देंग शियाओपिंग : माओ और चीन का पुनर्गठन, क्रांति से राज्य-निर्माण तक

देंग शियाओपिंग : माओ और चीन का पुनर्गठन, क्रांति से राज्य-निर्माण तक

चीन के आधुनिक इतिहास को समझना हो तो माओ ज़ेदोंग को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। 1949 में जब माओ के नेतृत्व में चीनी कम्युनिस्ट पार्टी ने सत्ता संभाली, तब चीन केवल एक नई सरकार के जन्म का साक्षी नहीं था। वह एक ऐसी सभ्यता के राजनीतिक पुनर्गठन की शुरुआत थी, जो लंबे समय से सामंती अवशेषों, विदेशी हस्तक्षेप, गृहयुद्ध, गरीबी और राजनीतिक विखंडन से जूझ रही थी।

माओ का लक्ष्य केवल सत्ता हासिल करना नहीं था। उनका उद्देश्य चीनी समाज की संरचना को बदलना था। भूमि, उत्पादन, शिक्षा, परिवार, महिलाओं की स्थिति, प्रशासन और राजनीतिक सत्ताकृहर क्षेत्र में उन्होंने पुराने चीन को बदलने का प्रयास किया। इस दृष्टि से माओ का दौर आधुनिक चीन के निर्माण की बुनियाद रखने वाला काल था। मगर इसी परियोजना में ऐसी नीतियां भी शामिल थीं जिनकी मानवीय कीमत अत्यंत भयावह साबित हुई।

वर्ष 1949 से पहले चीन विदेशी शक्तियों के हस्तक्षेप, जापानी आक्रमण, कुओमिन्तांग और कम्युनिस्टों के बीच लंबे गृहयुद्ध तथा आर्थिक अव्यवस्था से गुजर चुका था। ग्रामीण चीन में भूमिहीनता और असमानता व्यापक थी।

माओ ने सत्ता में आते ही भूमि सुधार को प्राथमिकता दी। बड़े जमींदारों की जमीन जब्त कर किसानों में बांटी गई। इससे ग्रामीण सत्ता-संबंधों में बड़ा परिवर्तन आया। पुराने भू-स्वामी वर्ग की सामाजिक शक्ति कमजोर हुई और कम्युनिस्ट राज्य का आधार मजबूत हुआ।

यहीं माओ की पहली बड़ी सफलता और पहली बड़ी समस्या साथ-साथ दिखाई देती है। भूमि सुधार ने सदियों पुरानी ग्रामीण असमानता को चुनौती दी, लेकिन यह प्रक्रिया हिंसा, जबरन अधिग्रहण और राजनीतिक दमन से भी जुड़ी थी। यानी सामाजिक परिवर्तन हुआ, मगर लोकतांत्रिक सहमति के रास्ते नहीं।

माओ ने चीन को एक मजबूत केंद्रीकृत राज्य में बदल दिया। प्रशासन, सेना, शिक्षा और उत्पादन पर पार्टी का नियंत्रण स्थापित किया गया। चीन की विशाल ग्रामीण आबादी को पहली बार आधुनिक केंद्रीकृत राज्य की संरचना में व्यवस्थित रूप से शामिल किया गया।

महिलाओं की स्थिति में भी महत्वपूर्ण कानूनी बदलाव हुए। विवाह और संपत्ति से जुड़े पुराने पितृसत्तात्मक ढांचे को चुनौती दी गई और महिलाओं को पुरुषों के बराबर कानूनी अधिकार देने की दिशा में कदम उठाए गए।

साक्षरता और प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार ने भी चीन के सामाजिक विकास में भूमिका निभाई। दूरदराज के ग्रामीण इलाकों तक स्वास्थ्य और शिक्षा की पहुंच बढ़ाने का प्रयास हुआ। इस अर्थ में माओ का चीन केवल राजनीतिक क्रांति का परिणाम नहीं था। यह एक व्यापक सामाजिक पुनर्गठन था।

1950 के दशक में माओ ने चीन के तीव्र औद्योगीकरण की दिशा पकड़ी। सोवियत संघ से तकनीकी सहायता और नियोजित अर्थव्यवस्था के मॉडल को अपनाया गया। भारी उद्योग, इस्पात, मशीन निर्माण, ऊर्जा और बुनियादी ढांचे को प्राथमिकता दी गई। चीन एक कृषि प्रधान और गरीब अर्थव्यवस्था से आधुनिक औद्योगिक राष्ट्र बनने की दिशा में बढ़ने लगा। मगर समस्या तब पैदा हुई जब आर्थिक विकास को राजनीतिक अभियान का रूप दे दिया गया।

1958 में माओ ने Great Leap Forward शुरू किया। लक्ष्य था चीन को बहुत कम समय में एक कृषि प्रधान देश से आधुनिक औद्योगिक शक्ति में बदल देना। गांवों को विशाल कम्यूनों में संगठित किया गया। कृषि और उद्योग के उत्पादन लक्ष्य असाधारण रूप से ऊंचे रखे गए। स्थानीय अधिकारियों पर लक्ष्य पूरा करने का राजनीतिक दबाव था। परिणामस्वरूप कई जगह वास्तविक उत्पादन से कहीं अधिक आंकड़े ऊपर भेजे गए।

राज्य ने उन आंकड़ों के आधार पर अनाज की खरीद की। ग्रामीण इलाकों में खाद्यान्न की उपलब्धता घटती गई। खराब मौसम, नीतिगत विफलता, जबरन सामूहिकीकरण और प्रशासनिक विकृतियों ने मिलकर भयंकर अकाल पैदा किया। 1959 से 1961 के बीच चीन में भूख से करोड़ों लोगों की मृत्यु हुई। मृत्यु के आंकड़े इतिहासकारों में अलग-अलग हैं, मगर यह निर्विवाद है कि यह आधुनिक इतिहास की सबसे बड़ी मानवीय त्रासदियों में से एक थी।

यह माओ की सबसे बड़ी नीतिगत विफलताओं में गिनी जाती है। सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि इतनी बड़ी विफलता के बावजूद व्यवस्था ने माओ की नीति को समय रहते क्यों नहीं रोका? उत्तर चीन की राजनीतिक संरचना में छिपा थाकृजहां पार्टी के भीतर असहमति धीरे-धीरे राजनीतिक खतरे के रूप में देखी जाने लगी थी।

1966 में माओ ने सांस्कृतिक क्रांति शुरू की। इस बार निशाना केवल आर्थिक व्यवस्था नहीं बल्कि स्वयं कम्युनिस्ट पार्टी और समाज में मौजूद कथित ‘बुर्जुआ’ और प्रतिक्रियावादी तत्व थे। युवा Red Guards को आंदोलन में उतारा गया। शिक्षक, बुद्धिजीवी, अधिकारी और पार्टी के वरिष्ठ नेता तक सार्वजनिक अपमान और हिंसा के शिकार बने।

लियू शाओछी जैसे शीर्ष नेता सत्ता से बाहर कर दिए गए। शिक्षा व्यवस्था बाधित हुई। विश्वविद्यालय और सांस्कृतिक संस्थान प्रभावित हुए। चीन का एक पूरा दशक राजनीतिक उथल-पुथल में गुजर गया। विडंबना यह थी कि जिस क्रांति का उद्देश्य समाज को वैचारिक रूप से शुद्ध करना था, उसने स्वयं राज्य की संस्थाओं को कमजोर कर दिया।

माओ की आलोचना करते समय एक दूसरी ऐतिहासिक सच्चाई को भी नहीं भूलना चाहिए। 1949 के बाद चीन ने राजनीतिक एकीकरण हासिल किया। राज्य की प्रशासनिक क्षमता बढ़ी। प्राथमिक स्वास्थ्य और शिक्षा के क्षेत्र में विस्तार हुआ। महिलाओं की कानूनी स्थिति बदली। औद्योगिक आधार तैयार हुआ। चीन की राष्ट्रीय संप्रभुता मजबूत हुई।

सबसे महत्वपूर्ण परिवर्तन शायद यह था कि चीन की जनता को पहली बार आधुनिक राष्ट्र-राज्य की एक व्यापक राजनीतिक परियोजना के भीतर संगठित किया गया। माओ ने चीन को केवल आर्थिक रूप से नहीं बदला; उन्होंने चीनी समाज में यह विश्वास पैदा किया कि चीन स्वयं अपनी नियति तय कर सकता है।

माओ की ऐतिहासिक विडंबना यही है कि उन्होंने जिस क्रांतिकारी ऊर्जा से चीन को पुनर्गठित किया, वही ऊर्जा कई बार विनाशकारी भी साबित हुई। उन्होंने असमानता को चुनौती दी, मगर राजनीतिक स्वतंत्रता को सीमित किया। उन्होंने किसानों को सत्ता की क्रांति का आधार बनाया, मगर ळतमंज स्मंच थ्वतूंतक में वही किसान सबसे बड़ी कीमत चुकाने को मजबूर हुए।

उन्होंने सामंती और पारंपरिक सत्ता-संरचनाओं को तोड़ा, मगर उनके शासन में व्यक्तिपूजा और केंद्रीकृत सत्ता का नया ढांचा विकसित हुआ। उन्होंने समाज को बदलने के लिए निरंतर क्रांति का सिद्धांत अपनाया, मगर इस प्रक्रिया में संस्थाओं की स्थिरता और विशेषज्ञता कमजोर हुई।

माओ की मृत्यु 1976 में हुई। अगले कुछ वर्षों में देंग शियाओपिंग के नेतृत्व में चीन ने आर्थिक नीति की दिशा बदलनी शुरू की। देंग ने माओ की राजनीतिक विरासत को पूरी तरह नष्ट नहीं किया। उन्होंने कम्युनिस्ट पार्टी की सत्ता को बनाए रखा, लेकिन अर्थव्यवस्था में बाजार, निजी पहल, विदेशी निवेश और वैश्विक व्यापार के लिए जगह बनाई।

यह परिवर्तन अपने आप में माओ की विरासत पर एक ऐतिहासिक टिप्पणी था। चीन ने मानो स्वीकार किया कि क्रांति से राज्य बनाया जा सकता है, मगर समृद्धि के लिए संस्थागत स्थिरता, आर्थिक प्रोत्साहन और व्यावहारिक नीतियां भी आवश्यक हैं।

माओ का चीन एक विरोधाभास है। उन्होंने एक कमजोर, विभाजित और निर्धन चीन को एक केंद्रीकृत, आत्मविश्वासी और औद्योगिक राष्ट्र में बदलने की नींव रखी। मगर इसी प्रक्रिया में राजनीतिक केंद्रीकरण, वैचारिक कट्टरता और गलत आर्थिक प्रयोगों ने करोड़ों लोगों को असाधारण कष्ट भी दिया।

इसलिए माओ को समझने का सबसे संतुलित तरीका शायद यही है कि उन्हें चीन के निर्माता और उसकी कुछ सबसे बड़ी मानवीय त्रासदियों के राजनीतिक जिम्मेदार-दोनों रूपों में देखा जाना चाहिए। माओ ने चीन को बदल दिया। मगर इतिहास का अगला अध्याय यह साबित करने वाला था कि चीन को आगे बढ़ाने के लिए केवल क्रांति पर्याप्त नहीं थी। उसे सुधार की भी जरूरत थी।

यहीं से देंग शियाओपिंग का दौर शुरू होता है-जहां चीन ने माओ की राजनीतिक विरासत को बचाते हुए उनकी आर्थिक नीतियों से धीरे-धीरे दूरी बनानी शुरू की।

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