भगवान परशुराम ने भीष्म पितामह को दी थी शस्त्र शिक्षा

भगवान परशुराम ने भीष्म पितामह को दी थी शस्त्र शिक्षा

डॉ श्रीगोपाल नारसन (एडवोकेट)

”कहता है इतिहास जगत में हुए एक ही नर ऐसा। रण में कुटिल काल सम क्रोधी तप में महा सूर्य जैया।।”

– राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर


पराक्रम और तपस्या के बल पर संसार मे ख्यातिलब्ध भगवान परशुराम चिरंजीवी हैं। वे श्रीराम के समय भी और श्रीकृष्ण के समय भी मौजूद रहे,वही आज भी उन्हें जीवित ही माना जाता है। परशुराम ने ही  श्रीकृष्ण को सुदर्शन चक्र उपलब्ध कराया था। किवदंती है  कि महेंद्रगिरि पर्वत भगवान परशुराम की तपस्या स्थली रही है और  उसी पर्वत को कल्पांत तक  तपस्या के लिए उन्होंने चुना था। कहते है, एक बार भगवान गणेश ने परशुराम को शिव दर्शन करने से रोक दिया था जिससे रुष्ट होकर परशुराम ने उन पर अपने फरसे से प्रहार किया, जिससे उनका एक दांत टूट गया और वे एकदंत हो गए। त्रेता युग में  सीता स्वयंवर में शिव धनुष टूटने पर वे पहले नाराज हुए और फिर श्रीराम का सम्मान भी किया।

द्वापर युग में उन्होंने असत्य वचन के लिए दंड स्वरूप कर्ण को सारी विद्या विस्मृत होने का श्राप दिया और भीष्म, द्रोण व कर्ण को शस्त्र विद्या प्रदान की थी।भगवान परशुराम को विष्णु का छठा अवतार माना जाता है, जबकि श्रीराम सातवें अवतार हैं। भगवान परशुराम का जन्म 5142 वि.पू. वैशाख शुक्ल तृतीया के प्रथम प्रहर में हुआ था। इनका जन्म सतयुग और त्रेता का संधिकाल भी माना जाता है। भगवान परशुराम का जन्म 6 उच्च ग्रहों के योग के समय में हुआ। जन्म तिथि अक्षय तृतीया होने कारण इसी दिन परशुराम जयंती मनाई जाती है। भगवान परशुराम ने अपने बल से आर्यों के शत्रुओं का भी विनाश किया था। हिमालय के उत्तरी भू-भाग, अफगानिस्तान, अपगण, ईरान, कश्यप भूमि, इराक व अरब आदि देशों में जाकर भगवान परशुराम ने आर्य शत्रुओं का जमकर संहार किया था। आर्य संस्कृति को प्रचारित करते हुए उन्होने आर्यन यानि ईरान के कश्यप भूमि क्षेत्र व आर्यक यानी इराक को नई पहचान दी थी। विभिन्न धर्म ग्रन्थों का व्यापक अध्ययन करने के बाद यह तथ्य उदघाटित हुआ है कि मुम्बई से कन्याकुमारी तक के क्षेत्र को आठ कोणों में बांटकर भगवान परशुराम ने नया प्रान्त बनाया था। जिसकी रक्षा की प्रतिज्ञा भी उन्होने की थी। वही केरल प्रदेश को बसाने वाले भी भगवान परशुराम ही थे। भगवान परशुराम शोध ग्रन्थ के मुताबिक परशुराम में ब्रह्मा की सृजन शक्ति ,विष्णु की पालन शक्ति व शंकर की संहार शक्ति विधमान थी। इसी लिए उन्हें त्रिवन्त कहा गया है। जिस स्थान पर उन्होंने तपस्या की थी, वह स्थान आज तिरूवंनतपुरम के नाम से प्रसिद्ध है, जो केरल की राजधानी भी है।

केरल, कन्याकुमारी व रामेश्वरम के संस्थापक भगवान परशुराम की केरल में लोग नियमित पूजा करते है। पंडित लोग संकल्प मंत्र में परशुराम क्षेत्र का उच्चारण कर उक्त समूचे क्षेत्र को परशुराम की धरती मानते है। देश की प्रमुख नदियों में ब्रह्मपुत्र,राम गंगा व बाणगंगा नदियों को जनकल्याण के लिए दूसरी दिशाओं में प्रवाहित करने का श्रेय भगवान परशुराम को ही जाता है। शोध में यह बात भी सामने आई है कि परशुराम ने क्षत्रियों का कभी विनाश नही किया था। उन पर लगाया गया यह आरोप पूरी तरह से मिथ्या है। जिस तरह भगवान राम ने ब्राह्मण के बजाय एक अत्याचारी रावण की हत्या की थी, उसी तरह परशुराम ने भी अपने समय में उन दुष्टों का संहार किया जो मानवता के विरोधी थे। वस्तुत भारतीय संस्कृति में तीन कल्याणकारी राम अवतरित हुए है जिनमें आदि राम परशुराम ,दशरथ पुत्र राम व श्रीकृष्ण के बडे भाई बलराम शामिल है।

परशियन भाषा और परशिया स्थान के परशुराम के अनुयायी जो कि अग्नि पूजक है, के कारण परशुराम सदैव चिरंजीवी रहेगे। अठारह महापुराणों में भगवान परशुराम के अवतार का उल्लेख पढ़ने को मिलता है। जिसका चित्रण कही समास शैली में तो कही व्यास शैली में किया गया है। विष्णु पुराण में भृगु और ख्याती से लक्ष्मी का जन्म होना बताया गया है। जब विष्णु आदित्य रूप में प्रकट हुए तो लक्ष्मी पदमा रूप में प्रतिष्ठित हुई। जब परशुराम के रूप में विष्णु ने अवतार लिया तो लक्ष्मी पृथ्वी रूप में उनके साथ रही।

भगवान परशुराम को भागवत पुराण में सोलवा अवतार माना गया है। वैशाख शुक्ल तृतीया के दिन महर्षि जमदग्नि के पुत्र के रूप में माता रेणुका के गर्भ से परशुराम रूप में जन्म लिया और संसार से अन्याय दूर करने के लिए शस्त्र हाथ में उठाकर शत्रुओं का संहार किया तथा धर्म की विजय पताका फहराई । भगवान परशुराम योग,वेद व नीति शास्त्र में निष्णात थे। तंत्र कर्म व ब्रह्मास्त्र सहित अनेक दिव्य अस्त्रों के संचालन में उन्हें पारंगत माना जाता था। सीता स्वयंवर में श्री राम की वास्तविकता जानने पर उन्होने श्री राम का भक्ति भाव के साथ अभिनन्दन किया तो महाभारत काल में कौरव की सभा में भगवान परशुराम भगवान श्रीकृष्ण का खुला समर्थन करते नजर आए। इतना ही नहीं उन्होंने गंगा पुत्र देवव्रत यानी भीष्म पितामह को भी शस्त्र विधा सिखाई थी।

भगवान परशुराम का उत्तराखंड से भी गहरा नाता रहा है। उत्तराखंड के उत्तरकाशी के निकट वरूणावत पर्वत पर भगवान परशुराम ने घोर तपस्या की थी। इसी तपस्या के बल पर भगवान परशुराम संसार से अन्याय का खात्मा करने में सफल रहे जिसके लिए उन्होंने अधर्मियों,अन्याय व अत्याचार के खिलाफ शस्त्र उठायें। भगवान परशुराम की इस तपस्या स्थली को आज भी लोग नमन करते है। उत्तरकाशी में भगवान परशुराम की तपस्या स्थली होने के कारण ही उत्तरकाशी में भगवान परशुराम का भव्य मंदिर बना हुआ है।  साहित्यकार शिवकुमार सिंह कौशिकेय द्वारा किये गए शोध के तहत परशुराम का जन्म वर्तमान बलिया के गोराडीह में बताया गया हसि। उत्तर प्रदेश के शासकीय बलिया गजेटियर में परशुराम का चित्र सहित संपूर्ण विवरण उपलब्ध होना बताया गया है।

एक किंवदंती में  मध्यप्रदेश के इंदौर के पास स्थित महू से कुछ ही दूरीपर स्थित जानापाव की पहाड़ी पर भगवान परशुराम का जन्म होना बताया गया है। यहां पर परशुराम के पिता ऋर्षि जमदग्नि का आश्रम है। कहते हैं कि प्रचीन काल में इंदौर के पास ही मुंडी गांव में स्थित रेणुका पर्वत पर माता रेणुका रहती थीं। एक अन्य मान्यता में छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले में घने जंगलों के बीच स्थित कलचा गांव में स्थित एक शतमहला है। जमदग्नि ऋषि की पत्नी रेणुका इसी महल में रहती थीं और भगवान परशुराम को उन्होंने यही जन्म दिया।

वही शाहजहांपुर के जलालाबाद में जमदग्नि आश्रम से करीब दो किलोमीटर पूर्व दिशा में हजारों साल पुराने मंदिर के अवशेष मिलते हैं जिसे भगवान परशुराम की जन्मस्थली कहा जाता है। महर्षि ऋचीक ने महर्षि अगस्त्य के अनुरोध पर जमदग्नि को महर्षि अगस्त्य के साथ दक्षिण में कोंकण प्रदेश में धर्म प्रचार का कार्य करने लगे। कोंकण प्रदेश का राजा जमदग्नि की विद्वता पर इतना मोहित हुआ कि उसने अपनी पुत्री रेणुका का विवाह इनसे कर दिया।

इन्ही रेणुका के पांचवें गर्भ से भगवान परशुराम का जन्म हुआ। जमदग्नि ने गृहस्थ जीवन में प्रवेश करने के बाद धर्म प्रचार का कार्य बंद कर दिया और राजा गाधि की स्वीकृति लेकर इन्होंने अपना जमदग्नि आश्रम स्थापित किया और अपनी पत्नी रेणुका के साथ वहीं रहने लगे। राजा गाधि ने वर्तमान जलालाबाद के निकट की भूमि जमदग्नि के आश्रम के लिए चुनी थी। जमदग्नि ने आश्रम के निकट ही रेणुका के लिए कुटी बनवाई थी आज उस कुटी के स्थान पर एक अति प्राचीन मन्दिर बना हुआ है जो आज ढकियाइन देवी के नाम से सुप्रसिद्ध है। भगवान परशुराम के लिए जहां अपने पिता की आज्ञा सर्वोपरि रही वही वे अपने क्रोध व शिव भक्ति के लिए भी जाने जाते है।कहा जाता है कि एक बार उन्होंने अपने पराक्रम से नदियों तक की दिशा मोड़ दी थी।

(युवराज)

(ये विचार लेखक के निजी हैं। इससे जनलेख प्रबंधन का कोई लेना-देना नहीं है। लेखक साहित्यकार है)

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