नये कृषि कानूनों को लेकर झारखंड में चुप्पी का आखिर क्यों है?

नये कृषि कानूनों को लेकर झारखंड में चुप्पी का आखिर क्यों है?

उमेश नज़ीर

झारखंड सरकार के वित्तमंत्री के अनुसार राज्य की कुल आबादी का 75 प्रतिशत की जीविका का मुख्य स्रोत-खेती और उससे जुड़े पेशे हैं। इस तरह से देखा जाये तो खेती इस राज्य का मुख्य पेशा है। इसके बावजूद जब देश में कृषि क्षेत्र को पूरी तरह बदलने और पूंजीवादी खेती प्रारंभ करने की योजना के तहत केंद्र सरकार द्वारा तीन विवादास्पद कानून लाये गये हैं, फिर भी यहां के कृषि क्षेत्र से जुड़े समुदायों के बीच कोई खास हलचल नहीं देखी जा रही है। इस कानूनों के विरोध के स्वर अधिकांशतः उनलोगों द्वारा उठाये जा रहे हैं, जो कहीं न कहीं किसी गैर-भाजपाई दलों से संबंधित कार्यकर्ता हैं, या किसी गैर सरकारी संगठनों से जुड़े हैं। ऐसे में सवाल उठना वाजिब है कि आखिर इन कानूनों पर झारखंड के किसानों की ओर से कोई हलचल क्यों नहीं दिखायी पड़ रहा है। जबकि कई राज्यों, खासकर पंजाब, हरियाणा, उत्तरप्रदेश, राजस्थान, कर्नाटक, तमिलनाडु, महाराष्ट्र के किसानों द्वारा जोरदार तरीके से विरोध किये जा रहे हैं। इस आलेख के जरिये इसी सवाल पड़ताल करने की कोशिश कर रहा हूं। इन सवालों का जवाब इसलिए भी ढूंढना जरूरी है कि झारखंडी किसान, खासकर आदिवासी-दलित समुदाय जो विस्थापन और भू-अधिग्रहण के सवाल पर काफी मुखर होते हैं, उनके मौन का आखिर क्या कारण है? साथ ही इन कानूनों का उनकी जीवन-शैली पर पड़ने वाले प्रभाव का मूल्यांकन किया जाना जरूरी है। इन बिंदुओं पर चर्चा के लिए झारखंड में कृषि-परिस्थिति और उनमें किसानों के प्रस्थिति का तुलनात्मक अध्ययन किया जायेगा। 

झारखंड में कृषि-परिस्थितियां

झारखंड के अधिकतर हिस्सों में खेती की पारंपरिक परिस्थितियां बहुत हाल तक थी और  1990 से इसमें बदलाव देखने को मिला। ये बदलाव उस समय से शुरू हुआ, जब से निजीकरण-उदारीकरण- भूमंडलीकरण की धूम हिंदुस्तान में मचनी शुरू हुई। इसी के साथ झारखंड में कथित हरित क्रांति, यानी दूसरे चरण की कृषि विकास के कार्यक्रम शुरू हुए। इस चरण के कृषि विकास की खासियत यह है कि इस विकास के लिए उपयोगी संसाधनों- कृषि-उपकरणों, खाद-कीटनाशक-बीज इत्यादि के लिए लगने वाली लागत का बोझ किसानों के सिर पर मढ़ दिया गया है। दूसरे शब्दों में इसे इस तरह कहा जा सकता है कि झारखंड के किसानों को बाजार-तंत्र के क्रूरतम चंगुल में फंसा दिया गया है। इस चंगुल में फंसे किसानों के लिए खेती आज घाटे का सौदा बन गया है। इसी के साथ यह नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है कि झारखंड की धरती के नीचे खनिज का अकूत भंडार छुपा हुआ है। साथ ही यहां के प्राकृतिक संसाधन-जल, जंगल और जमीन आज के मुनाफा केंद्रित विकास मामलों के लिए वर्षों से महत्वपूर्ण रहा है। इसी को देखते हुए ब्रिटिश काल से लेकर अब तक झारखंडी समुदायों की आजीविका और संस्कृति से बेदखलीकरण की औपनिवेशिक और उत्तर-औपनिवेशिक प्रक्रिया चली है। इसी बेदखलीकरण के खिलाफ हमारे पुरखों ने गौरवशाली संघर्ष चलाया था। परंतु इन संघर्षों के साथ न तो ब्रिटिश शासकों ने कभी सकारात्मक संवाद स्थापित करने की कोशिश की है और न ही आजाद भारत की सरकारों ने। 

दुख तो इस बात का है कि अलग झारखंड बनने के बाद भी इस पर सरकारें गंभीर नहीं हुई। जबकि अलग झारखंड के लिए वर्षों हुए संघर्ष के मूल्यबोधों में से एक था- प्राकृतिक और मानव संसाधनों की हिफाजत। इन सवालों पर झारखंड आंदोलन ने हर दौर में विचार किया है। इस बिंदु पर एन.ई. होरो ने लिखा था-‘‘…ग्रामीण अर्थव्यवस्था ध्वस्त होती जा रही है और लोग रोजगार की तलाश में भटक रहे हैं, जो उन्हें उन सरकारी योजना में नहीं मिलता है, जिनमें उनकी जमीन ले ली गयी है। चारों ओर औद्योगीकरण हो रहा है, जिनमें उनलोगों के लिए कोई जगह नहीं है, जो सिर्फ खेती-बारी करना जानते हैं। जनहित की योजनाओं के नाम पर लाखों लोगों को उनकी जमीन और घरों से विस्थापित कर दिया गया है और उनका पुनर्वास होता नहीं दिखायी रहा है। …. ऐसी समस्याओं का स्थायी समाधान खोजा जाना जरूरी है और वह अलग राज्य का गठन ही है।’’

इसी तरह 6-7 मई 1978 में आयोजित होने वाले झारखंड क्षेत्रीय बुद्धिजीवी सम्मेलन के लिए जारी परचा में कृषि संबंधी समस्याओं पर विचार करते हुए कहा गया है, ‘‘यहां की 90 प्रतिशत जनता का मुख्य पेशा खेती है। यहां लोहरदगा, सरगुजा, सिल्ली, पिठौरिया, गंगपुर, गोविंदपुर, चतरा और तमाड़ आदि खेती की पैदावार के जो महत्वपूर्ण बाजार थे, उनका महत्व खत्म कर दिया गया और उनकी जगह जीवन की जरूरी वस्तुओं की कालाबाजारी और जमाखोरी करने वाले बाजारों ने ले लिया। यहां कपास (रूई) जैसी महत्वपूर्ण नगदी फसल की पैदावार बंद हो गयी और इसी रास्ते पर आज लाह, सुरगुजा और तिलहन आदि की पैदावारें भी धीरे-धीरे बंद होने की ओर बढ़ रही है। खेती के लिए सिंचाई योजना के नाम पर बड़े-बड़े डैम बनाये गये जिनमें यहां के सैकड़ों गांव डूब गये, लेकिन उनसे यहां की सिंचाई को कोई लाभ नहीं हुआ।’’
इन तथ्यों पर विचार किया जाये, तो कहा जा सकता है कि झारखंड की बहुसंख्यक आबादी की आजीविका कृषि होने के बावजूद खेती पर आजाद भारत में न तो बिहार सरकार ने ध्यान दिया और न ही झारखंड बनने के बाद यहां की सरकारों ने। जबकि उपरोक्त तथ्य बताते हैं कि झारखंडी जनता कृषि की दुर्दशा को लेकर चिंतित थी, जिसकी अभिव्यक्ति एन.ई. होरो और 1978 में हुए झारखंड क्षेत्रीय बुद्धिजीवी सम्मेलन के लिए जारी परचे से हुई है। झारखंड बनने के बाद भी यहां की जनता कृषि को समुचित स्थान दिलाने के लिए बराबर संघर्षरत है। जब अर्जुन मुंडा की सरकार द्वारा झारखंड के बहुचर्चित कृषि क्षेत्र- उत्तरी कर्णपुरा में कोयला खनन के लिए 36 कंपनियों को निवेश के लिए समझौता किया गया, तो वहां की जनता अपने क्षेत्र को कृषि क्षेत्र घोषित करने की मांग कई मंचों से उठती रही है। आज जब वहां सार्वजनिक उपक्रम एनटीपीसी अपना खनन त्रिवेणी सैनिक से शुरू करा दिया है, तो वहां के किसान अभी भी आंदोलनरत हैं। इस आंदोलन में अब तक 5 किसानों की शहादत हो चुकी है। इसी तरह झारखंड के कई जिला में आदिवासी-दलित समुदाय आंदोलनरत हैं। उनकी खासियत है कि इनमें से अधिकतर लोगों की आजीविका कृषि है।  

कृषि के प्रति उपेक्षापूर्ण रवैया क्यों? 

कृषि के प्रति उपेक्षापूर्ण रवैया को लेकर चिंता करने और उसके मूल कारण को खोजने की जरुरत है।  जब इस दिषा में अपना कदम बढ़ाते हैं, तो यह तथ्य उभर कर सामने आता है कि कृषि को हमारे नीति-निर्माताओं द्वारा पिछड़ेपन की प्रतीक मानते हैं और इससे पीछा छुड़ाना अपना महत्वपूर्ण दायित्व समझते हैं। इस संबंध में सैमुअल पी. हटिंगटन ने द चेंज टू चेंज: मॉडर्नाइजेशन, डेवलपमेंट एंड पॉलिटिक्स (1976, पृष्ठ संख्या 30-31) में आधुनिकीकरण की व्याख्या करते हुए कहते हैं, ‘‘आधुनिकीकरण और विकास, क्रांतिकारी प्रक्रियाएं हैं। इसके तकनीकी और सांस्कृतिक परिणाम उतने ही महत्वपूर्ण हैं, जितनी नव लौह क्रांति के थे, जिसने खानाबदोश और शिकारी आदमी को कृषक के रूप में स्थापित किया। अब ग्रामीण कृषि प्रधान संस्कृतियों को नागर-औद्योगिक संस्कृति में बदलने का प्रयास हो रहा है।’’ 

टाफलर (1980) में इसकी व्याख्या करते हुए इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि ‘‘यह पहली धारा से दूसरी धारा की ओर आगे बढ़ना है।’’ इन प्रक्रियाओं को लेकर (ब्लैक 1996, पृष्ठ संख्या-155-174) में यह कल्पना करने लगते हैं कि ‘‘जब आधुनिक विचारों और संस्थाओं के सार्वभौमिक रूप से लागू होते हैं, जिससे विभिन्न समाज एक ऐसे बिंदु पर पहुंचते हैं कि वे इतने एकरूप हो जाते हैं कि विष्व राज्य का निर्माण करने में समर्थ हो जाते हैं।’’

इन उक्तियों के संदर्भ के बारे में जानने की जरूरत है कि ये सारे विद्वान दुनिया में आर्थिक पुनर्सुधार- भूमंडलीकरण, निजीकरण और उदारीकरण के पुरोधा रहे हैं और कहीं न कहीं झारखंड और देष के अंदर विकास संबंधी दृष्टिकोण बनाने में इनकी भूमिका रही है। इन्हीं के ज्ञान के आलोक में झारखंड के आधुनिकीकरण की प्रक्रिया को संपन्न करने की कोषिष अधिकतर सरकारें करती रही हैं। झारखंड की जनता एक विपरीत ध्रुव पर खड़ी है और वह सीएनटी/एसपीटी एक्ट, पेसा कानून, 1996 और वनाधिकार कानून, 2006 के साथ-साथ अपनी पारंपरिक आजीविका और पारंपरिक सामाजिक संरचना में अपना भविष्य देखती है। झारखंडी जनमानस की यह आकांक्षा इतनी तीव्र है कि यहां का कोई भी राजनैतिक दल इसके विपरीत जाकर खुलेआम इसके विपरीत प्रतिक्रिया देने में सहम जायेगा। यहां तक कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी जब चुनावी भाषण के लिए आते हैं, तो उन्हें भी इन आकांक्षाओं के विपरीत जाने की हिम्मत नहीं होती है। 

कौन है किस ओर?

भूमंडलीकरण, निजीकरण और उदारीकरण के गर्भ से निकली योजनाओं और कार्यक्रमों के प्रारंभ से लेकर अब तक तीन दशक पार हो चुके हैं। इतने साल गुजरने के बाद भी न तो सभी समाज में एकरूपता आयी और न ही हम विष्व राज्य बनने की दिषा में बढ़े हैं। जबकि आंकड़े बताते हैं कि यह सुंदर सपना समाज के चंद लोगों के लिए ही था। हां, एकरूपता तो आयी है, लेकिन सुंदरता का नहीं, बल्कि कुरूपता। आज दुनिया के अधिसंख्य जनता इसी कुरूपता का शिकार है। यह कुरूपता, इसलिए पैदा की गयी, ताकि चंद लोगों के लिए ऐशो-आराम को इकट्ठा किया जा सके। साथ चंद लोगों के लिए इक्कठा हुई रूपये और बढ़ाया जा सके और उसकी सुरक्षा भी हो ।

वहीं आज इस सपने के साथ जनांकाक्षाओं का वैष्विक संवाद- राजनैतिक आंदोलन और विभिन्न सामाजिक आंदोलनों के प्रतिरोध के जरिये होना शुरू हो चुका है। इस प्रतिरोध का स्वर वैष्विक स्तर पर काफी तीखा है और इसे उन्हें मजबूरन वैष्विक सत्ता को स्वीकार करना पड़ रहा है। इसी संदर्भ में यूएनओ ने पिछले दषक में स्टनेब्ल डवलपमेंट गोल की योजना बनी थी। इसमें खेती के पूंजीवादीकरण की मुखालफत करते हुए समाज केंद्रित खेती की अवधारणा स्वीकार की गयी थी। इसी बात को झारखंड आंदोलन के दौरान दिषुम गुरू षिबू सोरेन ने बखूबी समझते हुए कहा था, ‘‘झारखंड की जनता ने हमारे कंधों पर जो दायित्व सौंपा है, उसे पूरा करके अपने आने वाली पीढ़ी को हम यह एहसास नहीं होने देंगे कि ‘‘उनके धड़ पे कोई चेहरा नहीं था।’’

सच में मुनाफाकेंद्रित विकास नीतियों ने झारखंड में चेहरा रहित धड़ों की संख्या बढ़ा दी है और इसे कहने में कोई गुरेज नहीं होना चाहिए कि बाद के वर्षों में झामुमो ने भी वही नीति अपनायी, जो अन्य राजनैतिक दलों की थी। उसके लिए वही नीतियां महत्वपूर्ण थी, जो अन्य लोगों के लिए। परिणामतः भूअधिग्रहण से लेकर कृषि के पूंजीवादीकरण को बढ़ावा देना शुरू कर दिया। जबकि झारखंडी जन समुदायों की जनांकाक्षाएं- कई वैष्विक त्रासदियों के विकल्प हो सकते थे, इस पर ध्यान नहीं दिया गया। यही कारण है कि राज्य की आबादी का मुख्य पेशा हमारी राजनीति से बाहर हो गयी और किसान आंदोलन और नेतृत्व का विकास हम नहीं कर सके। इसी प्रवाह में अन्य पार्टियों के साथ वामदल भी बह गयी। 

अब क्या करें?

छोटे और सीमांत किसानों का बने रहना, सिर्फ उनके अस्तित्व के लिए नहीं, बल्कि पूरी दुनिया के गुणवत्तापूर्ण खाद्य-सुरक्षा का एक महत्वपूर्ण पहलू है, क्योंकि कृषि के क्षेत्र को पूंजीवादी ढांचे में ढालने का मतलब होगा कि हमारी खाने की थाली में पोषण युक्त भोज्य पदार्थ नहीं, बल्कि नुकसानदायक जहरों से लबरेज भोज्य पदार्थ हमें परोसा जायेगा। इतना ही नहीं, खेत लेकर पानी तक में नुकसानदायक जहरों से संदूषण होना, एक अनिवार्य परिणीति है। ऐसी स्थिति में खेती और किसानी के पारंपरिक ढांचे को बनाए रखना, बहुत ही जरूरी है। इसलिए इस तरह के ढांचे के अवसादपूर्ण स्थिति से निकालने की लड़ाई को राजनीति के प्राथमिकताओं में शामिल किया जाये। इसके लिए किसानों के यथार्थपरक मुद्दों के साथ राजनैतिक दलों का संवाद स्थापित किया जाये, ताकि किसान के मुद्दे लोकतंत्र के मंदिर में ईमानदारी के साथ उठाये जा सके। इसी के साथ यह भी जरूरी है कि शहरी आबादी को किसानों की समस्या पर संवेदनशील बनाते हुए एक दबाव-समूह का निर्माण किया जाये, ताकि किसान के सम्मान की पुनस्र्थापना हो।     

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