवाद के दौरान मूल निवासियों का व्यापक विस्थापन और विनाश हुआ। यह ऐतिहासिक तथ्य किसी भी प्रकार के महिमामंडन से परे है। फिर भी, यह कहना कि अमेरिका केवल अपराधियों द्वारा बसाया गया था, इतिहास को एकांगी रूप में देखने जैसा होगा। वहाँ धार्मिक शरणार्थियों, व्यापारियों और अवसर की तलाश में गए लाखों लोगों की भी समान भागीदारी रही है। इतिहास की यही जटिलता उसे सरल निष्कर्षों से बचाती है।
अब प्रश्न उठता है कि उत्तर आधुनिकता की उत्पत्ति कहाँ से हुई। इसे सीधे अमेरिकी मानसिकता से जोड़ना तथ्यात्मक रूप से कमजोर प्रतीत होता है। उत्तर आधुनिक चिंतन के प्रमुख प्रवर्तक यूरोप, विशेषकर फ्रांस से जुड़े थे और इसका विकास द्वितीय विश्व युद्ध के बाद की वैचारिक परिस्थितियों में हुआ। उस दौर में “प्रगति”, “विज्ञान” और “सार्वभौमिक सत्य” जैसे आधुनिकतावादी दावों पर गहरे प्रश्न उठे। सत्ता, भाषा और ज्ञान के संबंधों की नई व्याख्याएँ सामने आईं, और बड़े वैचारिक आख्यानों के प्रति संदेह का भाव विकसित हुआ।
फिर भी, यह आलोचना क्यों बनी रहती है कि उत्तर आधुनिकता पश्चिमी प्रभुत्व का औज़ार है? इसका उत्तर इसके अंतर्निहित दृष्टिकोण में छिपा है। जब कोई विचारधारा “सत्य” को सापेक्ष बना देती है और व्यापक वैचारिक परियोजनाओं पर संदेह प्रकट करती है, तो यह आशंका स्वाभाविक है कि कहीं यह प्रतिरोध की राजनीति को कमजोर न कर दे। इसी कारण कुछ चिंतक इसे पूँजीवादी संरचनाओं के अनुकूल मानते हैं।
इन परस्पर विरोधी तर्कों के बीच एक संतुलित दृष्टिकोण ही सबसे अधिक उपयोगी सिद्ध होता है। न तो अमेरिका का इतिहास एकरूप है, और न ही उत्तर आधुनिकता किसी एक राष्ट्र की मानसिकता का प्रतिफल। यह एक जटिल बौद्धिक प्रवृत्ति है, जिसका उपयोग सत्ता-संरचनाओं की आलोचना के लिए भी किया जा सकता है और, अति होने पर, सत्य को धुंधला करने के लिए भी।
अंततः यह स्पष्ट है कि इतिहास और विचारकृदोनों को सरल, भावनात्मक या एकरेखीय दृष्टिकोण से समझना भ्रामक हो सकता है। आवश्यकता इस बात की है कि हम आलोचनात्मक विवेक को बनाए रखें, परंतु उसे अंतिम सत्य का दर्जा न दें। संतुलित और तर्कसंगत विश्लेषण ही हमें उन गहरी जटिलताओं तक ले जा सकता है, जहाँ इतिहास और विचार वास्तव में एक-दूसरे से संवाद करते हैं।
