डॉ. अटल तिबारी
झारखण्ड राज्य की कृषि मुख्यतः वर्षा आधारित है। खरीफ मौसम में समय पर एवं पर्याप्त वर्षा किसानों की खेती की सफलता तय करती है। परंतु पिछले कुछ वर्षों से जलवायु परिवर्तन के कारण वर्षा का वितरण असंतुलित हो रहा है। कहीं अत्यधिक वर्षा तो कहीं लंबे समय तक सूखे जैसी स्थिति देखने को मिल रही है। इस वर्ष भी मानसून की अनियमितता एवं वर्षा की कमी की संभावना को देखते हुए किसानों को वैज्ञानिक एवं लोचदार कृषि तकनीकों को अपनाने की आवश्यकता है, ताकि कम पानी में भी बेहतर उत्पादन प्राप्त किया जा सके।
इस मामले में कृषि विज्ञान केंद्र गुमला, विकास भारती बिशुनपुर ने झारखंड के किसानों को कई सलाह दी है। मसलन, वे मौसम आधारित खेती अपनाएँ तथा जल संरक्षण को प्राथमिकता दें। खरीफ फसलों की बुवाई वर्षा की वास्तविक स्थिति को देखकर करें। यदि पर्याप्त वर्षा नहीं हो रही हो तो लंबी अवधि वाली प्रभेदो के स्थान पर अल्प अवधि एवं सूखा सहनशील किस्मों का चयन करना लाभकारी रहेगा।
धान की खेती करने वाले किसान कम अवधि वाली एवं सूखा सहनशील किस्में जैसे- CR Dhan-807, CR dhan- 202, CR Dhan-320,CR dhan- 305, IR-64 drt-1, डीआरआर धान-42, Swarna shreya, सहभागी धान, अंजली धान, बिरसा विकास धान-111 आदि का चयन कर सकते हैं। सीधी बुवाई विधि (Direct Seeded Rice) तथा लाइन बुवाई अपनाने से बीज एवं पानी दोनों की बचत होती है। वही मडुवा बिरसा मडुवा-3, मूंगफली में के-1812, कादरी -9, ICGV-91114, मक्का- DHM-121, विवेक मक्का 45, पूसा HQPM -1, उड़द में कोटा उड़द -4, पंत उड़द- 31 इत्यादि किसान भाई धान, मडुवा, अरहर एवं सब्जियों की नर्सरी सामूहिक रूप से जिन स्थानों पर पानी की उपलब्ध हो वही पर करे साथ ही साथ धान की सामूहिक नर्सरी (community nursery) अलग- अलग तिथियों पर डाले जिससे स्वस्थ्य नर्सरी उपलब्ध हो सकेl
जहाँ सिंचाई की सुविधा सीमित हो वहाँ किसान धान के स्थान पर मक्का, अरहर, रागी, कोदो, जटगी, गूंदली, उड़द, मूंग एवं तिल जैसी कम पानी वाली फसलों को प्राथमिकता दें। मोटे अनाज एवं दलहनी फसलें कम वर्षा में भी अच्छा उत्पादन देती हैं तथा मिट्टी की उर्वरा शक्ति बनाए रखने में सहायक होती हैं। अंतरवर्तीय खेती प्रणाली जैसे मक्का-अरहर, बाजरा-उड़द, मूंगफली-अरहर, मूंगफली-मक्का, मडुवा-अरहर इत्यादि अपनाने से मौसम का जोखिम कम होता है और किसानों को अतिरिक्त आय प्राप्त होती है।
लोचदार कृषि (Climate Resilient Agriculture) वर्तमान समय की आवश्यकता बन चुकी है। इसके अंतर्गत खेत में नमी संरक्षण, वर्षा जल संचयन, मल्चिंग, जैविक पदार्थों का उपयोग एवं फसल विविधीकरण अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। सामूहिक रूप से खेत की मेढ़बंदी कर वर्षा जल को खेत में रोकने का प्रयास करें। सब्जी एवं फलदार पौधों में सूखी पत्तियों, धान के पुआल अथवा घास से मल्चिंग करने से मिट्टी में नमी लंबे समय तक बनी रहती है।
कृषि वैज्ञानिकों ने किसानों को सलाह दी है कि वे मिट्टी जांच के आधार पर संतुलित उर्वरक का प्रयोग करें। अत्यधिक रासायनिक उर्वरक उपयोग करने से मिट्टी की जल धारण क्षमता घटती है। गोबर की खाद, वर्मी कम्पोस्ट एवं हरी खाद का उपयोग मिट्टी को स्वस्थ बनाता है तथा सूखे की स्थिति में फसलों को सहनशील बनाता है।
कम वर्षा की स्थिति में खरपतवार नियंत्रण भी अत्यंत आवश्यक है, क्योंकि खरपतवार मिट्टी की नमी एवं पोषक तत्वों का तेजी से उपयोग करते हैं। समय पर निराई-गुड़ाई करने से फसल को उपलब्ध नमी का बेहतर उपयोग होता है। साथ ही किसान मौसम पूर्वानुमान की जानकारी नियमित रूप से प्राप्त करें और उसी के अनुसार कृषि कार्यों की योजना बनाएं।
पशुपालन, बकरी पालन, मधुमक्खी पालन एवं मुर्गी पालन जैसे सहायक कृषि व्यवसाय किसानों की आय सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण हैं। सूखे की स्थिति में केवल फसल पर निर्भर रहने के बजाय बहुआयामी कृषि प्रणाली अपनाना अधिक लाभकारी सिद्ध होगा। किसान वर्षा जल को तालाबों, बंद पड़े कुओ, डोभा इत्यादि में जल का संरक्षण करे, जिसका उपयोग नमी तनाव (Moisture stress) की स्थिति में उपयोग कर सकते है।
इस मामले में डॉ. बृजेश पाण्डेय ने कहा कि जलवायु परिवर्तन की चुनौती को देखते हुए किसानों को पारंपरिक खेती के साथ वैज्ञानिक तकनीकों को जोड़ना होगा। समय पर सही निर्णय, जल संरक्षण एवं लोचदार कृषि तकनीकों को अपनाकर कम वर्षा की स्थिति में भी खरीफ फसलों से बेहतर उत्पादन एवं स्थायी आय प्राप्त की जा सकती है।
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