रांची/कोलकाता/ दामोदर घाटी निगम (DVC) की स्थानांतरण नीति को लेकर पारदर्शिता, समानता और प्रशासनिक विवेकाधिकार के कथित दुरुपयोग पर गंभीर सवाल उठाए गए हैं। आरोप है कि स्थानांतरण नीति का इस्तेमाल निष्पक्ष मानव संसाधन प्रबंधन के बजाय कुछ अधिकारियों पर प्रशासनिक नियंत्रण और प्रभाव बनाए रखने के माध्यम के रूप में किया जा रहा है।
शिकायत में कहा गया है कि सतर्कता मानकों के तहत संवेदनशील पदों की पहचान और उनके रोटेशन का प्रावधान चयनात्मक तरीके से लागू किया जा रहा है। कुछ अधिकारियों को लंबे समय तक एक ही पद पर बनाए रखा गया है, जबकि अन्य अधिकारियों का अपेक्षाकृत कम अवधि में स्थानांतरण कर दिया जाता है। इससे स्थानांतरण व्यवस्था की निष्पक्षता और पारदर्शिता पर सवाल खड़े होते हैं।
महत्वपूर्ण HR पदों को संवेदनशील श्रेणी से बाहर रखने का आरोप
शिकायत में विशेष रूप से कहा गया है कि नीति निर्माण और रणनीतिक निर्णयों में प्रभाव रखने वाले कुछ महत्वपूर्ण HR पदों को संवेदनशील पदों की श्रेणी में नहीं रखा गया है। आरोप है कि इस वजह से कुछ अधिकारियों को कॉरपोरेट कार्यालय में लंबे समय तक एक ही जिम्मेदारी पर बने रहने का अवसर मिला है।
शिकायत के अनुसार, अविजित सेन, प्रबंधक (HR), 11 वर्षों से अधिक समय से चेयरमैन कार्यालय में पदस्थ हैं। इसी प्रकार नफीसा बानो, प्रबंधक (HR), भी 11 वर्षों से अधिक समय से एक संवेदनशील HR भूमिका में कार्यरत हैं। शिकायतकर्ता का कहना है कि इतने लंबे कार्यकाल को केंद्रीय सतर्कता आयोग (CVC) की उस मूल भावना के संदर्भ में देखा जाना चाहिए, जिसमें संवेदनशील पदों पर समय-समय पर रोटेशन का उद्देश्य निहित स्वार्थ और अधिकार के संभावित दुरुपयोग को रोकना है।
चेयरमैन कार्यालय से जुड़े कार्यों पर भी सवाल
शिकायत में संजय नाथ, वरिष्ठ प्रबंधक, की भूमिका को लेकर भी गंभीर आरोप लगाए गए हैं। शिकायतकर्ता के अनुसार, वे चेयरमैन से संबंधित ई-मेल और नोटिंग देखने जैसे महत्वपूर्ण कार्यों से जुड़े हैं और इस कारण उनके पास प्रशासनिक निर्णय प्रक्रिया की महत्वपूर्ण सूचनाओं तक पहुंच रहती है।
शिकायत में आरोप लगाया गया है कि नाथ की भूमिका और लंबे समय तक प्रभावशाली प्रशासनिक प्रक्रिया से जुड़े रहने से स्थानांतरण नीति के निष्पक्ष क्रियान्वयन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। शिकायतकर्ता ने यह भी आरोप लगाया है कि वरिष्ठ अधिकारियों की पोस्टिंग से जुड़े मामलों में आर्थिक लेन-देन के माध्यम से लाभ कमाने की गतिविधियां हो रही हैं। हालांकि, इस गंभीर आरोप की स्वतंत्र पुष्टि इस स्तर पर नहीं हो सकी है और संबंधित अधिकारी का पक्ष सामने आना बाकी है।
रोटेशन नीति के औचित्य पर उठ रहे सवाल
स्थानांतरण नीति का मूल उद्देश्य कर्मचारियों की तैनाती को प्रशासनिक आवश्यकता, दक्षता और संगठनात्मक हितों के अनुरूप बनाए रखना तथा किसी व्यक्ति या समूह के लंबे समय तक किसी संवेदनशील व्यवस्था पर प्रभाव को रोकना होता है। शिकायतकर्ता का आरोप है कि डीवीसी में यही उद्देश्य कमजोर पड़ रहा है।
आरोपों के मुताबिक, यदि संवेदनशील पदों की पहचान ही समान रूप से नहीं की जाती और रोटेशन के नियम सभी अधिकारियों पर समान रूप से लागू नहीं होते, तो पूरी स्थानांतरण व्यवस्था सवालों के घेरे में आ जाती है। इससे पक्षपात, प्रशासनिक दबाव और प्रभाव के दुरुपयोग की आशंका पैदा होती है।
जांच से ही साफ होगी वास्तविक तस्वीर
मामले की गंभीरता को देखते हुए आवश्यक है कि डीवीसी अपनी स्थानांतरण नीति, संवेदनशील पदों की सूची, संबंधित अधिकारियों की पोस्टिंग अवधि तथा पिछले वर्षों में हुए तबादलों का स्वतंत्र और पारदर्शी परीक्षण कराए। साथ ही, यदि वरिष्ठ अधिकारियों की पोस्टिंग के बदले आर्थिक लेन-देन के आरोप लगाए गए हैं, तो उनकी भी सक्षम सतर्कता एजेंसी से जांच कराई जानी चाहिए।
फिलहाल उपलब्ध जानकारी में ये बातें शिकायतकर्ता द्वारा लगाए गए आरोप हैं। आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। इसलिए निष्पक्ष जांच, संबंधित अधिकारियों का पक्ष और उपलब्ध दस्तावेज ही यह निर्धारित कर सकेंगे कि डीवीसी की स्थानांतरण नीति वास्तव में नियमों के अनुरूप लागू हो रही है या उसमें चयनात्मकता और प्रशासनिक विवेकाधिकार का दुरुपयोग हो रहा है।
