गौतम चौधरी
भारतीय राजनीति में कुछ प्रश्न ऐसे होते हैं जो कभी पूरी तरह समाप्त नहीं होते। वे समय-समय पर नए रूप, नए नारों और नई राजनीतिक भाषा के साथ लौटते रहते हैं। “बांग्लादेशी घुसपैठ” का प्रश्न भी ऐसा ही है। यह अब केवल सीमा सुरक्षा का मुद्दा नहीं रह गया; यह राष्ट्रवाद, नागरिकता, जनसांख्यिकी, श्रम-बाज़ार, धर्म और चुनावी राजनीति—इन सबके संगम का संवेदनशील विषय बन चुका है।
इसीलिए जब UPA और NDA सरकारों के दौरान बांग्लादेशी नागरिकों के निर्वासन (deportation) के आँकड़े सामने आते हैं, तो वे महज़ प्रशासनिक डेटा नहीं रहते; वे राजनीतिक आख्यानों के हथियार बन जाते हैं।
उपलब्ध संसदीय उत्तरों और सार्वजनिक रिपोर्टों के अनुसार, Manmohan Singh के नेतृत्व वाली UPA सरकार के दौरान औपचारिक निर्वासन की संख्या अपेक्षाकृत अधिक दर्ज हुई, जबकि Narendra Modi सरकार के शुरुआती वर्षों में यह संख्या काफी कम दिखाई देती है। पहली दृष्टि में यह विरोधाभासी प्रतीत होता है, क्योंकि सार्वजनिक विमर्श में NDA स्वयं को “घुसपैठ के विरुद्ध सबसे कठोर” सरकार के रूप में प्रस्तुत करती रही है।
किन्तु राजनीति में आँकड़े अक्सर पूरी कहानी नहीं कहते। असली अंतर दोनों सरकारों की राजनीतिक दृष्टि और प्रस्तुति में दिखाई देता है। UPA का दृष्टिकोण अपेक्षाकृत प्रशासनिक और संयमित था। उस दौर में अवैध प्रवासन के विरुद्ध कार्रवाई होती थी, लेकिन उसे राष्ट्रीय अस्मिता या सभ्यतागत संकट की भाषा में प्रस्तुत नहीं किया गया। सीमा सुरक्षा बल, विदेश मंत्रालय और राज्य सरकारों के स्तर पर पहचान और निर्वासन की प्रक्रियाएँ चलती रहीं। कांग्रेस की प्राथमिकताएँ उस समय आर्थिक विकास, कल्याणकारी योजनाओं और गठबंधन राजनीति पर अधिक केंद्रित थीं।
परंतु यही उसकी सबसे बड़ी राजनीतिक कमजोरी भी सिद्ध हुई। विशेषकर असम और पूर्वोत्तर में लंबे समय से यह धारणा बनी रही कि कांग्रेस वोट-बैंक राजनीति के कारण इस प्रश्न पर निर्णायक रुख अपनाने से बचती है। स्थानीय असंतोष धीरे-धीरे व्यापक राजनीतिक ऊर्जा में बदल गया। यही वह पृष्ठभूमि थी जिस पर BJP ने अपना राष्ट्रवादी आख्यान निर्मित किया।
2014 के बाद NDA सरकार ने “घुसपैठ” को मात्र प्रशासनिक समस्या नहीं रहने दिया; उसे राष्ट्रीय सुरक्षा और सांस्कृतिक पहचान के प्रश्न के रूप में स्थापित किया। NRC, CAA, सीमा बाड़बंदी, डिजिटल निगरानी और नागरिकता विमर्श—ये सभी उसी व्यापक राजनीतिक परियोजना के हिस्से के रूप में सामने आए। पहली बार “घुसपैठिया” शब्द चुनावी भाषणों, टीवी बहसों और सोशल मीडिया अभियानों का केंद्रीय राजनीतिक मुहावरा बना।
यहीं भारतीय राजनीति में एक निर्णायक परिवर्तन दिखाई देता है—UPA “समस्या-प्रबंधन” की भाषा बोलती थी, जबकि NDA “सभ्यतागत संकट” की। हालाँकि आलोचक यहीं सबसे बड़ा प्रश्न उठाते हैं। यदि समस्या वास्तव में इतनी गंभीर थी, तो शुरुआती वर्षों में औपचारिक निर्वासन संख्या कम क्यों दिखाई दी? इसके कई प्रशासनिक कारण बताए गए—डेटा वर्गीकरण में परिवर्तन, “पुशबैक” और “औपचारिक deportation” की अलग-अलग श्रेणियाँ, कानूनी प्रक्रियाओं की जटिलता और बांग्लादेश द्वारा नागरिकता सत्यापन की कठिनाइयाँ।
फिर भी आलोचना केवल तकनीकी नहीं है। अनेक विश्लेषकों का मानना है कि NDA ने इस मुद्दे को वास्तविक प्रशासनिक समाधान से अधिक भावनात्मक राष्ट्रवाद के औज़ार में परिवर्तित किया। अर्थात “घुसपैठ” सुरक्षा प्रश्न से आगे बढ़कर पहचान-आधारित राजनीतिक लामबंदी का माध्यम बन गई।
दूसरी ओर NDA समर्थकों का प्रतिवाद भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। उनके अनुसार पहली बार किसी सरकार ने इस विषय को स्पष्ट रूप से राष्ट्रीय एजेंडा बनाया, सीमा सुरक्षा अवसंरचना को मजबूत किया और नागरिकता के प्रश्न पर राजनीतिक स्पष्टता दिखाई।
यानी UPA पर आरोप “नरमी” का था, जबकि NDA पर आरोप “अतिरंजित राष्ट्रवाद” का है। लेकिन दोनों मॉडलों की सीमाएँ भी स्पष्ट हैं। UPA प्रशासनिक थी, पर राजनीतिक रूप से रक्षात्मक। NDA राजनीतिक रूप से आक्रामक है, पर कई बार प्रशासनिक जटिलताओं को नारों में बदल देती है। और शायद सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि दोनों सरकारों के बावजूद समस्या पूरी तरह समाप्त नहीं हुई।
कारण भी स्पष्ट हैं—भारत-बांग्लादेश की लंबी और जटिल सीमा, सस्ती श्रम अर्थव्यवस्था की माँग, नकली दस्तावेज़ नेटवर्क, स्थानीय राजनीतिक संरक्षण तथा दक्षिण एशिया की आर्थिक विषमताएँ। जब तक ये संरचनात्मक परिस्थितियाँ बनी रहेंगी, तब तक केवल राष्ट्रवादी भाषण या केवल प्रशासनिक चुप्पी—दोनों अकेले पर्याप्त समाधान नहीं दे सकते।
इस विमर्श की सबसे संवेदनशील परत नागरिकता और पहचान की है। भारत जैसे लोकतंत्र में अवैध प्रवासी की पहचान और वैध नागरिक की संवैधानिक सुरक्षा—दोनों के बीच संतुलन अत्यंत कठिन कार्य है। असम NRC के दौरान ऐसे अनेक मामले सामने आए जहाँ दशकों से बसे गरीब और अशिक्षित लोग भी दस्तावेज़ी संकट में फँस गए। इससे यह आशंका प्रबल हुई कि कहीं सुरक्षा नीति सामाजिक अविश्वास और नागरिक असुरक्षा में परिवर्तित न हो जाए।
यहीं लोकतंत्र की वास्तविक परीक्षा आरंभ होती है। राष्ट्र-राज्य को अपनी सीमाएँ सुरक्षित रखने का अधिकार है। किन्तु लोकतंत्र की गरिमा इस बात से निर्धारित होती है कि वह सुरक्षा और मानवाधिकार के बीच संतुलन किस प्रकार स्थापित करता है।
अंततः UPA और NDA की तुलना केवल दो सरकारों की तुलना नहीं है; यह भारतीय राजनीति की दो भिन्न शैलियों की तुलना है—एक मॉडल जो कम बोलता था लेकिन प्रशासनिक प्रक्रियाओं पर चलता था; दूसरा मॉडल जो ऊँची राजनीतिक भाषा के माध्यम से राष्ट्रीय चेतना को संगठित करता है।
दोनों की उपलब्धियाँ हैं, दोनों की विफलताएँ भी। और शायद सबसे असुविधाजनक सत्य यह है कि “घुसपैठ” का प्रश्न अब केवल सीमा का प्रश्न नहीं रह गया है। वह भारतीय लोकतंत्र की असुरक्षाओं, उसकी पहचान-राजनीति और उसके राष्ट्रवाद की प्रकृति का दर्पण बन चुका है।
(अनुमानित तुलनात्मक आँकड़े: विभिन्न संसदीय उत्तरों और मीडिया रिपोर्टों पर आधारित)
| सरकार | औपचारिक निर्वासन |
|---|---|
| UPA (2005–2013) | 88,792 |
| NDA शुरुआती वर्ष (2014–2018) | 1,822 |
