कोरोना काल में भारतीय राजनीति का निर्बल पक्ष हुआ उजागर

कोरोना काल में भारतीय राजनीति का निर्बल पक्ष हुआ उजागर

राजेन्द्र बहादुर सिंह राणा

विश्व के कई देशों की तरह कोविड 19 ने भारत को भी जबरदस्त तरीके से परेशान कर रखा है। चीन के वुहान शहर से निकला यह वायरस दुनियां की नजर में कोई प्राकृतिक वायरस नहीं बल्कि लैब में निर्मित वायरस है। हालाकि चीन इसे मानने को कतई तैयार नहीं। भारत में यह वायरस 2020 में आई और जबरदस्त तबाही मचाई लेकिन इस आकस्मिक वैश्विक आपदा से निपटने में सरकार ने काफी तत्परता दिखाई और बेहतर कदम उठाए। नतीजतन बहुत हद तक साल बीतते बीतते इस पर काबू भी पा लिया गया। गत वर्ष भी विपक्षी दलों ने सकारात्मकता दिखाते हुए रचनात्मक विपक्ष की भूमिका निभाने की बजाय जनता में भय और भ्रम का भौकाल बनाने में ही अपना वक्त जाया किया। लॉकडाउन को गलत बतलाना, फ्रंट लाइन वर्कर्स के मनोबल को ऊंचा बनाए रखने के लिए थाली ताली बजाने का मखौल उड़ाना, टेस्टिंग किट, पीपीई किट आदि पर सवाल खड़ा करना, लोगों को गुमराह करना, ऐसे कई कार्य किए गए, जिस से साफ दिखा कि इनका मकसद आपदा से लड़ना नहीं बल्कि मोदी से लड़ना और उन्हे नीचा दिखाना है।

ऐसा बिल्कुल नहीं कि सरकार से गलतियां नहीं हुई हो, जरूर हुई होंगी लेकिन जिम्मेदार विपक्ष वह होता है जो किसी भी आकस्मिक आपदा के समय सत्तारूढ़ दल का टांग खींचने की बजाय उसका हाथ बटाएं। देश को उस आपदा से निपटने में रचनात्मक सहयोग दे। क्या आपने विश्व के किसी भी देश के बारे में ऐसा सुना कि वहां के विपक्षी दलों ने महामारी के समय देश का मनोबल तोड़ने, अपने ही देश के लोगों के बीच भय और भ्रम की स्थिति पैदा करने की कोशिश की हो? ऐसा नहीं है कि अन्य देशों के विपक्ष की वहां के सत्तारूढ़ दल से कोई वैचारिक या सैद्धांतिक मतभेद ही न हो, लेकिन उन्होंने एक जिम्मेदार रचनात्मक विपक्ष की भूमिका निभाई और वहां के राष्ट्रध्यक्ष के साथ कंधे से कंधा मिलाकर इस महामारी को परास्त करने में जी जान से जुटे रहे, जबकि हमारे देश के विपक्ष की भूमिका कैसी रही, इस महामारी से मुक्ति दिलाने के लिए क्या और कैसा प्रयास उनके द्वारा किया गया, आपने बखूबी देखा और महसूस किया है।

पिछले 100 वर्षों की यह सबसे बड़ी महामारी है। लाखों लोग असमय ही मौत के मुंह में समा गए, कितने लोगों का रोजगार प्रभावित हुआ। वुहान लैब वाले चीन को छोड़ दें, तो विश्व के लगभग सारे देशों की अर्थव्यवस्था चरमरा गई। अचानक आई इस वैश्विक आपदा से कोई भी देश अछूता न रहा। भारत तो एक विकासशील या यूं कहे कि गरीब देश है , यहां की स्वास्थ्य सेवाओं की ओर कभी भी उतना ध्यान दिया ही नहीं गया।

यह सही है कि स्वास्थ्य राज्य का विषय है,लेकिन राज्य सरकारों ने स्वास्थ्य के बुनियादी ढांचे का विकास किया या नहीं, किसी ने यह जानने की कोशिश ही नहीं की। केंद्र सरकार ने भी उस गति से स्वास्थ्य क्षेत्र को सुदृढ़ करने में कोई खास रुचि नहीं दिखाई। 2014 तक देश में केवल एक अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान का होना इसका जीता जागता उदाहरण है।

2020 में जब कोरोना महामारी ने तांडव दिखलाना शुरू किया ,तो उस वक्त हमारे देश में इस वायरस की जांच के लिए केवल एक टेस्टिंग लैब थी । टेस्ट किट, पी पी ई किट के लिए भारत दूसरे देशों के भरोसे था । आज भारत में 2500 से भी ज्यादा कोरोना के लिए टेस्टिंग लैब है, पी पी ई किट के लिए आज न सिर्फ हम आत्मनिर्भर हैं बल्कि निर्यात भी कर रहे हैं। फिर भी इस आपदाकाल में विपक्ष द्वारा इस सरकार को निकम्मा और नकारा कहना, किस हद तक जायज है ? फैसला आप खुद करें ।

अमेरिका, इटली आदि देश हमसे कहीं ज्यादा संपन्न हैं, वहां की स्वास्थ्य व्यवस्था हमसे कई गुना बेहतर है, अर्थव्यवस्था काफी अच्छी है और जनसंख्या कई गुना कम लेकिन उन विकसित देशों में इस महामारी ने कैसा तांडव मचाया, कितने लोगों को मौत की नींद सुला दिया, आपने खुद देखा और सुना। जब किसी अमीर परिवार में भी एक साथ चार आदमी बीमार हो जाता है, तो परिवार की हालत खराब हो जाती है, हमारे इस गरीब देश में तो इस वैश्विक महामारी ने एक साथ रोज लाखों लोगों को अपना शिकार बनाना शुरू कर दिया, ऐसे में सरकार का भी वही हाल होना स्वाभाविक है, जो किसी परिवार के मुखिया का होता है। यदि घर के सदस्य, देश का विपक्ष साथ न दे तो आपदा से निकल पाना और भी मुश्किल हो जाता है।

खैर, कोरोना महामारी की पहली लहर को सरकार काबू में करने में कामयाब हुई ही थी, अर्थव्यवस्था भी पटरी पर आने लगी थी, तभी इसकी दूसरी लहर पहले से ज्यादा आक्रामकता और भयावहता के साथ हमलावर हो गई। किसी को इसका अंदाजा न था कि 2020 के मुकाबले यह इतने ज्यादा तेजी से आक्रमण करेगा, हर आयु वर्ग को अपना शिकार बनाने लगेगा, लेकिन ऐसा हुआ। जहां कुछ राज्यों ने केंद्र के साथ कंधे से कंधा मिला कर इस महामारी पर काबू पाने में प्रयास करना मुनासिब समझा, वहीं कुछ राज्य इस आपदा की घड़ी में भी अपनी राजनैतिक बिसात साधने में मशगूल रहे। अपनी नाकामियों का सारा ठीकड़ा केंद्र पर फोड़ते जाने को ही उन्होंने इस महामारी से अपने प्रदेशवासियों को मुक्ति दिलाने का सटीक हथियार समझा। दूसरे शब्दों में यूं कहें कि दूसरी लहर के दौरान भी विपक्ष इस आपदा से लड़ने की बजाय अपने मोदी विरोध के एजेंडा पर कायम रही, कदम कदम पर इस आपदा में अवसर तलाशने में जुटी रही।

सबसे पहले इस दूसरी लहर के लिए सारे विपक्षी दलों द्वारा पश्चिम बंगाल चुनाव को जिम्मेवार ठहराया जाने लगा क्योंकि प्रधानमंत्री मोदी और गृह मंत्री अमित शाह सहित बीजेपी के कई बड़े नेता बंगाल की चुनावी संग्राम में जुटे थे। यहां गौर करने की बात यह है कि विपक्षियों द्वारा हर मंच से सिर्फ और सिर्फ बंगाल विधान सभा चुनाव और उत्तर प्रदेश पंचायती राज के चुनाव को ही इसके लिए जिम्मेवार ठहराया जाता रहा, जबकि चुनाव केरल, तमिलनाडु, असम और पुडुचेरी में भी हुई थी लेकिन वहां पर विपक्षी दलों ने भी खूब रैलियां की थी, इसलिए इन चुनावों की चर्चा तक नहीं हुई। सबसे बड़ी बात चुनाव सभी दलों के साथ विचार विमर्श के बाद ही चुनाव आयोग द्वारा करवाया गया था। समय से चुनाव न होता तो आर्टिकल 172 का इस्तेमाल करना निहायत ही जरूरी हो जाता और पांचों राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाने को विवश होना पड़ता, क्योंकि संविधान के हिसाब से यही विकल्प होता। अब आप ही सोचो, अगर ऐसा होता, तो विपक्षी दल इसे भी लोकतंत्र की हत्या बतलाने से गुरेज करते क्या ?

बाद में हरिद्वार कुंभ को सुपर स्प्रेडर बताया गया,जबकि हकीकत में इस वर्ष इस महामारी को देखते हुए इस कुंभ को बहुत ही छोटा कर दिया गया था। आमलोगों को वहां जाने ही नहीं दिया गया। गौरतलब है कि देश में कोरोना से हुई कुल मौत का लगभग एक तिहाई मौत सिर्फ महाराष्ट्र में हुई, जहां न तो चुनाव हुए, न ही किसी कुंभ का आयोजन। आखिर किस मंशा से एक ओर कुंभ को या चुनाव को विपक्षी दलों द्वारा कोरोना महामारी के लिए जिम्मेदार ठहराया जा रहा है तो दूसरी ओर तथाकथित किसान नेताओं को धरना प्रदर्शन और आंदोलन जारी रखने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है।

क्या वजह है कि अपने ही दिग्गज नेता, अधि रंजन चैधरी द्वारा अपने ट्वीट में कोरोना को वुहानी वायरस बतलाने पर कांग्रेस द्वारा ट्वीट डिलीट करने को बाध्य कर दिया जाता है और उसी कांग्रेस द्वारा इस कोविड को इंडियन वेरियंट्स और मोदी वायरस, मोविड आदि नाम देकर देश की छवि बिगाड़ने, देश के सम्मान के साथ खेलने का दुष्चक्र रचा जा रहा है।

भारत उन चंद देशों में शामिल है, जिसने कम से कम समय में स्वदेशी वैक्सीन बनाई है लेकिन हमारे देश के विपक्षी दलों ने उस पर भी सवाल उठा कर न सिर्फ हमारे वैज्ञानिकों का मनोबल तोड़ने की कोशिश की बल्कि अपने पूर्वाग्रह से ग्रसित होकर उस भय, भ्रम, संशय और हिचक का भी निर्माण करने में एड़ी चोटी का जोर लगा दिया, ताकि लोग टीकाकरण न करवाएं और देश में यूं ही लोग मरते रहें, ताकि उनकी सियासत की दुकान मंदी न पड़े। किसी दल के नेता ने वैक्सीन को बीजेपी की वैक्सीन बतलाया, किसी ने मोदी वैक्सीन तो किसी नेता ने तो लोगों को भयाक्रांत और भ्रमित करने के लिए यहां तक कह डाला कि वैक्सीन लगवाने के बाद नपुंसक हो जाओगे, संतान विकलांग पैदा होगी। इन नेताओं के बयान ने न सिर्फ परोक्ष रूप से भारतीय वैज्ञानिकों के अथक प्रयास, परिश्रम और प्रतिभा को कठघरे में खड़ा करने का काम किया बल्कि इसके नकारात्मक परिणाम भी त्वरित गति से सामने आए।

‘‘मूड ऑफ द नेशन पोल मार्केट रिसर्च एजेंसी: कार्वी इनसाइट‘‘ के जनवरी माह में 19 राज्यों के 37 संसदीय क्षेत्रों में किए गए एक सर्वेक्षण के मुताबिक 21 प्रतिशत लोग टीका नहीं लगवाना चाहते थे। हैरानी की बात तो ये है कि इन नेताओं के बयान का असर प्रवासी भारतीयों पर भी हुआ है। ब्रिटेन में ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी समेत कई संस्थानों ने मिलकर एक सर्वे किया, जिसके परिणाम चैंकानेवाले आए। वहां केवल 56 प्रतिशत भारतीयों ने वैक्सीन लगवाने में दिलचस्पी दिखलाई, जबकि 44 प्रतिशत भारतीय ने वैक्सीन न लेने या असमंजस में होने की बात कही। सपा सांसद डाॅ. एस टी हसन ने तो यह कह कर सारी हदें पार कर दी कि कोरोना महामामारी अल्लाह का आसमानी इंसाफ है। कोरोना भारत में इसलिए आई है क्योंकि इस देश में मुस्लिमों के साथ नाइंसाफी हो रही है।

भारत सरकार ने विपक्षी दलों के नेताओं की भ्रामक बयानबाजी और मंशा को भांपते हुए लोगों को टीकाकरण के लिए आगे लाने हेतु बड़े स्तर पर जागरूकता अभियान चलाया और लोगों ने सरकार की बातों पर विश्वास जताते हुए टीकाकरण करवाना शुरू भी किया। चूंकि वैक्सीन की उपलब्धता कम थी, इसलिए सरकार ने विशेषज्ञों के राय से फेज वाइज टीकाकरण शुरू किया, जो सफलतापूर्वक चल रहा था, तब कुछ राज्यों ने यह कहना शुरू कर दिया कि राज्यों को भी टीका खरीदने और अपने प्रदेशवासियों को लगवाने का अधिकार दिया जाए। अब जबकि राज्यों को 18 से 45 वर्ष आयु वर्ग वालों के लिए टीका खरीदने और लगवाने का अधिकार दे दिया गया, तब फिर से पलटी मारी जा रही है और पैसे की कमी का रोना रोया जाने लगा है।

ज्ञात हो कि दुनिया में केवल 6 कंपनी ही कोरोना टीका बना रही है। विश्व में मांग बहुत ज्यादा है और आपूर्ति बहुत ही कम। सरकार हरसंभव प्रयास कर रही है कि सभी देशवासियों को शीघ्रातिशीघ्र टीका लगाना संभव हो जाए। सरकार के प्रयासों का ही नतीजा है कि देश को दिसंबर तक 216 करोड़ टीका की डोज मिलने जा रही है। लेकिन दलगत राजनीति से ऊपर उठकर यदि राज्य सरकारें सहयोग नहीं करेंगी, तो शत प्रतिशत टीकाकरण का लक्ष्य पाना दिवास्वप्न ही रह जायेगा। पिछले दिनों ऐसी रिपोर्ट आई कि विपक्ष शासित कुछ राज्यों में टीका की काफी बर्बादी हो रही है। झारखंड टीका बर्बादी करनेवाले राज्यों में 37 प्रतिशत बर्बादी के साथ शीर्ष पर है, राजस्थान में कूड़े के ढेर में सैंकड़ों डोज वैक्सीन मिले, अलीगढ़ में तो निहा खान नाम की एक नर्स वैक्सीन देने की बजाय दर्जनों भरी सिरिंज डस्टबिन में डालती पाई गई।

पी एम केयर फंड से दी गई वेंटीलेटर को राजस्थान सरकार द्वारा निजी हॉस्पिटल को भाड़े पर देना, पंजाब में महीनों तक गोदाम में फेंके रखना और बाद में बेवजह इसकी गुणवत्ता पर सवाल खड़े करना, बिहार जैसे कुछ राज्यों द्वारा कुशल विशेषज्ञों की कमी की वजह से वेंटीलेटर का समुचित उपयोग न किया जाना, कोरोना को मात देने की केंद्र सरकार के प्रयासों पर पानी फेरनेवाला कदम नहीं, तो और क्या है, जरा सोचें। क्या सारी जिम्मेवारी केंद्र सरकार की ही होनी चाहिए, राज्य सरकार को फिर हम क्यों चुनते हैं। जरूरी है इस आपदा कल में सब संवेदनशील बनें, जिस तरह से ऑक्सीजन और जरूरी दवाओं की जमाखोरी और कालाबाजारी, शमसान घाट पर लकड़ियों की कालाबाजारी, कई राज्य में स्वास्थ्यकर्मियों के द्वारा की जा रही धोखाधड़ी, इस आपदकाल में देखने को मिली, शर्मनाक है। हालाकि इन सबके बावजूद, ऑक्सीजन की किल्लत, दवाओं की कमी आदि पर भी केंद्र सरकार ने यथाशीघ्र सकारात्मक कदम उठाया लेकिन विपक्ष ने उस वक्त भी नकारात्मकता ही फैलाई और इसमें कुछ बिकाऊ मीडिया ने उनका भरपूर साथ दिया। कोरोना के दूसरी लहर के समय भारत में केवल 900मीट्रिक टन मेडिकल ऑक्सीजन का उत्पादन होता था, और चंद दिनों में ही इसे बढ़ा कर 9500 मीट्रिक टन तक पहुंचा दिया गया लेकिन चर्चा इन उपलब्धियों की नहीं हुई। गंगा घाट पर दफन की गई और बहती लाशों को इस तरह पेश किया गया, जैसे – इस महामारी और सरकार की निष्क्रियता की वजह से ही ऐसा दृश्य बना हो, बाद में साफ हुआ कि सालों भर उन घाटों पर ऐसा ही नजारा दिखता है, इस बार कोरोना की वजह से 10 दिनो तक लगभग 30ः तक बढ़ोत्तरी देखी गई।

इस बात से बिल्कुल भी इंकार नहीं किया जा सकता कि इस महामारी ने हर राज्य और देश की स्वास्थ्य व्यवस्था की पोल खोल कर रख दी। सबसे अच्छी स्वास्थ्य व्यवस्था का दंभ भरनेवाले दिल्ली, मुंबई जैसे महानगर की हालत सबसे बुरी रही। इसी बीच एक तथाकथित टूल किट भी सामने आया, जिसे कांग्रेस का बतलाया गया। इस टूल किट की सच्चाई क्या है, अभी विश्वास के साथ कह पाना मुश्किल है क्योंकि मामला न्यायालय के विचाराधीन है,लेकिन कुछ राजनेताओं के कार्य और बयान पर यदि नजर डालें, तो खुद ब खुद बहुत कुछ समझ में आ जाता है।

जरूरत है कि हर एक राजनैतिक दल, हर एक सरकार वोट बैंक की राजनीति से ऊपर उठकर स्वास्थ्य सेवा को सुदृढ़ करने के लिए निरंतरता से प्रयास करे। हमारे राजनेता लाशों पर राजनीति करने की आदत से बाज आएं। बिना किसी वैज्ञानिक आधार के हमारे जनप्रतिनिधियों द्वारा किए जा रहे वैसे दुष्प्रचार को, जो राष्ट्रहित में न हो, को रोकने के लिए केंद्र एवं राज्य सरकारों को सख्त से सख्त कदम उठाना भी आज हो चुका है क्योंकि प्रश्न मानव जीवन की सुरक्षा का है।

(लेखक के विचार निजी हैं। जनलेख प्रबंधन का इससे कोई लेना-देना नहीं है।) 

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