डॉ. ब्रजेश कुमार मिश्र
फारस की खाड़ी और अरब सागर के बीच स्थित होर्मुज़ जलडमरूमध्य आज विश्व राजनीति का सबसे संवेदनशील समुद्री बिंदु बन चुका है। भू-राजनीतिक, भू-आर्थिक और भू-सामरिक दृष्टि से यह जलमार्ग आधुनिक वैश्विक व्यवस्था का केंद्रीय तंत्रिका-बिंदु है। विश्व के लगभग 20 प्रतिशत तेल और बड़ी मात्रा में प्राकृतिक गैस इसी मार्ग से होकर एशिया, यूरोप और अमेरिका तक पहुँचती है। प्रतिदिन लगभग 20दृ21 मिलियन बैरल तेल का आवागमन इसे वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति की “जीवनरेखा” बनाता है।
होर्मुज़ का महत्व कोई नया नहीं है। बाबरनामा में भी इसका उल्लेख मिलता है, जहाँ बाबर ने मध्य एशिया के फ़रगना से वस्तुओं के इस मार्ग से अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक पहुँचने का वर्णन किया है। इससे स्पष्ट होता है कि मध्यकाल में भी यह क्षेत्र व्यापारिक संपर्क का प्रमुख केंद्र था।
आधुनिक इतिहास में 1515 में पुर्तगाल ने इस पर कब्ज़ा कर समुद्री व्यापार मार्गों पर नियंत्रण स्थापित किया। बाद में 1622 में ईरान के सफवीद शासन और अंग्रेजों के संयुक्त प्रयास से पुर्तगालियों को हटाया गया। इसके बाद यह एक अंतरराष्ट्रीय जलडमरूमध्य के रूप में स्थापित हुआ, हालांकि आज भी ईरान इस पर अपनी सामरिक दावेदारी बनाए हुए है।
मध्य-पूर्व में जारी तनाव ने इस क्षेत्र को फिर वैश्विक चिंता का केंद्र बना दिया है। फरवरी 2026 के अंत तक ब्रेंट क्रूड की कीमत लगभग 70 डॉलर प्रति बैरल थी, जो मार्च के मध्य तक बढ़कर 102-104 डॉलर प्रति बैरल तक पहुँच गई। यह उछाल सीधे तौर पर होर्मुज़ से तेल आपूर्ति में बाधा का परिणाम है।
इस संकट का सबसे बड़ा प्रभाव समुद्री व्यापार पर पड़ा है। इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स द्वारा जहाजों को चेतावनी दिए जाने के बाद कई अंतरराष्ट्रीय शिपिंग कंपनियों ने अपनी सेवाएँ अस्थायी रूप से रोक दीं। सैकड़ों जहाजों की आवाजाही प्रभावित हुई और हजारों नाविक इस क्षेत्र में फँस गए, जिससे वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला पर व्यापक असर पड़ा।
भारत के लिए यह संकट विशेष रूप से गंभीर है, क्योंकि वह अपने तेल आयात का बड़ा हिस्सा खाड़ी क्षेत्र से प्राप्त करता है। प्रारंभिक चरण में 36-38 जहाजों और लगभग 1100 नाविकों के प्रभावित होने की आशंका जताई गई थी। वर्तमान में लगभग 22 भारतीय जहाज और 611 भारतीय नाविक अब भी इस क्षेत्र में फँसे हैं।
हालाँकि कूटनीतिक प्रयासों के चलते कुछ एलपीजी टैंकर सुरक्षित रूप से मार्ग पार कर पाए हैं, जिससे आंशिक राहत मिली है। फिर भी, यह स्थिति भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिए एक बड़ी चुनौती बनी हुई है, जिसके समाधान के लिए वैकल्पिक आपूर्ति स्रोतों और रणनीतिक भंडारण पर काम किया जा रहा है।
चीन इस संकट में एक अलग भूमिका निभा रहा है। वह ईरान का प्रमुख तेल खरीदार है और “शैडो फ्लीट” के माध्यम से तेल आयात जारी रखे हुए है। इसी कारण माना जाता है कि ईरान चीनी जहाजों के प्रति अपेक्षाकृत नरम रुख अपनाए हुए है।
वहीं रूस, जो स्वयं एक बड़ा ऊर्जा निर्यातक है, पश्चिमी प्रतिबंधों के कारण एशियाई बाजारों की ओर झुकाव बढ़ा रहा है। ईरान और रूस के बीच बढ़ता ऊर्जा और सामरिक सहयोग इस क्षेत्रीय समीकरण को और जटिल बनाता है।
एक महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि अमेरिका इस जलमार्ग की पूर्ण सुरक्षा सुनिश्चित क्यों नहीं कर पा रहा है। इसके पीछे कई कारण हैंकृ होर्मुज़ जलडमरूमध्य का अत्यंत संकीर्ण होना, समुद्री माइन्स, ड्रोन और मिसाइल हमलों का उच्च जोखिम, ईरान की मजबूत तटीय रक्षा प्रणाली और तेज़ नौसैनिक क्षमताएँ, व्यापक युद्ध की आशंका, जिससे पूरा खाड़ी क्षेत्र अस्थिर हो सकता है। इन कारणों से अमेरिका भी प्रत्यक्ष टकराव से बचते हुए संतुलित रणनीति अपनाने को मजबूर है।
इस संकट का आर्थिक प्रभाव व्यापक है। वैश्विक शेयर बाजारों में अस्थिरता, ऊर्जा कीमतों में वृद्धि और महंगाई के बढ़ते खतरे ने कई देशों की अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ा दिया है। यदि यह स्थिति लंबे समय तक बनी रहती है, तो वैश्विक मंदी की आशंका से भी इनकार नहीं किया जा सकता।
कुल मिलाकर होर्मुज़ जलडमरूमध्य केवल एक समुद्री मार्ग नहीं, बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन का प्रतीक बन चुका है। मध्यकालीन व्यापार से लेकर आधुनिक ऊर्जा राजनीति तक इसकी भूमिका लगातार बढ़ती रही है। आज, जब ईरान, अमेरिका और इज़राइल के बीच तनाव इस क्षेत्र को अस्थिर बना रहा है, तब यह जलडमरूमध्य विश्व अर्थव्यवस्था और भू-राजनीति का सबसे संवेदनशील केंद्र बन गया है। आने वाले समय में यह संकट किस दिशा में जाएगा, यह कूटनीति और सैन्य संतुलन पर निर्भर करेगा। लेकिन इतना निश्चित है कि जब तक होर्मुज़ में स्थिरता नहीं लौटती, तब तक वैश्विक ऊर्जा बाजार और अंतरराष्ट्रीय व्यापार अनिश्चितता के दौर से गुजरते रहेंगे।
लेखक श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय में सहायक आचार्य हैं। आलेख में व्यक्त विचार आपके निजी हैं। इससे हमारे प्रबंधन का कोई सरोकार नहीं है।
