गौतम चौधरी
इस्लामी फ़िक़्ह और भारतीय लोकतंत्र दो अलग विचारधाराओं और व्यवस्थाओं के प्रतिनिधि हैं। इस्लामी फ़िक़्ह का आधार कुरान, हदीस, इज्मा और कियास जैसे धार्मिक स्रोत हैं, जबकि भारतीय लोकतंत्र संविधान, जनसत्ता, समानता, स्वतंत्रता और न्याय के सिद्धांतों पर आधारित है। दोनों की नींव और स्रोत अलग हैं, फिर भी न्याय, जनकल्याण, जवाबदेही और मानव गरिमा जैसे कुछ मूल्यों में समानता दिखाई देती है। इस समानता पर भी तसल्ली से चर्चा होनी चाहिए।
इस मामले में बरेवली फिरके के मुफ्ती तुफैल खान कादिरी साहब कहते हैं, ‘‘इस्लामी फ़िक़्ह में न्याय को अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। इस्लामिक पवित्र ग्रंथ कुरान में न्याय और भलाई का आदेश दिया गया है। इस्लामी व्यवस्था में शासक और आम नागरिक, सभी को न्याय के दायरे में रखने की धारणा महत्वपूर्ण रही है। हज़रत उमर (रज़ि.) के दौर की अनेक घटनाएँ न्याय के प्रति इसी प्रतिबद्धता का उदाहरण हैं।’’
इधर भारतीय लोकतंत्र भी ‘कानून के शासन’ पर आधारित है। संविधान सभी नागरिकों को समानता और कानून के समान संरक्षण का अधिकार देता है। इस दृष्टि से न्याय और समानता दोनों व्यवस्थाओं के मूल्य एक जैसे हैं।
इस्लामिक विद्वानों का दावा है कि इस्लामी चिंतन में ‘शूरा’ अर्थात परामर्श का महत्वपूर्ण स्थान है। पवित्र कुरान अपने अनुयायियों को निर्देशित करते हुए कहता है, ‘‘विश्वासियों के कार्य आपसी मशवरे से चलते हैं।’’ खि़लाफ़त-ए-राशिदा के दौर में शासन में परामर्श के अनेक उदाहरण मिलते हैं।
भारतीय लोकतंत्र में जनभागीदारी चुनाव, संसद, विधानसभाओं और स्थानीय स्वशासन के माध्यम से सुनिश्चित होती है। इस अर्थ में शूरा और लोकतांत्रिक जनभागीदारी में वैचारिक समानता है, हालांकि दोनों की संस्थागत संरचना अलग है।
इस्लामी विधि-चिंतन में मानव जीवन, संपत्ति, सम्मान और धर्म की रक्षा को महत्वपूर्ण माना गया है। बाद के इस्लामी विधिशास्त्र में ‘मक़ासिद-ए-शरीअत’ की अवधारणा के माध्यम से जीवन, धर्म, बुद्धि, वंश और संपत्ति की रक्षा को प्रमुख उद्देश्य माना गया।
भारतीय संविधान भी समानता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, धार्मिक स्वतंत्रता और जीवन तथा व्यक्तिगत स्वतंत्रता जैसे मौलिक अधिकारों की गारंटी देता है। इस प्रकार मानव गरिमा और अधिकारों की रक्षा दोनों परंपराओं में महत्वपूर्ण स्थान रखती है।
इस्लामी राजनीतिक चिंतन में शासक की जवाबदेही पर बल दिया गया है। हज़रत अबूबक्र (रज़ि.) का यह कथन कि यदि मैं सही राह पर चलूँ तो मेरा साथ दो और यदि मैं भटक जाऊँ तो मुझे सुधारो, इसी भावना का उदाहरण है। भारतीय लोकतंत्र में सरकार संसद, न्यायपालिका, मीडिया और जनता के प्रति जवाबदेह होती है। चुनाव जनता को सरकार बदलने का अधिकार देते हैं।
इसी प्रकार इस्लामी व्यवस्था में ज़कात, सदक़ा और अन्य आर्थिक व्यवस्थाओं के माध्यम से गरीब और कमजोर वर्गों की सहायता पर बल दिया जाता है। भारतीय लोकतंत्र में भी कल्याणकारी योजनाओं, आरक्षण और सामाजिक न्याय की नीतियों के माध्यम से कमजोर वर्गों के उत्थान का प्रयास किया जाता है।
हालांकि आलेख के प्रथम चरण में ही स्पष्ट कर दिया गया है कि इस्लामिक फिक्ह और भारतीय संविधान दो अवधारणाओं का नेतृत्व करता है लेकिन बड़े पैमाने पर समानताएं हैं। इससे यह कतई साबित नहीं होता है कि इस्लामिक फिक्ह की ही प्रतिकीर्ति भारतीय संविधान है, या फिर भारतीय संविधान की रचना में इस्लामिक फिक्ह की बड़ी भूमिका है।
उपर व्याख्यायित समानताओं के बावजूद दोनों व्यवस्थाओं के बीच कुछ बुनियादी अंतर भी हैं। इस्लामी फ़िक़्ह धार्मिक स्रोतों पर आधारित विधिशास्त्र है, जबकि भारतीय लोकतंत्र संविधान पर आधारित मानवीय और परिवर्तनशील व्यवस्था है। इस्लामी राजनीतिक चिंतन में ईश्वरीय मार्गदर्शन को सर्वाेच्च महत्व प्राप्त है, जबकि भारतीय लोकतंत्र में संवैधानिक सत्ता और जनसत्ता केंद्रीय भूमिका निभाते हैं।
इसी तरह इस्लामी फ़िक़्ह में धर्म, नैतिकता और कानून के बीच गहरा संबंध है। भारतीय संवैधानिक व्यवस्था धर्मनिरपेक्ष है, जहाँ राज्य सभी धर्मों के प्रति समान संवैधानिक दृष्टिकोण रखता है और नागरिकों को धार्मिक स्वतंत्रता प्रदान करता है, इस्लामिक फिक्ह में इस प्रकार की स्वतंत्रता का कतिपय अभाव दिखता है।
इस्लामी फ़िक़्ह और भारतीय लोकतंत्र को पूरी तरह समान या परस्पर विरोधी मानना उचित नहीं होगा। दोनों की उत्पत्ति, स्रोत और संस्थागत संरचना अलग हैं, लेकिन न्याय, समानता, जनकल्याण, जवाबदेही और मानव गरिमा जैसे मूल्यों में संवाद की पर्याप्त संभावनाएँ हैं।
भारतीय लोकतंत्र की संवैधानिक व्यवस्था में विभिन्न धार्मिक और दार्शनिक परंपराओं के लोग समान नागरिक के रूप में रहते हैं। इसलिए आवश्यकता इस बात की है कि धार्मिक आस्थाओं और संवैधानिक मूल्यों के बीच टकराव के बजाय रचनात्मक संवाद स्थापित हो। न्याय, मानव गरिमा, स्वतंत्रता, सामाजिक उत्तरदायित्व और शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व जैसे साझा मूल्यों को संविधान की सर्वाेच्चता के भीतर समझना ही भारत जैसे बहुलतावादी समाज के लिए अधिक उपयोगी रास्ता हो सकता है।
