गौतम चौधरी
लोकतंत्र में कोई भी आंदोलन अपने आप में संदेह का विषय नहीं होता। असहमति लोकतंत्र की आत्मा है और आरक्षण जैसे संवेदनशील प्रश्न पर बहस का अधिकार हर नागरिक को है। प्रश्न यह नहीं है कि आरक्षण की आलोचना क्यों हो रही है। प्रश्न यह है कि एक नया राजनीतिक-सामाजिक अभियान इतनी असाधारण गति से राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में कैसे पहुंच गया?
‘आरक्षण हटाओ आंदोलन’ के मामले में यही प्रश्न अब गंभीरता से पूछा जाना चाहिए। घटनाओं का क्रम अपने आप में ध्यान देने योग्य है। जुलाई में कॉकरोच जनता पार्टी यानी CJP का आंदोलन चल रहा था। 22 जुलाई को ‘रिजर्वेशन हटाओ आंदोलन’ के नाम से Instagram पेज शुरू हुआ। 25 जुलाई को CJP आंदोलन समाप्त हुआ और उसके बाद RHA की डिजिटल लोकप्रियता तेजी से बढ़ने लगी। कुछ ही दिनों में उसके Instagram followers की संख्या 50 लाख से ऊपर पहुंचने का दावा सामने आया। बाद की रिपोर्टों में यह संख्या 56 लाख से अधिक बताई गई।
इतनी बड़ी डिजिटल पहुंच अपने आप में आंदोलन की जनस्वीकृति का प्रमाण नहीं है। सोशल मीडिया पर followers और वास्तविक राजनीतिक समर्थन दो अलग चीजें हैं। फिर भी इतनी तेज वृद्धि को सामान्य घटना मानकर छोड़ देना भी उचित नहीं होगा। यहीं से दूसरा प्रश्न उठता है।
RHA का डिजिटल उभार स्वयं मीडिया रिपोर्टों में CJP के बाद की घटना के रूप में सामने आया है। आंदोलन के आयोजकों ने भी CJP जैसी सोशल मीडिया आधारित mobilization का इस्तेमाल किया।
इसका अर्थ यह नहीं कि दोनों आंदोलनों के पीछे एक ही संगठन है। ऐसा प्रमाण सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं है। मगर एक राजनीतिक-संचार मॉडल जरूर दिखाई देता है—पहले सोशल मीडिया पर मुद्दा तैयार करना, फिर followers को आंदोलन के लिए mobilize करना, उसके बाद राष्ट्रीय मीडिया में दृश्यता प्राप्त करना और अंततः सत्ता के शीर्ष स्तर तक पहुंच बनाना।
यह आधुनिक राजनीति का नया तरीका हो सकता है। सवाल यह है कि क्या यह स्वतःस्फूर्त है या इसके पीछे कोई संगठित Amplification है?
21 अगस्त को जंतर-मंतर पर प्रदर्शन हुआ। इसके कुछ ही दिनों बाद 27 अगस्त को भाजपा अध्यक्ष जे.पी. नड्डा ने आंदोलन से जुड़े प्रतिनिधियों—हर्ष दुबे, रण बहादुर सिंह चौहान और मृत्युंजय पाठक—से मुलाकात की। नड्डा ने इसे ‘cordial discussions’ बताया और आगे भी बैठक की बात कही। इस मुलाकात को भाजपा और आंदोलन के बीच किसी गुप्त संबंध का प्रमाण कहना उचित नहीं होगा। राजनीतिक दल आंदोलनकारियों से मिलते हैं और लोकतंत्र में ऐसा होना स्वाभाविक है। फिर भी सवाल पैदा होता है।
एक ऐसा आंदोलन, जो अभी-अभी राष्ट्रीय स्तर पर उभरा है, इतनी शीघ्रता से देश की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष तक कैसे पहुंच गया? इस प्रश्न का उत्तर आंदोलन के समर्थकों को भी देना चाहिए और भाजपा को भी। क्योंकि पारदर्शिता केवल सरकार से नहीं, आंदोलन से भी अपेक्षित होती है।
यहां सबसे दिलचस्प पहलू सामने आता है। आरक्षण विरोधी आंदोलन का प्रत्यक्ष लाभ भाजपा को मिल सकता है। सामान्य वर्ग के उस युवा में, जो प्रतियोगी परीक्षाओं, सरकारी नौकरियों और उच्च शिक्षा में अवसरों को लेकर असंतुष्ट है, यह आंदोलन भाजपा के लिए नया राजनीतिक आधार तैयार कर सकता है। मगर यही आंदोलन भाजपा के लिए राजनीतिक संकट भी बन सकता है।
भारत की चुनावी राजनीति में SC, ST और OBC वर्गों का महत्व किसी से छिपा नहीं है। यदि आरक्षण-विरोधी आंदोलन को भाजपा से जोड़कर देखा जाने लगा तो विपक्ष के पास एक अत्यंत प्रभावी राजनीतिक हथियार आ जाएगा—“आरक्षण खतरे में है।” इसीलिए भाजपा के भीतर से भी विरोधाभासी संकेत दिखाई देते हैं। केंद्रीय मंत्री रामदास अठावले ने जुलाई में इस अभियान की तीखी आलोचना की और कहा कि NDA सरकार तथा प्रधानमंत्री आरक्षण खत्म करने की मांग का समर्थन नहीं करते।
दूसरी ओर भाजपा अध्यक्ष आंदोलन के प्रतिनिधियों से बातचीत करते हैं। हाल में भाजपा विधायक हार्दिक पटेल ने भी आरक्षण विवाद को लेकर गुजरात मॉडल जैसे संतुलित रास्ते की चर्चा की। इससे स्पष्ट है कि भाजपा के सामने मामला सीधा नहीं है। पार्टी को सामान्य वर्ग की नाराजगी को समझना है, मगर साथ ही अपने दलित-पिछड़े सामाजिक आधार को भी आश्वस्त रखना है।
निश्चित रूप से। कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के लिए इससे आसान राजनीतिक संदेश शायद ही कोई हो सकता है—“भाजपा आरक्षण खत्म करना चाहती है।” भले ही भाजपा ने आधिकारिक रूप से ऐसा कोई निर्णय न लिया हो, विपक्ष आंदोलन और भाजपा के बीच बनी सार्वजनिक निकटता को राजनीतिक Narrative में बदल सकता है। यानी एक विडंबना पैदा हो गई है।
जिस आंदोलन से भाजपा के सामान्य वर्ग के आधार को लाभ मिल सकता है, वही आंदोलन दलित-पिछड़े मतदाताओं को भाजपा से दूर करने का कारण भी बन सकता है। इसलिए यह कहना भी गलत होगा कि आंदोलन का राजनीतिक लाभ केवल भाजपा को ही मिलेगा।
इस पूरे प्रकरण का सबसे कम जांचा गया पक्ष मीडिया है। किसी आंदोलन को राजनीतिक शक्ति केवल उसके प्रदर्शनकारियों की संख्या से नहीं मिलती। आज के समय में दृश्यता ही शक्ति है। जिस आंदोलन को लगातार टीवी बहसों, डिजिटल पोर्टलों, समाचार वेबसाइटों और सोशल मीडिया में जगह मिलती है, वह वास्तविक भीड़ से कहीं अधिक बड़ा दिखाई देने लगता है।
RHA के मामले में यही जांच आवश्यक है। कितने चैनलों ने CJP के दौरान प्रतिदिन कितनी खबरें कीं? RHA के लिए कितनी खबरें कीं? किस आंदोलन को कितने Prime-time मिनट मिले? किसके नेताओं को कितनी बार स्टूडियो में बुलाया गया?किसके आंदोलन को “युवा आंदोलन”, “जनांदोलन” या “नई क्रांति” जैसे शब्द मिले?
और सबसे महत्वपूर्ण—क्या सरकारी या सत्ता-समर्थक माने जाने वाले मीडिया संस्थानों ने इस आंदोलन को विपक्षी आंदोलनों की तुलना में अधिक दृश्यता दी? जब तक इन प्रश्नों के आंकड़े सामने नहीं आते, मीडिया की भूमिका पर अंतिम निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी।
56 लाख Followers का आंकड़ा सुनने में प्रभावशाली है। मगर Followers की संख्या को स्वतः 56 लाख समर्थक मान लेना पत्रकारिता की बुनियादी भूल होगी। यह पता लगाना होगा कि इन Accounts में कितने वास्तविक भारतीय उपयोगकर्ता हैं।कितने नए Accounts हैं? कितने Inactive हैं? Followers की Geographical Distribution क्या है?
Engagement rate कितना है? एक पोस्ट पर वास्तविक Comments और Shares कितने हैं? क्या Follower Growth विज्ञापन, Influencer Networks, Coordinated Sharing अथवा Organic Popularity से आई? जब तक ये आंकड़े उपलब्ध नहीं होते, 56 लाख Followers को “जनसमर्थन” कहना वैज्ञानिक रूप से उचित नहीं होगा।
यदि यह स्वतःस्फूर्त आंदोलन है तो उसका स्वागत होना चाहिए। यदि यह सामान्य वर्ग के युवाओं की वास्तविक बेचैनी है तो लोकतंत्र को उस बेचैनी को सुनना चाहिए। यदि इसमें आरक्षण की वर्तमान व्यवस्था में सुधार की जायज मांगें हैं तो उन पर तर्कपूर्ण बहस होनी चाहिए।
मगर यदि किसी राजनीतिक शक्ति ने सोशल मीडिया की कृत्रिम amplification, मीडिया की असमान visibility और सत्ता तक आसान पहुंच के माध्यम से एक आंदोलन को निर्मित या अत्यधिक विस्तारित किया है तो जनता को यह जानने का पूरा अधिकार है।
लोकतंत्र में आंदोलन की स्वतंत्रता जितनी महत्वपूर्ण है, आंदोलन की पारदर्शिता भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। इसलिए अभी यह कहना कि “आरक्षण हटाओ आंदोलन भाजपा का बनाया हुआ आंदोलन है” प्रमाण से आगे निकल जाना होगा। मगर यह कहना भी उतना ही गलत होगा कि “इसमें कोई राजनीतिक हित नहीं है।”
राजनीति में घटनाओं का समय, संसाधनों का प्रवाह, मीडिया की दृश्यता और सत्ता से संपर्क—चारों मिलकर कहानी कहते हैं।इस मामले में चारों मौजूद दिखाई दे रहे हैं। CJP समाप्त हुआ। RHA तेजी से उभरा। सोशल मीडिया पर असाधारण Follower Growth दिखाई दी। राष्ट्रीय मीडिया ने उसे व्यापक जगह दी। फिर आंदोलन के प्रतिनिधि भाजपा अध्यक्ष तक पहुंच गए।
क्या यह महज घटनाओं का संयोग है? हो सकता है। क्या यह Coordinated Political Amplification हो सकता है? इस संभावना को भी खारिज नहीं किया जा सकता। मगर लोकतंत्र में संदेह का समाधान आरोप से नहीं, डेटा से होता है। इसलिए अब जरूरत किसी राजनीतिक निष्कर्ष की नहीं, एक स्वतंत्र “मीडिया और राजनीतिक नेटवर्क ऑडिट” की है। कौन पैसा लगा रहा है? कौन प्रचार कर रहा है? कौन Amplification कर रहा है? कौन राजनीतिक लाभ उठा रहा है?
और सबसे महत्वपूर्ण—क्या आंदोलन जनता से सत्ता की ओर गया है या सत्ता से जनता की ओर भेजा गया है? इसका उत्तर ही तय करेगा कि ‘आरक्षण हटाओ आंदोलन’ भारतीय लोकतंत्र में उभरता हुआ वास्तविक सामाजिक असंतोष है या फिर आने वाली चुनावी राजनीति का एक नया डिजिटल प्रयोग।
फिलहाल इतना कहना पर्याप्त है—सवाल आरक्षण से बड़ा हो चुका है। सवाल अब यह है कि लोकतंत्र में जनमत बनता है या बनाया जाता है।
