गौतम चौधरी
दिल्ली के रामलीला मैदान में मंगलवार को भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की ‘बदलाव जरूरी है’ रैली हुई। मंच से बेरोजगारी, महंगाई, किसानों की आय, मजदूरों की असुरक्षा, शिक्षा और स्वास्थ्य की बदहाली से लेकर संविधान, लोकतंत्र और संघीय ढांचे की रक्षा तक के सवाल उठे। CPI महासचिव डी. राजा ने इसे केवल पार्टी का नारा मानने से इनकार करते हुए कहा कि ‘बदलाव जरूरी है’ देश और जनता की आवाज है।
सवाल यह है कि क्या यह रैली भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की राजनीतिक वापसी का संकेत है? इसका उत्तर फिलहाल न तो पूरे उत्साह के साथ ‘हां’ में दिया जा सकता है और न ही इसे महज एक प्रतीकात्मक कवायद कहकर खारिज किया जा सकता है।
दरअसल, भारतीय राजनीति में वामपंथ की सबसे बड़ी समस्या उसके विचारों की प्रासंगिकता नहीं, बल्कि उसकी राजनीतिक पहुंच का लगातार सिकुड़ना रही है। जिस देश में रोजगार, महंगाई, किसानों की आय, असंगठित श्रमिकों की असुरक्षा, सार्वजनिक शिक्षा और स्वास्थ्य की चिंता करोड़ों लोगों के जीवन का हिस्सा है, वहां इन सवालों को राजनीतिक विमर्श के केंद्र में रखने वाली पार्टियां चुनावी रूप से कमजोर होती गईं। यही भारतीय वामपंथ का सबसे बड़ा विरोधाभास है। दिल्ली की रैली में CPI ने इसी विरोधाभास को तोड़ने की कोशिश की है।
आज भारतीय समाज में आर्थिक विकास की चमक और आम आदमी की आर्थिक बेचैनी साथ-साथ दिखाई देती है। रोजगार की गुणवत्ता, वास्तविक आय, महंगाई और सार्वजनिक सेवाओं को लेकर असंतोष है। किसान न्यूनतम समर्थन मूल्य की कानूनी गारंटी की मांग करते रहे हैं और श्रमिक रोजगार तथा सामाजिक सुरक्षा के सवाल उठा रहे हैं। CPI ने इन्हीं मुद्दों को अपने राष्ट्रव्यापी ‘बदलाव जरूरी है’ अभियान का आधार बनाया है लेकिन केवल सही सवाल उठाना पर्याप्त नहीं है।
राजनीति में सवाल वही सफल होता है, जिसके साथ संगठन, निरंतर आंदोलन और व्यापक सामाजिक गठजोड़ खड़ा हो। यही वह मोर्चा है जहां CPI को अभी लंबी दूरी तय करनी है।
रामलीला मैदान की भीड़ महत्वपूर्ण हो सकती है, लेकिन उससे भी अधिक महत्वपूर्ण यह होगा कि उस भीड़ का राजनीतिक संवाद आने वाले महीनों में गांवों, कस्बों, विश्वविद्यालयों, औद्योगिक क्षेत्रों और मजदूर बस्तियों तक कितना पहुंचता है।
भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन की अपनी गौरवशाली विरासत है। मजदूर आंदोलनों से लेकर किसान संघर्षों, स्वतंत्रता आंदोलन, भूमि सुधार, शिक्षा और धर्मनिरपेक्ष राजनीति तक वामपंथ ने भारतीय लोकतंत्र को महत्वपूर्ण वैचारिक सामग्री दी है लेकिन आज की युवा पीढ़ी को केवल पुराने नारों से नहीं जोड़ा जा सकता।
आज का युवा रोजगार चाहता है, लेकिन वह डिजिटल अर्थव्यवस्था और कृत्रिम बुद्धिमत्ता की दुनिया में रोजगार का नया अर्थ भी तलाश रहा है। वह शिक्षा चाहता है, लेकिन शिक्षा की गुणवत्ता और फीस दोनों को लेकर चिंतित है। वह किसान है तो केवल समर्थन मूल्य नहीं, बाजार, तकनीक, सिंचाई और जलवायु संकट से भी जूझ रहा है।
इसलिए भारतीय वामपंथ के सामने चुनौती यह है कि वह मार्क्सवादी शब्दावली को छोड़े बिना उसे 21वीं सदी की सामाजिक-आर्थिक वास्तविकताओं की भाषा में कैसे अनुवाद करता है।
CPI की रैली का सबसे महत्वपूर्ण शब्द ‘बदलाव’ है लेकिन लोकतंत्र में केवल सरकार बदलना परिवर्तन नहीं होता। प्रश्न यह होना चाहिए कि नीति किस दिशा में बदलेगी? क्या आर्थिक विकास का मॉडल अधिक रोजगार पैदा करेगा? क्या खनिज और प्राकृतिक संसाधनों पर स्थानीय समुदायों का अधिकार मजबूत होगा? क्या सार्वजनिक शिक्षा और स्वास्थ्य को बाजार की शक्तियों से अलग पर्याप्त प्राथमिकता मिलेगी? क्या किसानों और मजदूरों को केवल चुनावी घोषणाओं से आगे स्थायी आर्थिक सुरक्षा मिलेगी? क्या राज्यों के अधिकार और संघीय ढांचा मजबूत होगा? और सबसे महत्वपूर्ण—क्या आर्थिक असमानता को विकास का अनिवार्य परिणाम मान लिया जाएगा या उसे राजनीतिक प्रश्न बनाया जाएगा?
यदि CPI इन सवालों के ठोस उत्तर जनता के सामने रखती है, तभी ‘बदलाव जरूरी है’ महज नारा नहीं, राजनीतिक विकल्प बन सकता है।
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के लिए रास्ता आसान नहीं है। चुनावी राजनीति में उसका प्रभाव सीमित है और विपक्षी राजनीति के भीतर भी उसकी भूमिका बड़ी पार्टियों की छाया में दिखाई देती है लेकिन भारतीय राजनीति में एक दिलचस्प परिस्थिति बन रही है। आर्थिक असमानता, बेरोजगारी, सामाजिक सुरक्षा और सार्वजनिक संस्थाओं की स्थिति जैसे प्रश्न धीरे-धीरे फिर राजनीतिक विमर्श के केंद्र में आ रहे हैं। यही वामपंथ के लिए अवसर है।
मगर यह अवसर तभी राजनीतिक शक्ति में बदलेगा जब CPI रैली से आंदोलन, आंदोलन से संगठन और संगठन से वैकल्पिक राजनीतिक कार्यक्रम की यात्रा पूरी करे। रामलीला मैदान की आज की सभा उस यात्रा का आरंभ हो सकती है—लेकिन अभी उसे मंजिल कहना जल्दबाजी होगी। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की असली परीक्षा अब दिल्ली में नहीं, दिल्ली के बाद होगी।
यदि आज की भीड़ अगले छह महीनों में गांवों, खेतों, कारखानों, विश्वविद्यालयों और श्रमिक बस्तियों में दिखाई देती है, यदि आर्थिक प्रश्नों को लेकर स्थायी जनांदोलन खड़ा होता है और यदि CPI व्यापक लोकतांत्रिक-वामपंथी एकता की दिशा में आगे बढ़ती है, तब कहा जा सकेगा कि भारतीय वामपंथ सचमुच वापसी की राह पर है।
अन्यथा रामलीला मैदान की यह रैली भी भारतीय राजनीति की उन अनेक सभाओं की सूची में शामिल हो जाएगी, जिनमें भीड़ तो बहुत थी, लेकिन उसके बाद आंदोलन नहीं बचा। रैली का संदेश स्पष्ट है—‘बदलाव जरूरी है।’ अब जनता CPI से पूछेगी—बदलाव का रास्ता क्या है?
