दक्षिणपंथ/ एक खास संप्रदाय का जनसंख्या विस्फोट और चार राज्यों का चुनाव परिणाम

दक्षिणपंथ/ एक खास संप्रदाय का जनसंख्या विस्फोट और चार राज्यों का चुनाव परिणाम

भारत के कई प्रदेशों, जिलों व विधानसभाओं में मुसलिम जनसंख्या का कुटिल विस्फोट सहजता व सरलता से देखा जा सकता है। 4 मई को जारी किया पांच राज्यों के चुनावों रिजल्ट में विजयी उम्मीदवारों के विवरण की जांच करने के बाद… केरल में 140 सीटों में से 35 मुस्लिम विधायक हैं। (कांग्रेस के 30 विधायकों में से आठ मुस्लिम हैं, जबकि यूडीएफ के 22 मुस्लिम हैं।)। असम में 126 सीटों में से 19 मुस्लिम विधायक हैं। (कांग्रेस के 19 उम्मीदवारों में से 18 मुस्लिम हैं, एक उम्मीदवार जॉर्डन पार्टी से है, पश्चिम बंगाल में टीएमसी की सीटों में से 30 सीटें हैं।)। खबरों के मुताबिक, इस चुनाव में कुल 87 विधायकों ने जीत हासिल की है, जिनमें से दो तमिलनाडु में और एक पांडिचेरी में मुस्लिम विधायक इलेक्शन में जीत हासिल किया है।

दूसरी ओर, 2011 की जनगणना के अनुसार 5 राज्यों में मुस्लिम आबादी और प्रतिशत,-असम में 34.22 प्रतिशत, 27.01 प्रतिशत, केरल में 26.56 प्रतिशत, तमिलनाडु में 5.86 प्रतिशत और पुडुचेरी में 6.05 प्रतिशत जनसंख्या मुसलमानों की है। आंकड़े बताते हैं कि असम में 11 जिलों में मुस्लिम आबादी बहुमत में है। धुबरी में 79.67 प्रतिशत मुस्लिम हैं और दक्षिण सालमारा में 98.03 प्रतिशत आबादी मुसलमानों की है। जिस प्रकार जनसंख्या का स्वरूप दिख रहा है उससे साफ लगता है कि मुसलमानों की जनसंख्या भारत के खिलाफ एक प्रकार का षड्यंत्र है।

मुसलिम समाज में हम पिछले दशकों से जिस अतिरिक्त जनसंख्या-वृद्धि देख रहे हैं, वह संयोग या आकस्मिक घटना नहीं है। इसकी पृष्ठभूमि में षड्यंत्रपूर्वक योजना, डाह, ईर्ष्या, कब्जे की भावना जैसी कई मनोवृत्तियाँ कार्य कर रही हैं। यह एक सोची समझी व्यवस्थित रणनीति है, जिस पर मुसलिम समाज चल रहा है। यह सामान्य मुसलिम व्यक्ति की सामाजिक शिक्षा दीक्षा, सामाजिक लालन-पालन इस प्रकार का होता है व इनके धर्मगुरु इन्हें जन्म से घुट्टी ही इस प्रकार की पिलाते हैं कि इनकी स्वयं की बुद्धि व विवेक पर परदा पड़ जाता है। सामान्य मुसलिम व्यक्ति को स्वयं भी पता नहीं चलता कि कब वह इन कठमुल्लों का खिलौना बनकर स्वयं के तथा परिवार के बौद्धिक, आर्थिक, सामाजिक व शैक्षिक विकास के मार्ग से भटक गया है। इनका सामाजिक ताना-बाना व मदरसों से मिली अंधशिक्षा इन्हें बहुविवाह व अंधाधुंध बच्चे जन्म देने की घातक बीमारी को धार्मिक आचरण बताती है। इस प्रकार के आचरण से मरने के बाद जन्नत मिलेगी व जन्नत में हूरें मिलेंगी, ऐसा इन्हें भ्रमित कर दिया जाता है, फलस्वरूप मुसलिम समाज का सामान्य अशिक्षित, अल्प शिक्षित तो क्या शिक्षित व्यक्ति भी इस संदर्भ में अपने दिमाग के दरवाजे बंद कर लेता है और किसी भी प्रकार के तर्क-वितर्क को सुनना और बौद्धिक बातों में पड़ने जैसे क्रम को भी धर्म के विरुद्ध कार्य समझने लगता है।

इनके मदरसों की शिक्षा का ढाँचा भी बड़ा ही कुंद, बंद बुद्धि, घृणा व नफरत की नींव पर खड़ा होता है। आज के इस प्रगतिशील वैज्ञानिक युग में भी मदरसों की शिक्षा का विज्ञान, कंप्यूटर, वाणिज्य, प्रबंधन, कला, संगीत से कोई नाता नहीं होता। आज भी मदरसों की शिक्षा का एक बड़ा भाग मुसलिमों द्वारा किए गए अपने वैश्विक फैलाव के रक्तरंजित इतिहास को पढ़ाने में ही खर्च होता है। मदरसों में जनसंख्या बढ़ाकर क्षेत्र विशेष में निर्णायक स्थिति में आ खड़े होने की रणनीति इन बच्चों के मनो-मस्तिष्क में बचपन से ठसाठस भर दी जाती है। इस इसलाम के घृणा, नफरत व हिकारत के आधार पर फैलाव के अलावा ये जो दूसरा विषय मदरसों में पढ़ते हैं, वह कुरआन की शिक्षा का होता है।

भारत में मुसलिम जनसंख्या बढ़ने का व असंतुलन उत्पन्न होने का दूसरा सबसे बड़ा कारण पड़ोसी देशों से होनेवाली अवैध घुसपैठ है। पहले पाकिस्तान, फिर बांग्लादेशी, फिर अफगानी व अब रोहिंग्या मुसलिमों का षड्यंत्रपूर्वक भारत में घुसते चले आना भारत में जनसांख्यिकीय असंतुलन का एक महत्त्वपूर्ण कारण बन गया है। अवैध घुसपैठिए इतने तेज, शातिर व भयहीन होते हैं कि सीधे देश की राजधानी दिल्ली में बसने में भी इन्हें भय नहीं लगता, फलस्वरूप आज राजधानी दिल्ली में ऐन केंद्र सरकार की नाक के नीचे बहुत बड़ी संख्या में अवैध बांग्लादेशी दिल्ली को अपने नित नए अपराधों व षड्यंत्रों का शिकार बनाए हुए हैं।

केरल, कश्मीर व पूर्वाेत्तर के राज्यों में निर्धन हिंदुओं को लालच देकर बड़ी संख्या में धर्मातंरण कराने के अनेक ज्वलंत घटनाक्रम प्रतिदिन समाज के समक्ष आ रहे हैं। मुसलिम समाज में अशिक्षा, जागरूकता का अभाव और धार्मिक कट्टरता प्रजनन दर बढ़ाने के प्रमुख कारण तो हैं ही, साथ-साथ देश में बहुसंख्यक होकर कब्जा कर लेने का आपराधिक भाव इनके मन-मस्तिष्क पर बेतरह हावी हो गया है। मुसलिम मुल्ला मौलवियों के धार्मिक उपदेशों व तकरीरों में भारत व इसके संसाधनों को कब्जा लेने के स्वप्न को मुसलिम समाज की प्रत्येक पीढ़ी के दिमाग में इतनी कुटिलता से भरा जाता है कि व्यक्ति का दिमाग केवल एक पक्षीय होकर अंधा हो जाता है।

मुसलिम समाज की इस बेतरह बढ़ती प्रवृत्ति ने कई नए मिथक रच दिए हैं व कई नए मिथक स्थापित हो रहे हैं। जैसे 2001 और 2011 के जनसंख्या आँकड़ों ने यह मिथक तोड़ दिया है कि मात्र सीमावर्ती जिलों में अवैध घुसपैठ के कारण मुसलिमों की आबादी बढ़ रही है। 2001 की ही जनसंख्या के तथ्यों से यह स्पष्ट हो गया था, मध्य-भारत में भी हिंदुओं की तुलना में मुसलमान जनसंख्या विकास दर अधिक हो गई है। उत्तर प्रदेश की कुल जनसंख्या में तो मुसलिमों का प्रतिशत 18.49 हो गया है। उ.प्र. के 20 जिले ऐसे हैं, जिनमें मुसलिमों की संख्या 20 से 40 प्रतिशत तक है। बिहार भी इस अभियान का एक बड़ा केंद्र बन गया है। बिहार के 10 जिले ऐसे हैं, जहाँ मुसलिम जनसंख्या इन सभी षड्यंत्रों के फलस्वरूप 30 प्रतिशत से ऊपर पहुँच गई है। बिहार में 50 विधानसभा सीटों पर मुसलिम निर्णायक स्थिति में आ गए हैं।

मुसलिम जनसंख्या वृद्धि के षड्यंत्र के पीछे एक बड़ा कारण यह भी है कि सामान्य मुसलिम व्यक्ति के मन में यह बात बैठा दी जाती है कि यदि मुसलिमों की संख्या अधिक होगी तो वह संबंधित क्षेत्र में राजनैतिक दृष्टि से निर्णायक होंगे व निर्णायक संख्या के वोटों के कारण उन्हें अधिक महत्त्व व सुविधाएँ पाने हेतु सौदेबाजी करने की स्थिति प्राप्त हो जाएगी। जनसंख्या असंतुलन को पूरी तरह राजनैतिक दृष्टि से ही विकसित किया जा रहा है। मुसलिम समाज के धर्मगुरु चुनावों के ठीक पहले सक्रिय हो जाते हैं व मुसलिम समाज के मतदान को लक्ष्यपूर्वक एक दिशा में मोड़ देते हैं। हिंदू समाज को यह बात स्पष्टतः समझ लेनी चाहिए कि एक मुश्त मतदान की शक्ति को मुसलिम समाज द्वारा पहचान लेना व इस शक्ति का अधिकतम उपयोग करने में सक्षम हो जाना इस समाज की एक बड़ी योग्यता व ताकत बन गया है। वहीं हिंदू समाज एक दिशा में मतदान करने की प्रवृत्ति या कला को अब तक समझ नहीं पाया है व विकेंद्रित मतदान करके अपने सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक व अन्य हितों की बलि चढ़ाता जा रहा है। इससे भी बढ़कर दुखद तब होता है, जब हिंदू जाति आधारित मतदान करके हिंदुत्व की शक्ति को जीर्ण-शीर्ण कर देता है।

जातिवाद हिंदुत्व का सबसे बड़ा दुश्मन है, इस बात को जिस दिन एक सामान्य हिंदू पहचान लेगा, उस दिन विदेशी धर्मों के आधे षड्यंत्र स्वयं ही विफल होते चले जाएँगे। हिंदुओं का परस्पर बँटा हुआ होना मुसलिम समाज को दोहरी शक्ति प्रदान कर देता है। भारत में अब यह भी एक स्थापित तथ्य हो गया है कि मुसलिम समाज अपने अधिकतम जनसमूह द्वारा मतदान कराने में सफल हो जाता है, जबकि इसी स्थान पर हिंदू समाज मतदान के प्रति उदासीन रहता है व बड़ी संख्या में मतदान करने जाता ही नहीं है। इस प्रकार बड़ी संख्या में मतदान करना व लक्ष्यहीन या विकेंद्रित मतदान करने की हिंदू समाज की प्रवृत्ति को भी परिवर्तित करना समय की एक बड़ी आवश्यकता बन गया है। यहाँ यह भी स्पष्ट समझ लेना चाहिए कि लक्ष्य केंद्रित सौ प्रतिशत हिंदू मतदान धार्मिक नहीं अपितु राष्ट्रवाद की दृष्टि से होना चाहिए। हिंदू समाज धार्मिक संकीर्णता या जाति की दृष्टि से नहीं अपितु राष्ट्रीयता, राष्ट्र व राष्ट्रविकास की दृष्टि से अधिकतम मतदान करे, तभी वह सफल होगा।

भारत के कई प्रदेशों, जिलों व विधानसभाओं में मुसलिम जनसंख्या का कुटिल विस्फोट सहजता व सरलता से देखा जा सकता है। जिस प्रकार के षड्यंत्रपूर्वक जनसंख्या विस्फोट की इस लेख में चर्चा की गई है, वह विषय अब भारत में नंगी आँखों से देखा-समझा जा सकता है और अब भी अनवरत जारी है। यदि इस षड्यंत्र को रोका नहीं गया तो भारत की स्वयं की अस्मिता व पहचान इतिहास के पन्नों में भी दिखाई न पड़ेगी व हिंदुत्व एक लुप्त-सुप्त शब्द हो जाएगा।

4 मई, 2026 को आए चुनाव नतीजों में, श्री राम के भक्तों द्वारा समर्थित राजनीतिक दल ने जीत का परचम लहराया। मैं उन्हें विशेष रूप से ष्राम के भक्तष् इसलिए कह रहा हूँ, क्योंकि पिछले एक दशक में उन्होंनेकृपूरे पश्चिम बंगाल के हर एक गाँव मेंकृश्री राम नवमी के उत्सवों को बड़े ही भव्य तरीके से आयोजित किया और शानदार शोभा यात्राएँ निकालीं, जिससे हिंदू जनता के बीच एक आध्यात्मिक जागृति पैदा हुई। इसके साथ ही, एक दूसरे मोर्चे पर, अयोध्या में श्री रामचंद्र का भव्य मंदिर भी बनकर तैयार हुआ। इसके अलावा, यह एक उल्लेखनीय तथ्य है कि आज भी बंगाली भाषा में विभिन्न ष्रामायणोंष् की एक विशाल और समृद्ध परंपरा मौजूद हैकृये महाकाव्य रचनाएँ मुख्य रूप से राम के भक्तों द्वारा ही लिखी गई हैं। यह परंपरा अत्यंत विशाल है। इसका प्रभाव लोगों की रग-रग में गहराई तक समाया हुआ है… यह स्वयं भगवान श्री रामचंद्र ही थे, जिन्होंने उस क्षेत्र के लोगों की रक्षा के लिए अपने भरोसेमंद बजरंगों को भेजा था।

लेखक विश्व हिन्दू परिषद् के अखिल भारतीय उपाध्यक्ष और पूर्णकालिक कार्यकर्ता हैं। आलेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं। इससे हमारे प्रबंधन का कोई सरोकार नहीं है।

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