पश्चिम एशिया का संकट : सैन्य उपप्रमुख की चेतावनी, “हार्ड पावर” की वापसी और भारत की दुविधा

पश्चिम एशिया का संकट : सैन्य उपप्रमुख की चेतावनी, “हार्ड पावर” की वापसी और भारत की दुविधा

दुनिया एक बार फिर ऐसे मोड़ पर आकर खड़ी हो गयी है जहाँ कूटनीति की भाषा के समानांतर सैन्य शक्ति की विकृत और तेज प्रतिध्वनि सुनाई देने लगी है। पश्चिम एशिया में बढ़ता तनाव, रूस-यूक्रेन युद्ध की लंबी छाया, चीन-ताइवान गतिरोध और ड्रोन-साइबर युद्ध की नई तकनीकों ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति का चरित्र बदल दिया है। ऐसे समय में भारतीय सेना के उप प्रमुख, लेफ्टिनेंट जनरल राजीव घई का यह कहना कि “हार्ड पावर” फिर प्रमुख रणनीति बनती जा रही है और सैन्य टकराव का खतरा बढ़ रहा है, केवल एक सैन्य टिप्पणी नहीं बल्कि बदलते वैश्विक यथार्थ की गंभीर चेतावनी है।

भारत के लिए यह चिंता इसलिए अधिक महत्वपूर्ण है क्योंकि पश्चिम एशिया उसके आर्थिक, सामरिक और कूटनीतिक हितों का केंद्र है। भारत की ऊर्जा सुरक्षा का बड़ा हिस्सा इसी क्षेत्र पर निर्भर है। खाड़ी देशों में करोड़ों भारतीय काम करते हैं और वहाँ से आने वाला विदेशी मुद्रा प्रवाह भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। यदि क्षेत्रीय संघर्ष और गहराता है, होर्मुज जलडमरूमध्य प्रभावित होता है या तेल आपूर्ति बाधित होती है, तो उसका सीधा असर भारत की महँगाई, विकास दर और सामाजिक स्थिरता पर पड़ सकता है।

यही कारण है कि भारत आधिकारिक स्तर पर लगातार संयम, संवाद और कूटनीतिक समाधान की बात कर रहा है। लेकिन इसी बीच विपक्ष द्वारा लगाए जा रहे आरोप राजनीतिक विमर्श को एक नई दिशा दे रहे हैं। इधर विपक्ष का आरोप है कि अमेरिका के बढ़ते प्रभाव में भारत की विदेश नीति पश्चिम एशिया में एक ऐसे ध्रुव की ओर झुक रही है जो भविष्य में उसे ईरान विरोधी सैन्य रणनीति के निकट ले जा सकता है।

इन आरोपों को पूरी तरह निराधार कह देना भी जल्दबाज़ी होगी और उन्हें स्थापित तथ्य मान लेना भी उतना ही अनुचित होगा। यह सच है कि पिछले एक दशक में भारत और अमेरिका के बीच रक्षा सहयोग अभूतपूर्व रूप से बढ़ा है। QUAD, इंडो-पैसिफिक रणनीति, रक्षा समझौते और तकनीकी साझेदारियाँ इस निकटता को स्पष्ट करती हैं। इज़रायल के साथ भी भारत के सुरक्षा संबंध पहले से कहीं अधिक गहरे हुए हैं। दूसरी ओर, भारत ने रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान पश्चिमी दबाव के बावजूद स्वतंत्र रुख अपनाकर यह भी दिखाया है कि वह पूरी तरह किसी एक वैश्विक ध्रुव का हिस्सा नहीं है। ईरान के साथ चाबहार परियोजना और क्षेत्रीय संपर्क बनाए रखना भी इसी रणनीतिक संतुलन का हिस्सा है।

इसलिए मौजूदा परिस्थिति को समझने के लिए अतिरंजना और आशंकाओं के बीच एक विवेकपूर्ण दूरी बनाना जरूरी है। सेना के वरिष्ठ अधिकारियों के बयान को सीधे “आसन्न युद्ध की घोषणा” के रूप में पढ़ना उचित नहीं होगा। सैन्य संस्थान अक्सर बदलते सुरक्षा वातावरण के प्रति चेतावनी देते हैं ताकि रक्षा तैयारी, तकनीकी आधुनिकीकरण और राष्ट्रीय सुरक्षा पर सार्वजनिक व नीतिगत ध्यान बना रहे। यह भी संभव है कि ऐसे वक्तव्य प्रतिद्वंद्वी देशों को यह संदेश देने के लिए हों कि भारत भविष्य के संघर्षों की प्रकृति को समझ रहा है और उसके लिए तैयार है।

फिर भी एक लोकतंत्र में यह प्रश्न स्वाभाविक है कि क्या देश धीरे-धीरे ऐसे वैश्विक शक्ति-संतुलन में खिंचता जा रहा है, जहाँ उसकी सामरिक स्वायत्तता कमजोर हो सकती है। भारत की विदेश नीति की सबसे बड़ी शक्ति उसकी “रणनीतिक स्वायत्तता” रही है – अर्थात् मित्रता सबके साथ, पर निर्भरता किसी एक पर नहीं। यदि पश्चिम एशिया के संकट में भारत किसी भी प्रकार की प्रत्यक्ष सैन्य धुरी का हिस्सा बनता है, तो उसका प्रभाव केवल विदेश नीति तक सीमित नहीं रहेगा; उसका असर ऊर्जा, व्यापार, सामाजिक सद्भाव और आंतरिक राजनीति तक महसूस किया जाएगा।

आज आवश्यकता भय या युद्धोन्माद की नहीं, बल्कि गंभीर राष्ट्रीय विमर्श की है। भारत को अपनी सुरक्षा तैयारियाँ मजबूत करनी ही होंगी क्योंकि दुनिया वास्तव में अधिक अस्थिर होती जा रही है। लेकिन उतना ही आवश्यक यह भी है कि सैन्य तैयारी और कूटनीतिक विवेक के बीच संतुलन बना रहे। किसी भी बड़े राष्ट्र की परिपक्वता केवल उसकी सैन्य शक्ति से नहीं, बल्कि इस क्षमता से आँकी जाती है कि वह तनावपूर्ण वैश्विक परिस्थितियों में भी अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा करते हुए अनावश्यक संघर्षों से स्वयं को कितनी दूर रख पाता है। आज भारत के सामने शक्ति और संयम, साझेदारी और स्वायत्तता, सुरक्षा और शांति के बीच सही संतुलन स्थापित करने की चुनौती है।

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