संस्कृति पर आक्रमण का साधन बन रहे हैं आधुनिक विज्ञापन

संस्कृति पर आक्रमण का साधन बन रहे हैं आधुनिक विज्ञापन

एक आभूषण कंपनी के लिए कृति सेनन का रक्षाबंधन विज्ञापन विवादों में है। अभिनेत्री जिस प्रकार अर्धनग्न कपड़ों में राखी बाँध रही है, उसने भाई-बहन के रिश्ते की भारतीय मर्यादा को निश्चित रूप से तार-तार किया है। देश का बड़ा वर्ग विज्ञापन की अभद्रता से आहत है और सोशल मीडिया पर इसे लेकर बहस छिड़ी हुई है। हालांकि पश्चिमी व्यवहारों को आधुनिकता के नाम पर भारत में, विशेषकर हिन्दुओं के पर्व पर परोसने वाला यह कोई पहला विज्ञापन नहीं है। इससे पहले होली पर सर्फ एक्सल, भारत मेट्रोमोनी, दीपावली पर तनिष्क का लव जिहाद, आलिया का मान्यवर, आमिर-कियारा का एक बैंक विज्ञापन आदि अनेक अवसरों पर भारतीय सांस्कृतिक विरासत को कलंकित करने का प्रयास कर चुके हैं।

आज सोशल मीडिया हो या टीवी, कोई भी व्यक्ति विज्ञापन से नहीं बच सकता। विज्ञापन बच्चों-बड़ों सभी के मानस पर सीधा व गहरा प्रभाव डालते हैं। यदि कहा जाए कि फिर भी इनका निर्माण और प्रसारण मनमाने ढंग से किया जा रहा है तो गलत नहीं होगा। ये तमाम विज्ञापन उदाहरण हैं कि संस्थाएं देश की सभ्यता और संस्कृति के प्रति उत्तरदायित्व का निर्वहन नहीं कर रहीं। प्रश्न उठना लाजिमी है कि वह कौन लोग हैं, कौन-सा समूह है, जो बार-बार ऐसे विज्ञापनों के माध्यम से भारतीयता पर आक्रमण करने में सफल हो रहा है? और क्या प्रसारित हो चुके विज्ञापनों का निरस्तीकरण इस समस्या का पूर्ण निदान है? स्मरण रहना चाहिए कि विज्ञापन निर्माताओं को होने वाला भुगतान ग्राहक के रूप में हमारे-आपके के ही जेब से लिया जाता है जबकि फिल्मों में किसी एजेंडे को चलाने से जन विरोध होने पर जनता के बजाय फिल्म निर्माता को आर्थिक क्षति पहुँचती है।

भारत में विज्ञापनों का नियामक प्राधिकरण कौन है? आश्चर्यजनक रूप से हमारे देश में विज्ञापनों का कोई संविधान निर्मित केंद्रीय नियामक नहीं है। भारत में जो भी विज्ञापन चलते या छपते हैं, वह एक स्व-नियामक स्वैच्छिक संगठन से सत्यापित होते हैं। 1985 में स्थापित भारतीय विज्ञापन मानक परिषद (एएससीआई) भारत में विज्ञापन उद्योग का एक पूर्णतः गैर-सरकारी नियामक निकाय है। ।ैब्प् के अनुसार उसका उद्देश्य उपभोक्ताओं के हितों की सुरक्षा सुनिश्चित करते हुए विज्ञापन में स्व-नियमन के लिए प्रतिबद्धता स्थापित करना है।

विज्ञापन उद्योग के चार मुख्य घटक अर्थात विज्ञापनदाता, विज्ञापन एजेंसी, मीडिया और संबद्ध व्यवसायों ने मिलकर इस स्वतंत्र एनजीओ का गठन किया। बतौर ।ैब्प्, उसका उद्देश्य विज्ञापन में जनता के विश्वास को बनाए रखना और बढ़ाना है। संस्था का दावा है कि भारत में प्रसारित सभी विज्ञापन सामग्री सत्य, कानूनी और ईमानदार, सभ्य और महिलाओं को वस्तुपरक नहीं दर्शाने वाली, उपभोक्ताओं के लिए सुरक्षित एवं विशेष रूप से बच्चों को मानसिक आघात नहीं पहुंचाने वाली होगी। जबकि इस दावे की व्यवहारिक सच्चाई से सभी अवगत हैं।

2007 में भारत सरकार ने केबल टीवी नेटवर्क नियमों के विज्ञापन कोड में संशोधन किया जिसके माध्यम से टीवी पर ।ैब्प् कोड का उल्लंघन करने वाले विज्ञापनों को अनुमति नहीं दी जा सकती। मतलब परोक्ष रूप से ।ब्ैप् की ताकत और बढ़ा दी गयी। जनवरी 2017 में सर्वाेच्च न्यायालय ने अपने फैसले में भारत में टीवी और रेडियो के लिए विज्ञापन सामग्री विनियमन के क्षेत्र में वैधानिक प्रावधानों के लिए श्एक प्रभावी पूर्व-खाली कदमश् के रूप में स्व-नियामक तंत्र की पुष्टि की और इसे मान्यता दे दी।

फिल्मों के अवांछनीय, कामुक, अमर्यादित और फूहड़ दृश्यों को यदि कला के अधीन कथावस्तु की मांग मान लें तब भी विशुद्ध व्यावसायिक विज्ञापनों के लिए यह मानदंड बचाव का साधन नहीं बन सकता। स्पष्ट होना चाहिए कि उपभोक्ता वह है, जो उत्पाद के क्रय की स्वीकृति देता है अथवा उसे अस्वीकार करता है। परंतु विज्ञापन को देखने-सुनने वाला व्यक्ति उपभोक्ता से बहुत पहले एक दर्शन या श्रोता है। यहां तक कि उसका विज्ञापन में दिखाए गए उत्पाद से कोई संबंध हो, इसकी भी कोई गारंटी नहीं होती।

विज्ञापनों से संस्कृति पर लगातार हो रहे हमलों को दृष्टिगत रखते हुए यह आवश्यक है कि भारत में विज्ञापनों को नियंत्रित तत्काल किया जाए। व्यापारिक उद्देश्य की पूर्ति के नाम पर कोई कारोबारी या प्रसारक समूह देशवासियों की मान्यताओं और भावनाओं को ठेस न पहुंचा सके, यह सुनिश्चितन करना भी देश की केंद्रिय सरकार का दायित्व है। धर्म विशेष के देवताओं का अपमान और भारतीय पर्वों पर प्रश्नचिन्ह लगाने वाले विज्ञापनों से समाज में अनायास वैमनस्य बढ़ता है।

धार्मिक सौहार्द को बिगाड़ने वाले विषयों को एकतरफा प्रदर्शित किए जाने की घटनाओं ने कई बार अकारण दो सम्प्रदायों के बीच परस्पर विद्वेष को भड़काया है। मामूली वस्तुओं की बिक्री के लिए नग्नता और वासना को माध्यम बनाकर विज्ञापन निर्माता बाल सुलभ और किशोर मस्तिष्क पर क्या कोई सार्थक प्रभाव डालते हैं? आज सेंसर बोर्ड की तर्ज पर एक विशुद्ध संवैधानिक और पूर्णतः जवाबदेह विज्ञापन नियामक संस्था आधुनिक एवं आत्मनिर्भर भारत की अहम आवश्यकता है। प्रत्यक्ष विदेशी निवेश और अस्पष्ट सूचना प्रोद्यौगिकी नियमावली के दौर में भारत की संप्रभुता और हमारी सभ्यता की रक्षा के लिए विज्ञापनों को जवाबदेह बनाया जाना अत्यंत आवश्यक है।

आलेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं। इससे जनलेख प्रबंधन का कोई सरोकार नहीं है।

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