आइए हम बताते हैं इन चकाचौंध के पीछे कितने दाग है

आइए हम बताते हैं इन चकाचौंध के पीछे कितने दाग है

उमेश नजीर

शहरों की चकाचौंध के पीछे कितने दाग हैं, इसकी गिनती बहुत कम ही लोग करते हैं। जब इस बात को यहां दर्ज किया जा रहा है, तो इस तथ्य को बताने की कोशिश की जा रही है कि इस चकाचौंध के लिए बिजली का उत्पादन जरूरी है। इस उत्पादन के बगैर शहरों की चमक-दमक बीरानेपन में बदल जायेगा। इसलिए शहर में चहल-पहल के मूल आधार को समझना जरूरी है और इसके लिए कौन त्याग कर रहा है, उसे भी मान्यता देने की जरूरत है।

बिजली का उत्पादन का स्रोत अपने आरंभिक काल से ही कोयला रहा है, जो आज भी बरकरार है। इस कोयले के बगैर देश के अंदर बिजली उत्पादन का बड़ा हिस्सा कम से कम अब तक तो संभव नहीं है। शायद आने वाले दिनों में भी इसकी संभावनाएं कम दिखती है, क्योंकि अधिकतर बिजली उत्पादक कंपनियों का ध्यान कोयले पर ही केंद्रित है। देष के कई बिजली कंपनियां जो कल तक सरकारी उपकरण कोल इंडिया लिमिटेड (सीआइएल) से कोयला खरीदती थी, वे खुद को कोयला उत्खनन में शामिल कर लिया है।

आखिर क्यों कोयला उत्खनन में ये कंपनियां शामिल होना चाहती है? इसका स्पष्ट जवाब है कि कोयला उत्खनन की धुन में वहां रहने वाली आबादी व जीव-जंतु तथा भौगोलिक व भू-गर्भीय संरचनाओं को एक ‘ओवरबर्डेन’ यानी कि एक बोझ मानने की परंपरा रही है। इस परंपरा के चलते उनकी हालत को बराबर नज़रअंदाज़ किया गया है। इसे समझना हमारे लिए जरूरी है, क्योंकि आज वहां की आबादी के कष्टों के ऐतिहासिक अनुभवों ने उन्हें एक ऐसी समझ दे दी है कि इस तरह का खनन उनके लिए अंधकारमय भविष्य का सृजन करता है।

उनकी इस समझ की पुष्टि अप्रैल-जून 2019 में एक अध्ययन- हेल्थ एडं इवायरमेंटल इम्पैक्ट आॅफ कोल माइनिंग (कोयला उत्खनन का स्वास्थ्य संबंधी और पर्यावरणीय प्रभाव) भी करता है। इस अध्ययन को पीपुल फस्र्ट कलेक्टिव, इंडिया (पीएफसीआई) के चिकित्सकों के एक समूह ने किया है। इस समूह में डाॅ. मनन गांगुली, डाॅ. प्रवीर चटर्जी, डाॅ. समरजीत जेना ने किया है। इसके संयोजक श्वेता नारायण थी। यह अध्ययन झारखंड के कोयला क्षेत्र रामगढ़ जिला के मांडू प्रखंड में किया गया है।

मांडू प्रखंड में दशकों से एक सार्वजनिक कंपनी- सीसीएल और एक निजी कंपनी- टाटा स्टील लिमिटेड कोयला उत्खनन कर रही है। अध्ययन के लिए यहां के 661 लोगों का स्वास्थ्य संबंधी सर्वेक्षण किये गये हैं। ये लोग चरही, दुरूकसमार, तापिन, परेज कोयला खदान से 50 मीटर दूर रहते हैं। इनके स्वास्थ्य संबंधी आंकड़ों की तुलना के लिए वहां से 40 किलोमीटर दूर देवघर जिला के उस इलाके को चयनित किया गया है, जहां खनन का प्रभाव नहीं है। इस अध्ययन के दौरान इस बात का खास ध्यान रखा गया है कि दोनों जगह पर, जिन लोगों के स्वास्थ्य सर्वेक्षण हों, उनकी सामाजिक-आर्थिक तथा सामुदायिक समानता हो, ताकि निष्कर्ष में कोई त्रुटि न रहे।

यह अध्ययन इस बात पर सहमत है कि कोयला क्षेत्र में टीबी मरीज़ों की दर राष्ट्रीय औसत से अधिक है। इसके अलावा इन लोगों में आँख, बाल और चर्मरोग के लक्षण पाये गये हैं। साथ ही जोड़ के दर्द और पेट की बीमारी यहां पर आम है। दोनों इलाकों के आंकड़ों से यह स्पष्ट हुआ है कि ये बीमारियाँ वहां के निवासियों में इसलिए है कि वे लोग भोजन, पानी और हवा के जरिये कोयला के धूल कण में मौजूद ज़हरीली तत्वों को अपने अंदर ले रहे हैं।

पर्यावरणीय अध्ययन का सारांष है कि इस क्षेत्र के हवा, पानी, मिट्टी में प्रदूषक तत्वों की मात्रा राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय मानकों से काफी अधिक है। आर्सेनिक, कैडमियम, वैनेडियम, मैंगनीज, क्रोमियम, निकेल जैसे तत्व मिट्टी में हैं। पानी में अल्युमिनियम और लोहा जैसे तत्व हैं। इनकी उपस्थिति सिर्फ मानव के लिए नहीं, बल्कि मानवेत्तर प्राणियों के अस्तित्व के लिए खतरनाक है।
एक और अध्ययन का मानना है कि कोयला उत्खनन की वर्तमान पद्धति- ओपेनकास्ट मेथड (पोखरिया खदान) पर्यावरण और प्रकृति के लिए विनाशकारी है। इससे जैव-विविधता को कभी भरपाई नहीं होने वाला नुकसान होगा, जो निरंतर प्राकृतिक सृजनषीलता और पृथ्वी में जीवन के स्थायित्व के लिए अवरोध खड़ा कर रही है। इससे कई त्रासदियां उत्पन्न होंगी। कुछ भयावह उदाहरण हमारे सामने है।

इसलिए जरूरी है कि अगर शहरों की चकाचौंध और चहल-पहल को बनाये रखने के साथ-साथ हमें पृथ्वी पर जीवन के स्थायित्व को बनाये रखना है, तो हमें बिजली उत्पादन के विकल्प पर गंभीरता से विचार करना होगा। अन्यथा शहरों के चकाचौंध के दाग कहीं इतने गहरे न हो जायें कि वह लाइलाज बीमारी में बदल जायें और हम किंकत्र्तव्यमूढ बन कर रह जायें।

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