अर्थव्यवस्था/ निर्यात तो बढ़ा, क्या भारत वैश्विक व्यापार की महाशक्ति बनने की राह पर है?

अर्थव्यवस्था/ निर्यात तो बढ़ा, क्या भारत वैश्विक व्यापार की महाशक्ति बनने की राह पर है?

चालू वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही (अप्रैल-जून) के निर्यात आँकड़ों ने भारतीय अर्थव्यवस्था को लेकर आशावाद का माहौल बनाया है। सरकार के अनुसार इस अवधि में भारत के कुल निर्यात (वस्तु एवं सेवाएँ) में पिछले वर्ष की तुलना में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है। वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं, पश्चिम एशिया में तनाव, समुद्री व्यापार मार्गों पर जोखिम और संरक्षणवादी नीतियों के बावजूद यह प्रदर्शन निश्चित रूप से उत्साहवर्धक है।

यहां एक प्रश्न भी खड़ा होता है, क्या केवल निर्यात में वृद्धि को आर्थिक सफलता का पर्याय मान लिया जाए? इस प्रश्न का उत्तर सरल नहीं जटिल है। किसी भी अर्थव्यवस्था की वास्तविक मजबूती केवल निर्यात की वृद्धि से नहीं, बल्कि उसके स्वरूप, गुणवत्ता, मूल्यवर्धन और वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता से तय होती है। यही वह कसौटी है, जिस पर भारत को अभी लंबा सफर तय करना है।

भारत की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि उसने सेवा क्षेत्र में उल्लेखनीय क्षमता विकसित की है। सूचना प्रौद्योगिकी, सॉफ्टवेयर, वित्तीय सेवाएँ, परामर्श, स्वास्थ्य सेवाएँ और वैश्विक क्षमता केंद्र (Global Capability Centres) भारत की पहचान बन चुके हैं। इंजीनियरिंग उत्पाद, इलेक्ट्रॉनिक्स, औषधि और कुछ विनिर्माण क्षेत्रों में भी निर्यात बढ़ा है।

फिर भी यह सफलता अधूरी है। भारत का व्यापार घाटा अब भी ऊँचा है। इसका अर्थ यह है कि निर्यात बढ़ने के बावजूद आयात उससे अधिक तेजी से बढ़ रहा है। ऊर्जा, इलेक्ट्रॉनिक उपकरण, मशीनरी, सेमीकंडक्टर, उन्नत औद्योगिक उपकरण और रक्षा प्रौद्योगिकी के लिए भारत अभी भी विदेशों पर निर्भर है। इसलिए विदेशी मुद्रा अर्जित करने के साथ-साथ विदेशी मुद्रा का बड़ा हिस्सा आयात पर खर्च हो जाता है।

इससे भी बड़ा प्रश्न भारत की वैश्विक हिस्सेदारी का है। विश्व व्यापार में भारत की हिस्सेदारी अभी भी लगभग 2 प्रतिशत के आसपास है। इसके विपरीत चीन विश्व का सबसे बड़ा निर्यातक है। वियतनाम, जिसकी आबादी भारत के एक बड़े राज्य के बराबर है, इलेक्ट्रॉनिक्स और उच्च मूल्य वाले विनिर्माण उत्पादों के निर्यात में उल्लेखनीय सफलता प्राप्त कर चुका है। बांग्लादेश ने वस्त्र निर्यात में विश्व स्तर पर अपनी मजबूत पहचान बनाई है। मेक्सिको ने अमेरिकी बाजार से निकटता का लाभ उठाकर वैश्विक आपूर्ति शृंखला में महत्वपूर्ण स्थान बना लिया है।

भारत के पास विशाल घरेलू बाजार, युवा जनसंख्या, तकनीकी क्षमता और लोकतांत्रिक संस्थाएँ होने के बावजूद वह अभी तक वैश्विक विनिर्माण का केंद्रीय केंद्र क्यों नहीं बन पाया? इस प्रश्न का उत्तर केवल वैश्विक परिस्थितियों में नहीं, बल्कि घरेलू संरचनात्मक चुनौतियों में भी छिपा है।

भारत में भूमि अधिग्रहण की जटिलता, ऊँची लॉजिस्टिक लागत, न्यायिक प्रक्रियाओं में विलंब, ऊर्जा लागत, बंदरगाहों की दक्षता, सूक्ष्म एवं लघु उद्योगों की सीमित प्रतिस्पर्धात्मकता तथा अनुसंधान एवं विकास पर अपेक्षाकृत कम निवेश आज भी बड़ी बाधाएँ हैं।

एक अन्य चुनौती यह है कि भारत के निर्यात का बड़ा हिस्सा अभी भी सीमित क्षेत्रों और सीमित कंपनियों पर निर्भर है। यदि श्रम-प्रधान उद्योगकृजैसे वस्त्र, चमड़ा, खिलौने, फर्नीचर, खाद्य प्रसंस्करण और हस्तशिल्पकृको पर्याप्त प्रोत्साहन मिले, तो निर्यात का लाभ करोड़ों लोगों तक पहुँच सकता है। वर्तमान में निर्यात वृद्धि का रोजगार पर प्रभाव अपेक्षित स्तर का नहीं दिखाई देता।

भारत ने उत्पादन आधारित प्रोत्साहन  (PLI) योजना, ‘मेक इन इंडिया’, ‘डिजिटल इंडिया’ और अनेक मुक्त व्यापार समझौतों के माध्यम से विनिर्माण को गति देने का प्रयास किया है। इन पहलों के सकारात्मक परिणाम मिलने लगे हैं, विशेषकर इलेक्ट्रॉनिक्स और मोबाइल निर्माण में। लेकिन यह यात्रा अभी प्रारंभिक अवस्था में है। यदि इन पहलों का विस्तार सेमीकंडक्टर, हरित प्रौद्योगिकी, चिकित्सा उपकरण, रक्षा उत्पादन और उच्च तकनीक विनिर्माण तक होता है, तभी भारत वैश्विक मूल्य शृंखलाओं में अपनी स्थिति मजबूत कर सकेगा।

इसके साथ एक और पहलू पर गंभीरता से विचार करना होगा। भारत लंबे समय से ष्कच्चा माल निर्यात और तैयार माल आयातष् की समस्या से जूझता रहा है। लौह अयस्क, खनिज, कृषि उत्पाद और अन्य प्राथमिक वस्तुओं का निर्यात अपेक्षाकृत कम मूल्य पर होता है, जबकि उच्च तकनीक और उच्च मूल्य वाले तैयार उत्पाद अधिक कीमत पर आयात किए जाते हैं। यह असंतुलन केवल व्यापार घाटा नहीं बढ़ाता, बल्कि घरेलू औद्योगिक विकास को भी सीमित करता है।

यदि भारत को वास्तव में आर्थिक महाशक्ति बनना है, तो उसे ‘मेड इन इंडिया’ से आगे बढ़कर ‘डिज़ाइन्ड, डेवलप्ड एंड इनोवेटेड इन इंडिया’ की दिशा में बढ़ना होगा। केवल उत्पादन पर्याप्त नहीं; प्रौद्योगिकी, अनुसंधान, बौद्धिक संपदा, ब्रांड निर्माण और वैश्विक विपणन में भी नेतृत्व स्थापित करना होगा।

झारखंड जैसे राज्यों के लिए भी यह एक महत्वपूर्ण अवसर है। यदि खनिज संपदा वाले राज्य केवल लौह अयस्क और कोयला भेजने तक सीमित न रहकर इस्पात, विशेष मिश्रधातु, मशीन निर्माण, बैटरी, रक्षा उपकरण और हरित ऊर्जा उद्योग विकसित करें, तो निर्यात का वास्तविक लाभ स्थानीय अर्थव्यवस्था और रोजगार दोनों को मिलेगा। ‘माइंस टू माइंड्स’ का नारा तभी सार्थक होगा जब प्राकृतिक संसाधनों के साथ ज्ञान, अनुसंधान और नवाचार का भी विकास हो।

पहली तिमाही के निर्यात आँकड़े निश्चित रूप से आश्वस्त करने वाले हैं। वे बताते हैं कि भारत वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच भी अवसरों का लाभ उठा सकता है। लेकिन वे हमें यह भी याद दिलाते हैं कि केवल निर्यात बढ़ना पर्याप्त नहीं है। प्रश्न यह है कि क्या भारत विश्व व्यापार में अपनी हिस्सेदारी उल्लेखनीय रूप से बढ़ा पा रहा है? क्या निर्यात से व्यापक रोजगार सृजित हो रहा है? क्या हम उच्च मूल्यवर्धित उत्पादों की ओर बढ़ रहे हैं? और क्या हमारी औद्योगिक नीति आयात निर्भरता को कम कर रही है?

इन प्रश्नों के उत्तर अभी पूरी तरह सकारात्मक नहीं हैं। इसलिए पहली तिमाही के आँकड़ों का स्वागत अवश्य किया जाना चाहिए, किंतु उन्हें अंतिम उपलब्धि नहीं, बल्कि एक प्रारंभिक संकेत के रूप में देखा जाना चाहिए। भारत की वास्तविक परीक्षा तब होगी, जब निर्यात की वृद्धि केवल आँकड़ों में नहीं, बल्कि रोजगार, तकनीकी आत्मनिर्भरता, क्षेत्रीय औद्योगिक विकास और वैश्विक प्रतिस्पर्धा में भी स्पष्ट दिखाई दे।

आर्थिक इतिहास हमें सिखाता है कि समृद्ध राष्ट्र वे नहीं बनते जो केवल अधिक निर्यात करते हैं; समृद्ध राष्ट्र वे बनते हैं जो ज्ञान, प्रौद्योगिकी और मूल्यवर्धन का निर्यात करते हैं। भारत के सामने आज यही सबसे बड़ी चुनौती और सबसे बड़ा अवसर है।

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