गौतम चौधरी
रांची के बहूबाजार की एक पुरानी इमारत पर लिखा “संगीत रिकार्डिंग कंपनी” केवल एक जर्जर बोर्ड नहीं, बल्कि भारतीय संगीत इतिहास के उन पन्नों की ओर संकेत है, जिन्हें हमने पढ़ना लगभग छोड़ दिया है। यह स्मरण कराता है कि सांस्कृतिक विरासत का निर्माण केवल महानगरों की चकाचौंध में नहीं, बल्कि छोटे शहरों की शांत गलियों में भी हुआ है।
भारतीय संगीत उद्योग के इतिहास को प्रायः कोलकाता और मुंबई जैसे बड़े केंद्रों तक सीमित कर दिया जाता है। किंतु बीसवीं सदी के आरंभिक दशकों में जब विदेशी कंपनियाँ इस क्षेत्र पर प्रभुत्व बनाए हुए थीं, तब चंडी चरण साहा द्वारा 1932 में स्थापित हिंदुस्थान रिकॉर्ड्स ने स्वदेशी चेतना के साथ इस क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण हस्तक्षेप किया। इस पहल ने न केवल रवीन्द्र संगीत, बल्कि शास्त्रीय और लोकप्रिय संगीत को रिकॉर्ड कर व्यापक समाज तक पहुँचाने का मार्ग प्रशस्त किया। यह वह समय था जब संगीत पहली बार तकनीक के माध्यम से घर-घर पहुँचने लगा।
“संगीत रिकॉर्डिंग कंपनी” का इतिहास दरअसल किसी एक संस्था की कहानी नहीं, बल्कि तकनीक, व्यापार और संस्कृति के मिलन से विकसित हुए पूरे उद्योग का इतिहास है। यह उस परिवर्तन की कहानी है, जिसमें संगीत दरबारों और मंचों से निकलकर रिकॉर्ड पर कैद हुआ और आम लोगों के घरों तक पहुँचा।
19वीं सदी के अंत में Thomas Edison ने फोनोग्राफ का आविष्कार किया, जिसने पहली बार ध्वनि को रिकॉर्ड और पुनः चलाने की क्षमता दी। इसके बाद Emile Berliner ने ग्रामोफोन और फ्लैट डिस्क रिकॉर्ड विकसित किए—यही आधुनिक रिकॉर्डिंग उद्योग की नींव बने।
भारत में रिकॉर्डिंग उद्योग की शुरुआत 1902 में हुई, जब Gauhar Jaan ने कोलकाता में अपनी आवाज रिकॉर्ड करवाई। यह भारत की पहली व्यावसायिक रिकॉर्डिंग मानी जाती है। उस समय Gramophone Company of India (बाद में HMV) जैसी विदेशी कंपनियों का दबदबा था। इन कंपनियों ने भारत के विभिन्न शहरों में अस्थायी स्टूडियो बनाकर कलाकारों की रिकॉर्डिंग की और ग्रामोफोन रिकॉर्ड बेचने शुरू किए। धीरे-धीरे संगीत एक “उत्पाद” बन गया।
1930 के दशक में भारतीय उद्यमियों ने इस क्षेत्र में कदम रखना शुरू किया। 1932 में Chandi Charan Saha ने Hindusthan Records की स्थापना की। यह भारत की पहली स्वदेशी रिकॉर्ड कंपनियों में से एक थी।
इसी परिप्रेक्ष्य में रांची का महत्व उभरता है। उस दौर में यह शहर केवल भौगोलिक इकाई नहीं था, बल्कि बंगाली बुद्धिजीवियों और व्यापारियों का एक सांस्कृतिक पड़ाव भी था। प्राकृतिक सौंदर्य और अनुकूल जलवायु के कारण यह कोलकाता से जुड़े लोगों के लिए विश्राम और सृजन का स्थल बन चुका था। ऐसे में यह संभावना निराधार नहीं लगती कि संगीत और रिकॉर्डिंग उद्योग से जुड़े लोगों का यहाँ आना-जाना रहा हो।
बहूबाजार की उक्त इमारत इसी संभावित इतिहास की एक मूक साक्षी है। यह स्पष्ट नहीं है कि वहाँ किसी बड़े रिकॉर्डिंग संस्थान की शाखा थी, कोई स्थानीय स्टूडियो संचालित होता था, या यह केवल रिकॉर्डों के वितरण और बिक्री का केंद्र रहा होगा। किंतु यह तथ्य महत्वपूर्ण है कि 1930 से 1950 के बीच देश के कई छोटे शहरों में संगीत से जुड़े ऐसे लघु केंद्र उभरे, जिन्होंने बड़े संस्थानों के प्रभाव में रहकर भी अपनी स्वतंत्र पहचान बनाई।
आज, जब हम इतिहास को पुनर्परिभाषित करने की बात करते हैं, तो यह आवश्यक हो जाता है कि हम इन अनदेखे, अनसुने स्थलों की ओर भी ध्यान दें। बहूबाजार की यह इमारत हमें चुनौती देती हैकृक्या हम अपने स्थानीय इतिहास को समझने और सहेजने के लिए पर्याप्त उत्सुक हैं? क्या हम उन कहानियों को खोजने का प्रयास करेंगे, जो आधिकारिक अभिलेखों में दर्ज नहीं हो सकीं?
यह समय है कि स्थानीय शोधकर्ता, इतिहासकार और नागरिक मिलकर ऐसे स्थलों की पड़ताल करें। पुराने दस्तावेज़ों, मौखिक इतिहास और भौतिक अवशेषों के माध्यम से शायद हम उस सांस्कृतिक विरासत को पुनर्जीवित कर सकें, जो समय के साथ धुंधली हो गई है।
अंततः बहूबाजार की यह इमारत हमें यही सिखाती है कि इतिहास केवल भव्य इमारतों और प्रसिद्ध नामों में नहीं बसता, वह उन साधारण दीवारों पर भी अंकित होता है, जिन्हें हम अक्सर अनदेखा कर देते हैं। आवश्यकता केवल इतनी है कि हम ठहरकर उन्हें पढ़ने की कोशिश करें।
