आन्दोलन की आड़ में कहीं अन्नदाताओं का अहित तो नहीं कर रहे विप्लवकारी नेता?

आन्दोलन की आड़ में कहीं अन्नदाताओं का अहित तो नहीं कर रहे विप्लवकारी नेता?

राजेन्द्र बहादुर सिंह राणा  

भारत में कृषि लगभग 55 प्रतिशत जनसंख्या के जीविकोपार्जन का एक प्रमुख स्रोत है। अगर हम इतिहास में देखें तो मुग़लकाल से ही कृषि की हालत दयनीय रही है। इस गाय को सबने दुहा गया पर किसी ने भी इसकी परवाह नहीं की। रोयतवाड़ी, ज़मींदारी तथा महलवाड़ी प्रथाओं ने हमारे अन्नदाताओं का ख़ूब शोषण किया है। भुगतान में देरी, बढ़ते कर्ज़े, भूमि बेचे जाने में बढ़ोतरी, प्राकृतिक आपदाएं तथा किसानों द्वारा आत्महत्याएं रोज़मर्रा का हिस्सा बन गई हैं, जो आज तक चली आ रही हैं। ऐसा क्या? आज कर्ज़ाें में डूबे होने की वजह से किसानों में आत्महत्या की घटनाएं बढ़ रही हैं, जो आढ़तियों, बिचैलियों और सरकारी मण्डियों के कारण हो रही हैं। स्वतंत्र भारत में राजनैतिक कारणांे से किसी भी सरकार में इतनी हिम्मत नहीं थी कि वे अपने हाथों को जलाते और उन्होंने यह माना कि किसानों की मौतें उनके लिए महज और घटनाओं की भांति ही एक अन्य घटना थी। किन्तु, वर्तमान केन्द्रीय सरकार ने सन 2022 तक किसानों की आमदनी दुगुनी करने के मक़सद से निम्नलिखित तीन क़ानूनों को संसद में पारित किया।


 1/ कृषि उपज, व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन एवं सुविधा) अधिनियम 2020 

2/ किसान (सशक्तिकरण व संरक्षण) कीमत आश्वासन और कृषि सेवा करार अधिनियम 2020 

3/ आवश्यक वस्तु (संषोधन) अधिनियम 2020


इन क़ानूनों के पास होते ही ख़ासतौर से पंजाब में इनके विरूद्ध विरोध-प्रदर्शन शुरू हो गए। पंजाब के अलावा इन धरने-प्रदर्शनों को हरियाणा व पश्चिमी उत्तरप्रदेश के किसान नेताओं का भी समर्थन मिलने लगा। पंजाब में इनके प्रदर्शनों को इसलिए गति मिली क्योंकि एक तो यहां कांग्रेस की सरकार है और दूसरा, यहां के किसानों पर कम्युनिस्ट नेताओं की अपनी किसान यूनियनों के माध्यम से अच्छी पकड़ है। तीसरा, वे कट्टरवादी सिख जो ज़्यादातर विदेशों में बसे हैं और जिन्हें पंजाब के स्थानीय तत्वों का सहयोग मिल रहा है, ने इस धमाचैकड़ी से हाथ मिला लिया ताकि वे अपनी पृथकतावाद व खालिस्तान की मांगों के एजेण्डा को आगे बढ़ा सकें। इसमें पाकिस्तान ने भी उनका पूरा-पूरा समर्थन दिया है। चैथा, पंजाब की सरकार को किसानों का समर्थन करके अपने उन पांच साल के कुशासन की असफलता को छिपाने का मौका मिल गया जिसमें उन्होंने न तो कोई विकास कार्य किया और न ही नए रोज़गार के अवसर  पैदा किए। 

पांचवा, जब किसानों ने अपने विरोध-प्रदर्शनों का स्थान पंजाब के ज़िलों से बदलकर दिल्ली की सीमाओं पर केन्द्रित किया तो उन्हें राजनैतिक हितों से प्रेरित कुछ हरियाणा के नेताओ का भी पूरा-पूरा साथ मिला जिनमें ऐसे कुछ जाट नेता प्रमुख थे जो पहले ही हरियाणा की सरकार से खफ़ा थे। अंतिम कारण था कि पश्चिमी उत्तरप्रदेश के किसान नेता, राकेश टिकैत, जो किसानांे को अपना समर्थन देने के लिए उनके संघर्ष में नहीं कूदे थे बल्कि उनका मक़सद था अपने ‘राजनैतिक-सपनों’ को पूरा करना। यद्यपि, बाद में इन प्रदर्षनों तथा 26 जनवरी की घटनाओं के बाद वे उनके ‘मसीहा’ बनकर उभरे तथा उनकी गिनती इन रोष-प्रदर्शनों का नेतृत्व करने वाले अग्रणी नेताआंे के रूप में होने लगी। इन क़ानूनों का संवैधानिक पक्ष देखें तो भारतीय संविधान के अनुुसार ‘केन्द्रीय-सूची’ में 97 विषय निर्धारित किए गए हैं जिन पर अंतिम फै़सला लेने के लिए संसद सर्वोपरि है। वह भारतीय संविधान के अनुच्छेद 246 के अनुसार अपनी शक्ति का इस्तेमाल करते हुए इन विषयों पर क़ानून बना सकती है। इसी प्रकार, राज्य की सूची में 66 विषय समाहित किए गए हैं जिन पर केन्द्र व राज्य दोनों ही क़ानून बना सकते हैं। किन्तु, अगर दोनों के मध्य किसी विषय पर कोई विरोध है तो संविधान के अनुच्छेद 254 के अनुसार संसद द्वारा बनाया गया क़ानून ही मान्य होगा। 

ख़ास परिस्थितियों में राज्यों की विषय-सूची को लेकर केन्द्रीय सरकार द्वारा क़ानून बनाने की शक्तियों को नकारा नहीं जा सकता। अतः परिस्थितियां बताती हैं कि भारत में, आज़ादी के बाद से ही राज्य सरकारें कृषि के विषय पर क़ानून बनाने में असफल रही हैं। जब अन्य सभी क्षेत्रांे ने, जिनमें उद्योग भी शामिल है, विकास करने के मक़सद से अनेकों बदलाव किए तब कृषि क्षेत्र अपनी दयनीय अवस्था व अपने शोचनीय ऐतिहासिक परिदृष्य के बावजूद ऐसा नहीं कर सका। राजनैतिक तौर पर, अच्छी तरह से जुडे़ हुए बड़े-बड़े ज़मींदारों ने भी कभी राज्य सरकारों को कृषि के विषयों पर क़ानून नहीं बनाने दिया जिसके कारण हमारे किसान, जिन्हें ‘अन्नदाता’ भी कहा जाता है, आत्महत्याएं करने पर मज़बूर होते रहे। चाहे ये राज्य सरकारें हों, आढ़ती या बड़े-बड़े ज़मींदार हों, इनमें से  किसी ने भी इन किसानों की सुध लेने की कोशिश नहीं की।

यह सब देखते हुए, इन किसानों के हालात सुधारने के मक़सद से केन्द्र सरकार को पहल करनी पड़ी। यह देखकर कुछ तत्वों ने रोष-प्रदर्शनों का सहारा लिया क्योंकि इस क्षेत्र से होने वाले भारी-भरकम मुनाफे से उन्हें वंचित होने का डर सताने लगा था। इसके अलावा अब उनकी आय पर ‘टैक्स’ लगने के प्रावधानों ने भी उन्हें परेशान कर दिया है जो उनकी ‘दुखती रग पर हाथ रखने’ जैसा है। इन सबके ऊपर, विदेषों में बसे वे कट्टरवादी सिख जिनकी पंजाब में बहुतेरी ज़मीन हैं और जो उनसे करमुक्त आय कमाते थे व कुछ किए बिना ही इन ग़रीब किसानों के कंधों पर मज़ा ले रहे थे, ने भी अपने कुत्सित इरादों के कारण इन प्रदर्षनों को अपना भरपूर समर्थन देना षुरू कर दिया। देश के किसानों को लाभ देने के मक़सद से केन्द्रीय सरकार ने केन्द्रीय सूची में प्रविष्टि-41 के अन्तर्गत कृषि को व्यापार की श्रेणी में लाने का फै़सला किया ताकि कृषि क्षेत्र में आमूलचूल परिवर्तन किया जा सके। 

कृषि उपज, व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन एवं सुविधा)  अधिनियम 2020 के अनुसार किसानों को अपनी फसलों को अपने राज्य से बाहर भी ख़रीदने व बेचने की सुविधा है। इस नए क़ानून के अनुसार जो मण्डियाॅं एपीएमसी. एक्ट के अन्तर्गत कार्य कर रही हैं, उन्हें ख़त्म नहीं किया जाएगा किंतु धीरे-धीरे स्वतः ही वे अपना कार्य करना बंद कर दंेगी। यह भी डर फैलाया जा रहा है कि छोटे किसान बड़े व्यापारिक घरानों को बहुत कम कीमतों पर अपनी फसलों को बेचने पर मज़बूर किए जाएंगे और इन मण्डियों के वजूद में न रहने के कारण उनकी फसलों को ‘न्यूनतम समर्थन मूल्य’ पर नहीं ख़रीदा जाएगा। इस डर को निर्मूल करते हुए केन्द्र सरकार ने किसानों को ‘न्यूनतम समर्थन मूल्य’ पर फसल ख़रीदने की गारण्टी देने की बात कही है। अब तो किसानों द्वारा किए जा रहे विरोध-प्रदर्शनों का कोई औचित्य नहीं है। क्यों किसान भाई अपने रोष-प्रदर्शनों को जारी रखे हुए हैं?

इस तर्क के उत्तर में यह कहा जा सकता है कि ग़रीब किसानों को इन तीनों क़ानूनों से बहुत लाभ पहुंचेगा। किसान नेता इस बात से सहमत नहीं हैं क्योंकि उनके हित तो कहीं और सुरक्षित हैं और इनमें ज़्यादातर नेता आढ़ती वे बड़े ज़मींदार हैं जिनको इन क़ानूनों की वजह से या तो नुक्सान हो जाता या वे कम हो जाते। वे यह बात भूल जाते हैं कि अब भी गांव के किसान अपनी फसलों को बेचने उनके पास ही आएंगे क्योंकि वे स्थानीय स्तर पर मौजूद है व उन तक किसान की पहुंच बहुत आसान है। इन आढ़तियों ने ऐसा करके किसानों के बीच अविष्वास की भावना फैला दी है।  किसान (सशक्तिकरण व संरक्षण) कीमत आश्वासन और कृषि सेवा करार अधिनियम 2020 के अनुसार किसानों को बड़े घरानों के साथ ‘ठेके’ पर खेती करने की सुविधा दी गई है। किसान नेताओं को यह डर सता रहा है कि ये घराने इन कृषि समझौतों को इस प्रकार तैयार करवायेंगे कि वे इन घरानों की दया पर रहने के लिए मज़बूर हो जाएंगे। इसके अलावा, ज़्यादातर किसान इन समझौतों के ‘पेचीदा’ अनुच्छेदों को समझने में भी असफल होंगे जिसके कारण ये घराने किसानों पर कब्ज़ा करने की स्थिति में होंगे। एक और पक्ष यह कहा जा रहा है कि ये घराने बड़े किसानों के साथ समझौते करने को प्राथमिकता देना चाहेंगे क्योंकि ऐसा करके एक बारे में ही बड़ा लाभ प्राप्त होने की उम्मीद है। अतः इन छोटे किसानों को बड़े घरानों द्वारा उनकी फसलों के एवज में दिए जाने वाले कम मूल्य  पर ही संतुष्ट होना पड़ेगा। क्र इस तर्क के विरोध में यह स्पष्ट तौर पर कहा जा सकता है कि पंजाब में ‘ठेके’ पर कृषि-व्यवस्थ्था बड़े किसानों के साथ बहुत लंबे समय से चली आ रही है। इसीलिए, ये बड़े़े किसान नहीं चाहते कि अच्छे कृषि-मूल्यों को यह फ़ायदा निचले छोटे किसानों को भी मिले और वे अपना जीवन-स्तर बेहतर कर सकें। इन छोटे किसानों को बड़े घरानों से लाभ पहुंचाने की बजाय, ये राज्य सरकारें अपने लोगों के प्रति जिम्मेदारी निभाने से दूर भाग रही हैं। इसके अलावा, इन ज़मीनों को लूटने-खसोटने की बजाय, ये घराने तो इन्हें सुरक्षा ही प्रदान करते रहे हैं। वे प्राकृतिक आपदा या अन्य कारणों से उनकी फसलों के होने वाले नुक्सान की हालत में भी, इन ग़रीब किसानों को समुचित मुआवज़ा प्रदान करते हैं। 

आवश्यक वस्तु (संशोधन) अधिनियम 2020  के अनुसार दालें, दलहन, तेल, प्याज व आलू जैसी वस्तुओं को ‘अनिवार्य वस्तुओं’ की सूची में से निकाल दिया गया है। विशेषज्ञों के अनुसार, यह सही कदम है क्योंकि इससे किसानों की आय में बढ़ोतरी होगी किन्तु इसके साथ-साथ ग्रामीण-ग़रीबी में इज़ाफा भी होगा और इससे ‘सावर्जनिक वितरण प्रणाली’ (पीडीएस) पर भी प्रतिकूल असर पड़ेगा। इस ‘संषोधन’ में सबसे बड़ी खामी यह बताई गई है कि इससे बड़े घरानों को उन अनिवार्य वस्तुओं को जमा करने में सुविधा मिलेगी जिनमे दाल, दलहन, खाने का तेल, आलू व प्याज मुख्य हैं, जो मूल्यवृद्धि का कारण बन सकती हैं।  यह तर्क भी अपने आप में ग़लत है क्योंकि ‘जमाखोरी’ का फ़ायदा किसानों को न मिलकर आढ़तियों को ही मिलता रहा है। इसके अलावा, भारतीय खाद्य निगम व अन्य सरकारी एजेन्सियों द्वारा फसल ख़रीद में किया जा रहा भ्रष्टाचार भी ख़त्म हो जाएगा। मौसम संबंधी या अन्य कारणों से इन फसलों को जमा करने के दौरान होने वाले नुक्सान को भी ये घराने ही वहन करेंगे। प्राकृतिक-आपदा या मूल्यों में अत्यधिक उतार-चढ़ाव के समय केन्द्र सरकार बीच में आकर मूल्यों पर अंकुश लगाएगी तथा वह ज़रूरत पड़ने पर इन घरानों द्वारा संचालित ‘गोदामों’ व ‘भण्डारों’ पर भी अपना नियंत्रण कायम कर सकती है। इसके अलावा, इन नये क़ानूनों की सहायता से किसानों को नई व आधुनिक कृषि तकनीक से भी जानकार किया जाएगा जिससे उनकी फसल-उत्पादकता बढ़ेगी।

ये क़ानून किसानों व कार्पोेरेट घरानों के मध्य सीधा रिश्ता व संवाद स्थापित करेंगे और जो बिचैलिये किसानों का शोषण  किया करते थे, वह भी रूक जाएगा। केन्द्र सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि ‘एपीएमसी मण्डियों’ को समाप्त नहीं किया जाएगा बल्कि वे भी समान रूप से कार्य करती रहेंगी। अब इन मण्डियों और इन आढ़तियो को नई परिस्थिति के अनुसार खुद को बदलना होगा क्योंकि सरकार कदापित नहीं चाहेगी कि किसान अपना अमूल्य जीवन आत्महत्याएं करके समाप्त कर दें। अब तक बहुत हो चुका और इन आढ़तियों, बिचैलियों, बड़े ज़मींदारों व राज्य सरकारों को कृषि में होने वाले बदलावों को अपनाना ही होगा। इन नये कृषि क़ानूनांे के खि़लाफ़ विरोध-प्रदर्शन अब भी जारी हैं व कोई सार्थक-नतीजा नहीं निकल पाया है। किसान इन तीनों क़ानूनों को निरस्त करवाने पर आमादा है और किसी भी प्रकार की बातचीत करने से गुरेज कर रहे हैं। हमारे माननीय प्रधानमंत्री ने किसानों को दिए जाने वाले ‘न्यूनतम समर्थन मूल्य’ यथावत रखने का आश्वासन दिया है तो हम सभी को इसे स्वीकार करना चाहिए और इन तीनों क़ानूनों को मान लेना चाहिए। इसमें समय के साथ-साथ थोड़ा-बहुत हेरफेर किया जा सकता है तथा इन क़ानूनों के लागू होने के बाद जो कमीपेशी होगी, उसे भी दूर किया जा सकता है। आइये, हम सब सुखद भविष्य की ओर बढे । 

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