बारिश का बदलता मिज़ाज : झारखंड के कई क्षेत्रों में बढ़ रहा है वर्षा का वार्षिक औसत

बारिश का बदलता मिज़ाज : झारखंड के कई क्षेत्रों में बढ़ रहा है वर्षा का वार्षिक औसत

झारखंड, विशेषकर रांची में हाल के दिनों में हो रही लगातार बारिश ने एक स्वाभाविक जिज्ञासा को जन्म दिया है, क्या यह केवल मौसम का उतार-चढ़ाव है, या फिर जलवायु परिवर्तन की आहट? यह सवाल केवल एक क्षेत्र तक सीमित नहीं, बल्कि पूरे देश और दुनिया के सामने खड़े उस बड़े संकट की ओर इशारा करता है, जिसे हम जलवायु परिवर्तन के नाम से जानते हैं।

पहली नज़र में देखें तो प्री-मानसून के दौरान गरज-तूफान और बारिश कोई असामान्य घटना नहीं है। बिहार, पश्चिम बंगाल, ओड़िशा आदि प्रांतों में इन दिनों इस प्रकार की बारिश होती रही है लेकिन चालू वर्ष में कुछ अलग प्रकार ट्रेंड देखे जा रहे हैं। बंगाल की खाड़ी में बनने वाले निम्न दबाव, वायुमंडलीय अस्थिरता और स्थानीय तापीय परिस्थितियां हर साल ऐसे मौसम को जन्म देती हैं लेकिन समस्या “बारिश होने” में नहीं, बल्कि “बारिश के बदलते स्वरूप” में है। अब वर्षा एक समान, संतुलित और अनुमानित नहीं रही, बल्कि कम समय में अत्यधिक और कई बार असामान्य रूप से केंद्रित हो गई है।

यही वह बिंदु है जहां से चिंता शुरू होती है। पिछले कुछ दशकों के आंकड़े बताते हैं कि रांची में कुल वर्षा की मात्रा में धीरे-धीरे वृद्धि हुई है। रांची के विगत 35 वर्षों के औसत वर्षा पर किए गए एक अध्ययने में बताया गया है कि 9.28 मिमी प्रति वर्ष की दर से बारिश में बढ़ोतरी हुई है। एक दूसरे अध्ययन में वर्ष 1901 से लेकर 2014 के औसत मानसूनी बारिश में तो कमी दर्ज की गयी है लेकिन मानसून से पहले और बाद में लगातार यह औसत बढ़ रहा है। उससे भी अधिक महत्वपूर्ण यह है कि वर्षा का वितरण अनियमित हो गया है। कभी अचानक मूसलाधार बारिश, तो कभी लंबे समय तक सूखा, यह चरम (extreme) स्थितियां अब अधिक सामान्य होती जा रही हैं। वैज्ञानिक भाषा में इसे “एरैटिक रेनफॉल” कहा जाता है, जो जलवायु परिवर्तन के प्रमुख संकेतों में से एक एक माना जाता है।

जलवायु परिवर्तन का मूल सिद्धांत सीधा है, जैसे-जैसे पृथ्वी का तापमान बढ़ता है, वातावरण में नमी धारण करने की क्षमता भी बढ़ती है। परिणामस्वरूप, जब वर्षा होती है तो वह कम समय में अधिक तीव्रता के साथ होती है। यही कारण है कि आज बारिश “धीमी और लगातार” कम, तथा “अचानक और तेज” अधिक दिखाई देती है।

हालांकि, हर असामान्य मौसमी घटना को सीधे जलवायु परिवर्तन से जोड़ देना भी उचित नहीं होगा। मौसम और जलवायु के बीच का अंतर समझना आवश्यक है। मौसम तात्कालिक होता है, कुछ दिनों या हफ्तों का, जबकि जलवायु दीर्घकालिक प्रवृत्तियों का परिणाम होती है। अतः रांची की मौजूदा बारिश को एक बड़े पैटर्न के हिस्से के रूप में देखना चाहिए, न कि आंशिक मौसमी परिवर्तण के तौर पर।

इस संदर्भ में स्थानीय कारकों की भूमिका भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। रांची और झारखंड में तेजी से बढ़ता शहरीकरण, जंगलों की कटाई और जल निकासी की अपर्याप्त व्यवस्था बारिश के प्रभाव को कई अव्यवस्थित बना रहा है। जहां पहले पानी जमीन में समा जाता था, अब वही पानी सड़कों और बस्तियों में जमा होकर बाढ़ जैसी स्थिति पैदा करता है। इस प्रकार, प्राकृतिक परिवर्तन और मानवीय हस्तक्षेप मिलकर समस्या को और जटिल बना देते हैं।

यह स्थिति केवल एक पर्यावरणीय चिंता नहीं, बल्कि विकास मॉडल पर पुनर्विचार की मांग भी है। यदि वर्षा का पैटर्न इसी तरह बदलता रहा, तो कृषि, जल प्रबंधन और शहरी योजना सभी पर इसका गहरा प्रभाव पड़ेगा। झारखंड जैसे राज्यों में, जहां एक बड़ा वर्ग आज भी वर्षा पर निर्भर है, यह अस्थिरता आजीविका के लिए सीधी चुनौती बन सकती है।

कुल मिलाकर रांची की लगातार बारिश को एक चेतावनी के रूप में देखा जाना चाहिए, न तो इसे पूरी तरह सामान्य मानकर नजरअंदाज किया जा सकता है और न ही केवल जलवायु परिवर्तन का ठप्पा लगाकर संतोष किया जा सकता है। सच्चाई यह है कि हम एक ऐसे संक्रमण काल में हैं, जहां मौसम के पारंपरिक पैटर्न टूट रहे हैं और एक मौसमी स्वरूप हमारे सामने प्रगट हो रहा है।

इस नए मौसमी स्वरूप के साथ सामंजस्य बैठाने के लिए आवश्यक है कि नीति-निर्माण, शहरी विकास और पर्यावरण संरक्षण को एकीकृत दृष्टिकोण से देखा जाए। अन्यथा, आज की यह लगातार बारिश कल की बड़ी आपदा का रूप ले सकती है।

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