उषा जैन शीरीं
सेक्स को लेकर आज की युवा पीढ़ी में जो खुलापन आया है वह जग जाहिर है। लद गए वो जमाने शर्म और हया के जब विवाह की बात ही सुनकर लड़के लड़कियां लजा जाते थे। जमाने की हवा, संचार माध्यमों का गैरजिम्मेदार रवैय्या, अश्लीलता पर किसी तरह की रोक टोक न होना, आजादी को मनमानी करने का लाइसेंस समझ लेना, ये सब बातें आज की युवापीढ़ी के भटकने का कारण हैं। यही कारण है कि कुंआरी माताओं की संख्या में तेजी से वृद्धि हुई है।
सेक्स को लेकर एक परिपक्व नजरिए से चर्चा करने में लोगों को एतराज है हालांकि उसके दुष्परिणाम भी उन्हें भुगतने पड़ते हैं। न ही शिक्षक, न मां बाप बच्चों को सेक्स के बारे में जानकारी देने की जहमत उठाना चाहते हैं क्योंकि सेक्स पर बात करना वे वर्जित विषय ही मान कर चलते हैं।
बड़े शहरों में जहां लड़कियां अकेली रहकर नौकरी कर रही होती हैं, न उनकी व्यक्तिगत जिन्दगी से कोई सरोकार रखता है न वे इसे पसंद करती हैं। कुछ महानगरीय जीवन ढर्रा भी ऐसा है जहां सब अपने में ही व्यस्त रहते हैं। ऐसे में लड़कियों के लिए स्वच्छंद हो जाना स्वाभाविक सी बात है।
पाश्चात्य संस्कृति का प्रभाव और अच्छी नौकरी का खुला पैसा होने के कारण कुछ लोग जो ऐशपरस्ती के कायल हैं, फ्री सेक्स अपनाकर जीते हैं, बावजूद यह जानने के कि इससे एड्स जैसी भयंकर बीमारी का अंदेशा हो सकता है।
उच्चशिक्षा के कारण आजकल लेट मैरिज का प्रचलन होने से युवाओं में सेक्स की संतुष्टि न होने पर कई प्रकार की कुंठाएं पनपने लगती हैं। लड़कियां कई बार डिप्रेशन में आ जाती हैं। लड़के अपना आक्रोश बेमतलब मां बहनों पर निकालने लगते हैं या गलत सोहबत में पड़कर अपना कैरियर बर्बाद कर लेते हैं।
कई बार आत्महत्या का कारण अत्यधिक एकाकीपन होता है। पेट की भूख की तरह ही सेक्स की भूख भी कुदरत ने जानवर, मनुष्य सभी को समान रूप से दी है जिसकी संतुष्टि के लिये ही विवाह प्रथा का जन्म हुआ है। निस्संदेह हमारे कुछ रीतिरिवाज विज्ञान की कसौटी पर आज भी उतने ही खरे हैं जैसे पहले थे लेकिन वक्त के बदलाव, आधुनिकता की हवा और बदली जीवन शैली में पुराना सब कुछ तितर-बितर होकर रह गया।
आज सेक्स को लेकर जो उन्मुक्तता समाज में व्याप्त हो रही है, निस्संदेह इसका अंजाम दुखद ही होगा। जानवर और इंसान की सेक्स भावना में मूलभूत अंतर है उसके साथ जुड़ने वाली भावनात्मकता। अब जैसा कि आजकल के कई युवक युवतियां इसे महज शारीरिक जरूरत भर मानकर चलने लगे हैं, यह इंसान को जानवर की श्रेणी में लाने जैसा ही होगा।
कौमार्य के साथ जुड़ी पवित्रता की भावना उसका सबसे बड़ा आकर्षण था। इसे महत्त्वहीन मानकर चलने से सब कुछ मेकेनिकल जैसा ही प्रतीत होगा। जीवन की बदरंगता में यह केवल और इजाफा ही होगा। आज ज्यादातर युवाओं के सामने यौन शुचिता की बात दकियानूसी नजर आती है लेकिन वे जीवन की जिस खूबसूरती से महरूम हो रहे हैं, इसका उन्हें इल्म नहीं।
(उर्वशी)
