गौतम चौधरी
हाल ही में सहारनपुर के रहने वाले वरिष्ठ चिंतक और सामाजिक कार्यकर्ता डॉ. असलम खान साहब ने एक व्यक्तिगत अनुभव साझा किया। उन्होंने बताया कि उन्हें एक चिकित्सक के 73वें जन्मदिवस समारोह में विशिष्ट अतिथि के रूप में आमंत्रित किया गया था। कार्यक्रम में समाज के विभिन्न वर्गों के अनेक लोग उपस्थित थे। उन्होंने मुस्लिम समाज के कुछ शिक्षित लोगों को भी व्यक्तिगत रूप से आमंत्रित किया, किंतु वे कार्यक्रम में नहीं पहुँचे। डॉ. खान ने यह भी उल्लेख किया कि यही लोग उन्हें मंदिरों में आमंत्रित करते हैं, जहाँ वे तौहीद और ईश्वर-प्रेम पर उनके विचार ध्यानपूर्वक सुनते हैं।
यह घटना केवल एक सामाजिक प्रसंग नहीं है। यह एक बड़ा प्रश्न खड़ा करती है-क्या भारत के विभिन्न समुदायों के बीच सामाजिक संवाद पर्याप्त है? और यदि नहीं, तो उसके क्या परिणाम हो सकते हैं?
यह स्वीकार करना होगा कि भारत विविधताओं का देश है। यहाँ धार्मिक पहचान और सांस्कृतिक पहचान साथ-साथ चलती हैं। किसी भी समुदाय को अपनी आस्था, परंपराओं और धार्मिक संस्थाओं की रक्षा का पूरा अधिकार है। लेकिन लोकतांत्रिक समाज केवल समान अधिकारों से नहीं, बल्कि सामाजिक सहभागिता से भी मजबूत होता है।
सामाजिक वैज्ञानिक लंबे समय से ‘सामाजिक पूंजी’ (Social Capital) की चर्चा करते रहे हैं। इसका अर्थ है-विश्वास, संवाद, सहयोग और विभिन्न समूहों के बीच मानवीय संबंध। जिन समाजों में यह पूंजी अधिक होती है, वहाँ तनाव कम और विकास की संभावनाएँ अधिक होती हैं। इसके विपरीत, जब समुदाय केवल अपने-अपने दायरों तक सीमित हो जाते हैं, तो अविश्वास और दूरी बढ़ने लगती है।
यहाँ एक सावधानी भी आवश्यक है। यह मान लेना उचित नहीं होगा कि पूरा मुस्लिम समाज सामाजिक रूप से अलग-थलग है। देशभर में लाखों मुसलमान शिक्षा, प्रशासन, सेना, न्यायपालिका, उद्योग, खेल, कला, विज्ञान और सामाजिक संस्थाओं में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। अनेक स्थानों पर अंतरधार्मिक संवाद और सांस्कृतिक सहभागिता के उत्कृष्ट उदाहरण भी मौजूद हैं। इसलिए किसी एक अनुभव को पूरे समुदाय का प्रतिनिधि चित्र नहीं माना जा सकता।
फिर भी यह प्रश्न बना रहता है कि क्या भारत में विभिन्न समुदायों के बीच अनौपचारिक सामाजिक संपर्क पहले की तुलना में कम हुआ है? यदि उत्तर आंशिक रूप से भी ‘हाँ’ है, तो यह केवल मुस्लिम समाज की नहीं, पूरे भारतीय समाज की चिंता का विषय है।
इतिहास बताता है कि जो समाज अपने भीतर संवाद की परंपरा बनाए रखते हैं, वे अधिक स्थिर और सृजनशील बनते हैं। वहीं सामाजिक दूरी, पूर्वाग्रह और परस्पर अविश्वास धीरे-धीरे लोकतांत्रिक ताने-बाने को कमजोर कर सकते हैं। इसलिए इतिहास से सीख लेते समय भी हमें सावधानी रखनी चाहिए। उदाहरणों का उपयोग प्रेरणा के लिए होना चाहिए, न कि किसी समुदाय पर सामूहिक निर्णय सुनाने के लिए।
भारतीय संविधान हमें धार्मिक स्वतंत्रता के साथ-साथ समान नागरिकता का भी आदर्श देता है। इसका अर्थ यह नहीं कि सभी लोग अपनी धार्मिक पहचान छोड़ दें, बल्कि यह कि वे अपनी-अपनी पहचान के साथ सार्वजनिक जीवन में समान रूप से सहभागी बनें।
आज आवश्यकता इस बात की है कि मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा, चर्च, विश्वविद्यालय, सामाजिक संस्थाएँ, साहित्यिक मंच और नागरिक संगठन संवाद के ऐसे अवसर बढ़ाएँ जहाँ लोग एक-दूसरे को सुनें, समझें और सम्मान दें। सामाजिक विश्वास केवल कानून से नहीं बनता; वह निरंतर संवाद से बनता है।
डॉ. असलम खान का अनुभव हमें किसी समुदाय की आलोचना करने के लिए नहीं, बल्कि आत्ममंथन के लिए प्रेरित करता है। क्या हम अपने परिचय के दायरे को सीमित कर रहे हैं? क्या हम उन मंचों पर जाने से बच रहे हैं जहाँ विभिन्न विचारों और पृष्ठभूमियों के लोग मिलते हैं? यदि ऐसा है, तो यह प्रवृत्ति दीर्घकाल में किसी एक समुदाय की नहीं, पूरे समाज की सामाजिक पूंजी को कमजोर कर सकती है।
भारत की सबसे बड़ी शक्ति उसकी विविधता है। इस विविधता को सुरक्षित रखने का मार्ग केवल सहिष्णुता नहीं, बल्कि सक्रिय सहभागिता है। अपनी आस्था को अक्षुण्ण रखते हुए भी यदि हम एक-दूसरे के सुख-दुःख, सांस्कृतिक आयोजनों, बौद्धिक विमर्शों और सामाजिक पहलों में सहभागी बनें, तो राष्ट्रीय एकता केवल संविधान की पंक्तियों में नहीं, बल्कि समाज के व्यवहार में भी दिखाई देगी।
राष्ट्र केवल साझा भूगोल से नहीं बनता; वह साझा विश्वास, साझा संवाद और साझा नागरिक उत्तरदायित्व से बनता है। यही भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति है और भविष्य की सबसे बड़ी आवश्यकता भी।
