हाइपेशिया : जिसे ईसाइयों की एक बर्बर खूंखार भीड़ ने जानवरों की तरह नोच-नोच कर मार दिया

हाइपेशिया : जिसे ईसाइयों की एक बर्बर खूंखार भीड़ ने जानवरों की तरह नोच-नोच कर मार दिया

इतिहास में कुछ हत्याएं केवल किसी व्यक्ति की हत्या नहीं होतीं। वे अपने पीछे एक ऐसा प्रश्न छोड़ जाती हैं, जो सदियों तक मनुष्य का पीछा करता रहता है। अलेक्जेंड्रिया की हाइपेशिया की हत्या भी ऐसी ही घटना थी। लगभग चौथी-पांचवीं शताब्दी के संधिकाल में अलेक्जेंड्रिया ज्ञान, दर्शन, गणित और खगोल विज्ञान का बड़ा केंद्र था। इसी शहर में हाइपेशिया ने अपने समय की स्थापित सामाजिक सीमाओं को लांघकर एक ऐसी पहचान बनाई, जो उस दौर में किसी महिला के लिए असाधारण थी। वह गणितज्ञ थीं, दार्शनिक थीं, खगोल विज्ञान की अध्यापिका थीं और नियोप्लेटोनिक चिंतन की महत्वपूर्ण प्रतिनिधि थीं। हाइपेशिया की कहानी केवल एक प्रतिभाशाली महिला की कहानी नहीं है। यह ज्ञान, सत्ता, धर्म और राजनीति के उस जटिल रिश्ते की कहानी है, जिसमें सत्य की खोज कई बार सत्ता-संघर्ष का शिकार हो जाती है। आज पश्चिमी कथित अभिजात्य ईसाई दुनिया आपने आप को सभ्य और मुसलमान व हिन्दुओं को बर्बर असभ्य बताता है लेकिन इतिहास की कई ऐसी घटनाएं हैं, जिसने साबित किया है कि पश्चिमी ईसाइयों ने ही दुनिया को असभ्यता सिखाई।

एक पिता, जिसने बेटी को असाधारण बनाया

हाइपेशिया के पिता थियोन ऑफ अलेक्जेंड्रिया स्वयं अपने समय के प्रसिद्ध गणितज्ञ और खगोलशास्त्री थे। टॉलेमी की Almagest और Handy Tables पर उनके काम और टिप्पणियां उस समय के वैज्ञानिक ज्ञान को समझने में महत्वपूर्ण थीं। थियोन ने अपनी बेटी को केवल परंपरागत शिक्षा नहीं दी। गणित, ज्यामिति, खगोल विज्ञान और दर्शन की दुनिया उनके लिए खोल दी। यही शिक्षा आगे चलकर हाइपेशिया को अलेक्जेंड्रिया की प्रतिष्ठित शिक्षिका बनाने वाली थी। संभवतः थियोन के कुछ वैज्ञानिक कार्यों में हाइपेशिया की बौद्धिक भागीदारी भी रही थी। इसलिए उन्हें केवल ‘महान विद्वान की बेटी’ कहना उनके व्यक्तित्व को छोटा करना होगा। वह स्वयं एक विदुषी थीं और यह तथ्य अपने आप में महत्वपूर्ण है—क्योंकि उस समय ज्ञान की दुनिया में महिलाओं की उपस्थिति अपवाद थी, सामान्यता नहीं।

ज्ञान की कोई जाति, धर्म या लिंग नहीं होता

हाइपेशिया सार्वजनिक रूप से दर्शन और विज्ञान पढ़ाती थीं। उनके विद्यार्थियों में रोमन प्रशासन से जुड़े प्रभावशाली लोग भी थे। उनके शिष्य सिनेसियस ऑफ साइरीन आगे चलकर ईसाई बिशप बने। यानी हाइपेशिया का बौद्धिक संसार किसी संकीर्ण धार्मिक या सामाजिक सीमा में बंद नहीं था। उनके लिए प्रश्न महत्वपूर्ण था, उत्तर महत्वपूर्ण था और तर्क महत्वपूर्ण था। शायद यही उनकी सबसे बड़ी ताकत थी। शायद यही बात कट्टर ईसाई सत्ता को चुनौती दे रहा था और उसकी परिणति एक महान महिला की विभत्स मॉबलिंचिंग में हुई।

फिर क्या हुआ?

पांचवीं शताब्दी की शुरुआत तक अलेक्जेंड्रिया में राजनीतिक और धार्मिक तनाव गहरा चुका था। रोमन प्रशासक ओरेस्टेस और अलेक्जेंड्रिया के प्रभावशाली ईसाई बिशप सिरिल के बीच सत्ता और अधिकार को लेकर संघर्ष चल रहा था। हाइपेशिया ओरेस्टेस के निकट थीं और ताकतवर हो रहे चर्च के खिलाफ आम जनता की आवाज बन रही थी। ईसाई षड्यंत्रकारियों ने चर्च की ताकत का सहारा लेकर भयानक अफवाह फैलाया। राजनीतिक संघर्ष में उनका नाम घसीटा जाने लगा। ईसाई चर्च के षड्यंत्रकारियों ने उन पर जादू-टोने जैसे आरोप भी लगाए। 415 ईस्वी के आसपास एक ईसाई भीड़ ने उन्हें सड़क से पकड़ लिया। प्राचीन इतिहासकार सुकरात स्कोलास्टिकस के विवरण के अनुसार, जिंदा हाइपेशिया को सीप और पत्थरों से पूरे शरीर को हजारों टुकड़ों में विभाजित कर जला दिया गया। इतिहास की यह घटना जितनी भयावह है, उसकी व्याख्या उससे कहीं अधिक जटिल है।

हाइपेशिया की एक और विडंबना

हाइपेशिया के अपने लिखे हुए मूल ग्रंथ आज हमारे पास नहीं हैं। उनके बारे में जो जानकारी उपलब्ध है, वह मुख्यतः उनके विद्यार्थियों, समकालीन इतिहासकारों और बाद के लेखकों के विवरणों से आती है। इसलिए हाइपेशिया का व्यक्तित्व हमारे सामने कुछ वैसा है जैसे किसी टूटे हुए दर्पण में दिखाई देने वाली छवि—पूरी नहीं, लेकिन इतनी स्पष्ट कि उसे भुलाया नहीं जा सकता। उनकी मृत्यु के बाद भी उनका नाम बचा रहा।

क्यों?

क्योंकि कुछ व्यक्तित्व अपने समय से बड़े हो जाते हैं। हाइपेशिया भी ऐसी ही एक ऐतिहासिक स्मृति हैं।

आज हाइपेशिया हमें क्यों याद आनी चाहिए?

आज हमारे पास विशाल विश्वविद्यालय हैं। अत्याधुनिक प्रयोगशालाएं हैं। अंतरिक्ष दूरबीनें हैं। इंटरनेट है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता है। सूचना की दुनिया हमारे हाथ में है। फिर भी एक पुराना सवाल आज भी हमारे सामने खड़ा है—

क्या समाज व्यक्ति को प्रश्न पूछने की पूरी स्वतंत्रता देता है?

क्या असहमति को सहन किया जाता है?

क्या सत्ता से सवाल पूछने वाला व्यक्ति सुरक्षित रहता है?

क्या धार्मिक या राजनीतिक विश्वास तर्क और प्रमाण से ऊपर हो जाते हैं?

सबसे महत्वपूर्ण—क्या हम ज्ञान को उसके तर्क और प्रमाण के आधार पर स्वीकार करते हैं, या यह तय करते हैं कि ज्ञान बोलने वाला व्यक्ति ‘हमारा’ है या ‘उनका’?

हाइपेशिया की कहानी का सबसे आधुनिक अर्थ शायद यही है।

हाइपेशिया की हत्या से बड़ी चीज उनकी विरासत

हाइपेशिया को याद करना किसी धर्म को दोषी ठहराने के लिए नहीं होना चाहिए। इतिहास को आज की धार्मिक या राजनीतिक लड़ाइयों का हथियार बनाना भी हाइपेशिया की स्मृति के साथ न्याय नहीं होगा। उन्हें याद करने का बेहतर तरीका यह है कि हम उस मूल भावना को याद रखें, जिसका वह प्रतिनिधित्व करती थीं—तर्क, जिज्ञासा, स्वतंत्र चिंतन और ज्ञान की खोज। सभ्यता की असली परीक्षा यह नहीं है कि उसके पास कितनी किताबें हैं, कितने विश्वविद्यालय हैं या कितनी तकनीक है। सभ्यता की असली परीक्षा यह है कि वह अपने असहमत व्यक्ति के साथ कैसा व्यवहार करती है। अलेक्जेंड्रिया की गलियों में हाइपेशिया की हत्या लगभग सोलह सौ वर्ष पहले हुई थी। लेकिन उनके सामने खड़ा सवाल आज भी जीवित है।

ज्ञान को सत्ता से डरना चाहिए या सत्ता को ज्ञान से?

शायद हाइपेशिया का सबसे बड़ा संदेश है—जब किसी समाज में प्रश्न पूछना अपराध बन जाता है, तब सबसे पहले विज्ञान नहीं मरता; सबसे पहले स्वतंत्र विचार मरता है। जिस दिन स्वतंत्र विचार मर जाता है, उस दिन सभ्यता बाहर से भले ही जीवित दिखाई दे, भीतर से वह अंधकार में प्रवेश कर चुकी होती है।

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