भारत : 80 करोड़ को राशन और 200 करोड़ का ब्लाउज, विपरीत ध्रुवों के बीच खड़ा एक राष्ट्र

भारत : 80 करोड़ को राशन और 200 करोड़ का ब्लाउज, विपरीत ध्रुवों के बीच खड़ा एक राष्ट्र

भारत एक विचित्र मोड़ पर खड़ा है। एक ओर वह विश्वगुरु बनने के सपने देख रहा है, चंद्रमा पर पहुंचने का गौरव गा रहा है, पांच ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने की आकांक्षा व्यक्त कर रहा है; दूसरी ओर उसी देश में 80 करोड़ लोगों को जीवित रखने के लिए सरकार को मुफ्त राशन योजना चलानी पड़ रही है। यह केवल आर्थिक विषमता का प्रश्न नहीं, बल्कि उस विकास मॉडल का आईना है जिसमें चमक बहुत है, पर प्रकाश कम।

हाल ही में न्यूयॉर्क के मेट गाला जैसे वैश्विक फैशन मंच पर भारत की उपस्थिति चर्चा का विषय बनी। ईशा अंबानी की करोड़ों की पोशाक, हीरों से जड़े आभूषण और विलासिता के प्रतीक बने सामानों को भारतीय कला, शिल्प और ‘सॉफ्ट पावर’ का प्रदर्शन बताया गया। किंतु प्रश्न यह है कि क्या किसी राष्ट्र की शक्ति का पैमाना उसके अरबपतियों की निजी नुमाइश होती है? क्या कुछ लोगों का असीम वैभव पूरे समाज की उपलब्धि माना जा सकता है?

यहीं से आधुनिक भारत की सबसे बड़ी विडंबना आरंभ होती है। एक ऐसा देश जहाँ करोड़ों लोग आज भी भोजन, रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी जरूरतों के लिए संघर्ष कर रहे हों, वहाँ 200 करोड़ के ब्लाउज और 800 करोड़ के हार केवल फैशन नहीं रह जातेकृवे असमानता के सार्वजनिक स्मारक बन जाते हैं। वे उस खाई की याद दिलाते हैं जो ‘इंडिया’ और ‘भारत’ के बीच लगातार चौड़ी होती जा रही है।

यह तर्क दिया जा सकता है कि किसी व्यक्ति को अपनी संपत्ति खर्च करने का अधिकार है। लोकतांत्रिक और पूंजीवादी व्यवस्था में यह स्वाभाविक भी है। लेकिन समस्या तब उत्पन्न होती है जब संपत्ति का यह असंतुलन केवल बाजार की प्रतिस्पर्धा से नहीं, बल्कि सत्ता और पूंजी के गठजोड़ से पैदा होता दिखाई दे। आज देश में जिस प्रकार कुछ चुनिंदा घरानों का प्रभाव नीति-निर्धारण, संसाधनों के आवंटन और आर्थिक निर्णयों पर बढ़ता दिख रहा है, उसने ‘क्रोनी कैपिटलिज्म’ की बहस को पुनर्जीवित कर दिया है।

भारत में उदारीकरण के बाद पूंजी सृजन की प्रक्रिया तेज हुई, लेकिन उसके लाभों का वितरण समान नहीं हुआ। परिणाम यह है कि एक ओर विश्व के सबसे अमीर लोगों की सूची में भारतीय उद्योगपतियों की संख्या बढ़ रही है, दूसरी ओर बेरोजगारी, कुपोषण और कृषि संकट भी उतनी ही तेजी से समाज को जकड़ रहे हैं। यदि विकास का अर्थ केवल चुनिंदा लोगों की संपत्ति में अभूतपूर्व वृद्धि रह जाए, तो वह लोकतांत्रिक विकास नहीं बल्कि ‘कॉरपोरेट सामंतवाद’ का नया रूप बन जाता है।

विडंबना यह भी है कि जिस राष्ट्र में सरकार स्वयं यह स्वीकार कर रही हो कि 80 करोड़ नागरिकों को मुफ्त राशन की आवश्यकता है, उसी राष्ट्र में अरबों रुपये की निजी विलासिता को राष्ट्रीय गौरव के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। यह दृश्य किसी संवेदनशील समाज को बेचौन करना चाहिए। क्योंकि मुफ्त राशन केवल कल्याणकारी योजना नहीं, बल्कि यह संकेत भी है कि देश की बड़ी आबादी अब भी सम्मानजनक आय और क्रय शक्ति से वंचित है।

असल प्रश्न यह नहीं कि किसी ने कितने करोड़ का हार पहना। असली प्रश्न यह है कि क्या भारत की अर्थव्यवस्था इतनी समावेशी बन पाई है कि आम नागरिक भी गरिमापूर्ण जीवन जी सके? यदि करोड़ों लोग सरकारी सहायता पर निर्भर हैं, तो कुछ व्यक्तियों की अपार संपत्ति राष्ट्र की सफलता नहीं, बल्कि उसकी संरचनात्मक असफलता का संकेत भी हो सकती है।

‘परम वैभवशाली भारत’ का सपना केवल ऊँची इमारतों, ग्लोबल फैशन शो और अरबपतियों की सूची से पूरा नहीं होगा। राष्ट्र का वास्तविक वैभव उसके नागरिकों की शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और सम्मानजनक जीवन में निहित होता है। किसी भी सभ्य समाज की पहचान यह नहीं कि उसके महलों की दीवारें कितनी चमकदार हैं, बल्कि यह कि उसकी झोपड़ियों में कितना अंधेरा है।

आज भारत दो ध्रुवों के बीच खड़ा है, एक ओर असीम संपत्ति का चकाचौंध भरा संसार, दूसरी ओर जीविका के लिए संघर्ष करता विशाल जनसमुदाय। यह असमानता केवल आर्थिक संकट नहीं, बल्कि नैतिक और राजनीतिक चुनौती भी है। यदि लोकतंत्र का उद्देश्य अंतिम व्यक्ति तक अवसर और सम्मान पहुँचाना है, तो फिर यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि विकास की इस यात्रा में आखिर राष्ट्र किसके साथ खड़ा हैकृराशन की कतार में खड़े नागरिक के साथ, या हीरों की चमक में डूबे अभिजात वर्ग के साथ?

सोने के धागों से बुनी साड़ियों और अरबों के आभूषणों की चमक क्षणिक हो सकती है, लेकिन भूख, बेरोजगारी और विषमता का अंधेरा बहुत गहरा होता है। इतिहास गवाह है कि जब समाज में असमानता असहनीय स्तर तक पहुँचती है, तब वैभव के महल भी असंतोष की आंधियों से सुरक्षित नहीं रह पाते। इसलिए भारत के सामने सबसे बड़ा प्रश्न यही हैकृक्या वह कुछ घरानों की समृद्धि को राष्ट्र की समृद्धि मानने की भूल करेगा, या फिर ऐसा विकास मॉडल चुनेगा जिसमें अंतिम पंक्ति में खड़ा व्यक्ति भी सम्मानपूर्वक कह सके-“यह देश मेरा भी है।”

आलेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं। इससे हमारे प्रबंधन का कोई सरोकार नहीं है।

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