गौतम चौधरी
हाल के दिनों में वियतनाम की राष्ट्रीय सभा में नागरिक पंजीकरण कानून (संशोधन) को लेकर हुई चर्चा ने एक महत्वपूर्ण और जटिल मुद्दे को सामने लाया है। दरसअल, समलैंगिक विवाह और उससे जुड़ी कानूनी अस्पष्टताएँ, इस जटिलता के केन्द्र में है। यह बहस केवल विधायी व्यवस्था तक ही सीमित नहीं है, बल्कि बदलते सामाजिक यथार्थ, वैश्विक मानकों और नागरिक अधिकारों के बीच संतुलन खोजने की भी चुनौती है।
राष्ट्रीय सभा की प्रतिनिधि गुयेन थी थू डुंग ने जिस “कानूनी खामी” की ओर ईशारा किया, वह आज के वैश्विक संदर्भ में अत्यंत प्रासंगिक है। वर्तमान मसौदा कानून में जन्म पंजीकरण से जुड़े प्रावधान पारंपरिक पारिवारिक संरचना पर आधारित हैं, जहाँ माता-पिता की परिभाषा सीमित रूप में दी गई है। जबकि वास्तविकता यह है कि विश्व के अनेक देशों में समलैंगिक विवाह को मान्यता मिल चुकी है और ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को भी कानूनी पहचान के अधिकार दिए जा रहे हैं। ऐसे में, यदि कोई समलैंगिक दंपत्ति-जिसका विवाह विदेश में वैध है, वियतनाम लौटकर अपने बच्चे का पंजीकरण कराना चाहता है, तो वर्तमान कानून उनके अधिकारों की समुचित रक्षा नहीं कर पाता। यही वह बिंदु है जहाँ “कानूनी खामी” स्पष्ट रूप से सामने आती है।
प्रतिनिधि ट्रान थी न्ही हा ने एक और महत्वपूर्ण पहलू उठाया-जब किसी नागरिक पंजीकरण घटना (जैसे विवाह) को विदेशी कानून मान्यता देता है, लेकिन घरेलू कानून नहीं, तब क्या किया जाए?
यह प्रश्न केवल तकनीकी नहीं, बल्कि सिद्धांतगत है। क्या राज्य को अपने नागरिकों के उन अधिकारों को स्वीकार करना चाहिए, जो उन्हें विदेश में प्राप्त हुए हैं? या फिर उसे अपने पारंपरिक कानूनी ढांचे को ही प्राथमिकता देनी चाहिए? स्पष्ट है कि इस प्रकार के मामलों के लिए कानून में ठोस मार्गदर्शक सिद्धांतों का अभाव भविष्य में अनेक विवादों को जन्म दे सकता है।
नागरिक पंजीकरण कानून को “मानव जीवन का कानून” कहना इस बात को रेखांकित करता है कि यह केवल दस्तावेज़ी प्रक्रिया नहीं, बल्कि व्यक्ति की पहचान, अधिकार और अस्तित्व से जुड़ा प्रश्न है। इसी संदर्भ में, कम्यून स्तर पर पूर्ण विकेंद्रीकरण, अधिकारियों के प्रशिक्षण और उन्हें उचित पारिश्रमिक देने की आवश्यकता भी सामने आई। यदि कानून का क्रियान्वयन ही कमजोर रहेगा, तो उसके प्रावधान चाहे जितने प्रगतिशील हों, उनका लाभ नागरिकों तक नहीं पहुँच पाएगा।
इस बहस में एक और महत्वपूर्ण आयाम उभरकर सामने आया-समानता और समावेशन का।
दूरदराज और वंचित क्षेत्रों में तकनीकी ढांचे और शिक्षा की कमी के कारण डिजिटल नागरिक पंजीकरण प्रणाली प्रभावी ढंग से लागू नहीं हो पा रही है। ऐसे में मोबाइल पंजीकरण टीमों जैसी पहलें स्वागतयोग्य हैं, जो प्रशासन को लोगों के करीब ले जाती हैं।
साथ ही, जातीयता के पुनर्निर्धारण, डेटा के उपयोग में पारदर्शिता, और कमजोर वर्गों को प्राथमिकता देने जैसे सुझाव यह दर्शाते हैं कि कानून को अधिक संवेदनशील और न्यायपूर्ण बनाने की दिशा में सोच विकसित हो रही है।
वियतनाम में एलजीबीटी समुदाय की उपस्थिति (लगभग 2 प्रतिशत) यह संकेत देती है कि यह मुद्दा सीमित दायरे का नहीं है। समलैंगिक विवाह और उनके बच्चों के अधिकार आने वाले समय में नीति-निर्माण का महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकते हैं। यह आवश्यक नहीं कि हर समाज तुरंत वैश्विक प्रवृत्तियों को अपनाए, लेकिन यह भी उतना ही आवश्यक है कि वह बदलती वास्तविकताओं से आँख न मूँदे। कानून का कार्य केवल परंपरा की रक्षा करना नहीं, बल्कि समाज में उत्पन्न नई परिस्थितियों का न्यायपूर्ण समाधान देना भी है।
यहां बता दें कि वियतनाम एक साम्यवादी राजनीतिक चिंतन के द्वारा शासित राज्य है। यहां के शासन में प्रगतिशीलता को ज्यादा तबज्जो दिया जा रहा है। वैश्विक व्यवस्था में आजकल समलैंगिकता को प्रगतिशील चिंतन माना जा रहा है, हालांकि कई बार यह साबित हो चुका है कि यह एक प्रकार की मानसिक बीमारी है, बावजूद इसके कुछ उत्तर आधुनिक और प्रगतिशील सोच के लोग इसे आगे बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं और कानूनी तौर पर बैध बनाने की दिशा में पहल करते देखे जा रहे हैं। हालांकि कुछ साम्यवादी चिंतन के लोगों का भी मानना है कि समलैंगिकता पूंजीवादी सोच की उपज है।
समलैंगिक विवाह और नागरिक पंजीकरण से जुड़ी कानूनी खामियाँ केवल एक देश की समस्या नहीं, बल्कि वैश्विक संक्रमण का संकेत हैंकृजहाँ पारंपरिक कानून और आधुनिक सामाजिक वास्तविकताएँ आमने-सामने खड़ी हैं।
वियतनाम की राष्ट्रीय सभा में उठे ये प्रश्न इस दिशा में एक सकारात्मक पहल हैं। अब आवश्यकता इस बात की है कि कानून को अधिक स्पष्ट, समावेशी और भविष्यदृष्टि वाला बनाया जाए, ताकि वह प्रत्येक नागरिककृचाहे उसकी पहचान या पारिवारिक संरचना कुछ भी होकृके अधिकारों की रक्षा कर सके।
