श्रीनगर/ पीपुल्स कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष सज्जाद गनी लोन को उनके पिता की 24वीं बरसी पर नजरबंद कर दिया गया है। पार्टी ने बृहस्पतिवार को यह दावा किया।
अब्दुल गनी लोन की 21 मई 2002 को आतंकवादियों ने उस समय गोली मारकर हत्या कर दी थी जब वह हुर्रियत कॉन्फ्रेंस की एक रैली से लौट रहे थे। यह रैली मीरवाइज मौलवी मोहम्मद फारूक को श्रद्धांजलि देने के लिए आयोजित की गई थी, जहां उनकी हत्या कर दी गयी थी।
अब्दुल गनी लोन की 21 मई 2002 को श्रीनगर में हत्या कर दी गई थी। वे अलगाववादी संगठन हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के वरिष्ठ नेता थे। उनकी हत्या उस समय हुई थी जब वे Mirwaiz Mohammad Farooq की बरसी पर आयोजित एक सभा से लौट रहे थे। मीरवाइज फारूक की भी 1990 में हत्या कर दी गई थी।
सज्जाद लोन ने सोशल मीडिया पर दावा किया कि उन्हें घर से बाहर निकलने की अनुमति नहीं दी गई। पार्टी नेताओं ने आरोप लगाया कि प्रशासन ने उन्हें कब्रिस्तान जाकर श्रद्धांजलि देने से रोका। कुछ अन्य मुख्यधारा और अलगाववादी पृष्ठभूमि वाले नेताओं पर भी आवाजाही संबंधी प्रतिबंध लगाए जाने की खबरें सामने आईं।
प्रशासन की ओर से आमतौर पर ऐसे अवसरों पर यह तर्क दिया जाता है कि संवेदनशील तारीखों पर कानून-व्यवस्था बनाए रखने और संभावित विरोध-प्रदर्शन रोकने के लिए एहतियाती कदम उठाए जाते हैं। हालांकि, इस मामले में तत्काल कोई विस्तृत आधिकारिक बयान सामने नहीं आया।
यह मुद्दा इसलिए भी राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि जम्मू-कश्मीर में पिछले कुछ वर्षों से सुरक्षा और राजनीतिक गतिविधियों के बीच संतुलन को लेकर लगातार बहस चल रही है। विपक्षी दल और कुछ नागरिक समूह ऐसे प्रतिबंधों को लोकतांत्रिक अधिकारों पर अंकुश बताते हैं, जबकि सरकार और सुरक्षा एजेंसियाँ इन्हें सुरक्षा आवश्यकता के रूप में प्रस्तुत करती हैं।
पार्टी नेताओं ने आरोप लगाया कि प्रशासन ने उन्हें कब्रिस्तान जाकर श्रद्धांजलि देने से रोका। कुछ अन्य मुख्यधारा और अलगाववादी पृष्ठभूमि वाले नेताओं पर भी आवाजाही संबंधी प्रतिबंध लगाए जाने की खबरें सामने आईं।
प्रशासन की ओर से आमतौर पर ऐसे अवसरों पर यह तर्क दिया जाता है कि संवेदनशील तारीखों पर कानून-व्यवस्था बनाए रखने और संभावित विरोध-प्रदर्शन रोकने के लिए एहतियाती कदम उठाए जाते हैं। हालांकि, इस मामले में तत्काल कोई विस्तृत आधिकारिक बयान सामने नहीं आया।
यह मुद्दा इसलिए भी राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि जम्मू-कश्मीर में पिछले कुछ वर्षों से सुरक्षा और राजनीतिक गतिविधियों के बीच संतुलन को लेकर लगातार बहस चल रही है। विपक्षी दल और कुछ नागरिक समूह ऐसे प्रतिबंधों को लोकतांत्रिक अधिकारों पर अंकुश बताते हैं, जबकि सरकार और सुरक्षा एजेंसियाँ इन्हें सुरक्षा आवश्यकता के रूप में प्रस्तुत करती हैं।
