गौतम चौधरी
जब भी पश्चिम एशिया में युद्ध के बादल भड़कते हैं तो भारत में टेलीविजन स्टूडियो सबसे पहले सामरिक समीकरणों, तेल की वैश्विक कीमतों, कूटनीतिक चालों और महाशक्तियों की रणनीतियों पर चर्चा शुरू कर देते हैं। लेकिन इन बहसों के शोर में एक वर्ग लगभग हमेशा गायब रहता है, वह वर्ग जो युद्ध नहीं करता, युद्ध का निर्णय नहीं लेता, अंतरराष्ट्रीय राजनीति पर उसका कोई प्रभाव नहीं होता, फिर भी युद्ध की सबसे बड़ी कीमत उसी को चुकानी होती है। यह वर्ग है किसान, प्रवासी मजदूर, ग्रामीण क्षेत्रों में निवास करने वाले गरीब और निम्न आय वाले शहरी श्रमिकों का।
वरिष्ठ पत्रकार P. Sainath ने हाल में ध्यान दिलाया कि ईरान संकट और उससे पैदा हुई ऊर्जा अस्थिरता का प्रभाव भारत के गरीब तबकों तक पहुँच रहा है। उनकी टिप्पणी केवल किसी दूरस्थ भू-राजनीतिक संघर्ष पर प्रतिक्रिया नहीं थी, बल्कि उस अदृश्य आर्थिक भूचाल की ओर संकेत थी जिसकी कंपनें सबसे पहले समाज के कमजोर तबकों तक पहुँचती हैं। अपने एक आलेख के माध्यम से पी. साईनाथ ने इस गंभीर विषय को आम विमर्श में ला कर खड़ा कर दिया है।
भारत का मध्यवर्ग और संपन्न वर्ग महँगे ईंधन का बोझ किसी हद तक वहन कर सकता है। बड़ी कंपनियाँ बढ़ी हुई लागत को कीमतों में समायोजित कर सकती हैं। लेकिन एक सीमांत किसान, एक खेतिहर मजदूर, एक प्रवासी श्रमिक या एक छोटे ढाबे का संचालक ऐसा नहीं कर सकता। उसके लिए डीज़ल के कुछ रुपये बढ़ जाना भी आय और अस्तित्व के बीच का अंतर बन सकता है।
पंजाब, हरियाणा और उत्तर भारत के विशाल कृषि क्षेत्र आज भी ऊर्जा-निर्भर खेती पर टिके हुए हैं। सिंचाई, ट्रैक्टर, कटाई, ढुलाईकृलगभग हर चरण डीज़ल से जुड़ा है। स्वतंत्र पत्रकारों और कृषि क्षेत्र के पर्यवेक्षकों का कहना है कि पश्चिम एशिया संकट ने किसानों के बीच आर्थिक अनिश्चितता और लागत संबंधी चिंताओं को बढ़ाया है। यह आवश्यक नहीं कि हर किसान तत्काल संकट में हो, लेकिन यह भी सत्य है कि पहले से बढ़ती लागत, कर्ज और सीमित कृषि आय के बीच अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा अस्थिरता अतिरिक्त दबाव उत्पन्न करती है।
यह प्रश्न केवल पंजाब का नहीं है। बिहार, झारखंड और पूर्वी भारत के वे लाखों श्रमिक भी इस संकट की मार झेलते हैं जो रोज़गार की तलाश में दक्षिण और पश्चिम भारत के शहरों में जाते हैं। ऊर्जा और परिवहन लागत में वृद्धि का पहला प्रभाव अनौपचारिक क्षेत्र पर पड़ता है। निर्माण कार्य, छोटे उद्योग, होटल-ढाबे और असंगठित सेवाएँ सबसे पहले प्रभावित होती हैं। परिणामस्वरूप रोजगार सिकुड़ता है और प्रवासी श्रमिकों की आय घटती है।
केरल से लेकर उत्तर भारत तक एलपीजी आपूर्ति और कीमतों को लेकर चिंताओं की खबरें सामने आईं। कुछ स्थानों पर छोटे भोजनालयों के पुनः लकड़ी के चूल्हों की ओर लौटने की रिपोर्टें भी प्रकाशित हुईं। यह दृश्य केवल ईंधन संकट का नहीं, बल्कि उस विकास मॉडल का भी प्रतीक है जिसमें आधुनिकता का ढाँचा बहुत जल्दी खड़ा हो जाता है, लेकिन उसका सामाजिक आधार बेहद कमजोर रहता है। एक अंतरराष्ट्रीय झटका आते ही लाखों लोग दशकों पीछे धकेले जाने लगते हैं।
मध्याह्न भोजन (मिड-डे मील) जैसी योजनाओं पर भी दबाव की आशंकाएँ सामने आईं। उत्तर प्रदेश में प्रशासन को जिलों से एलपीजी आवश्यकता का अलग से आकलन करना पड़ा। सरकार ने व्यापक व्यवधान से इनकार किया, जो उसका अधिकार है लेकिन यह तथ्य भी महत्वपूर्ण है कि ऐसी आशंकाएँ पैदा हुईं और उन्हें लेकर प्रशासनिक स्तर पर सक्रियता दिखानी पड़ी। इससे स्पष्ट होता है कि ऊर्जा संकट का प्रभाव केवल बाजार तक सीमित नहीं रहता, बल्कि वह कल्याणकारी योजनाओं की स्थिरता को भी प्रभावित कर सकता है।
इस पूरे परिदृश्य की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि युद्ध का नैतिक और आर्थिक बोझ हमेशा असमान रूप से वितरित होता है। अंतरराष्ट्रीय संघर्षों के निर्णय सत्ता प्रतिष्ठान लेते हैं, लेकिन उनकी कीमत गाँवों के किसान, शहरों के दिहाड़ी मजदूर और राशन के सहारे जीवन चलाने वाले परिवार चुकाते हैं। यही कारण है कि युद्ध की चर्चा केवल सैन्य मानचित्रों और कूटनीतिक बयानों तक सीमित नहीं रह सकती।
भारत जैसे देश में, जहाँ अभी भी बड़ी आबादी आय, रोजगार और खाद्य सुरक्षा की अनिश्चितताओं से जूझ रही है, पश्चिम एशिया का कोई भी संकट केवल विदेश नीति का विषय नहीं होता। वह ग्रामीण अर्थव्यवस्था, कृषि लागत, श्रम बाजार, सार्वजनिक वितरण प्रणाली और सामाजिक सुरक्षा योजनाओं तक फैल जाता है।
दुर्भाग्य यह है कि राष्ट्रीय विमर्श में इन प्रश्नों के लिए बहुत कम स्थान बचा है। टेलीविजन पर मिसाइलों की मारक क्षमता दिखाई जाती है, लेकिन यह नहीं बताया जाता कि किसी गाँव का किसान बढ़ती लागत के कारण फसल चक्र बदलने को मजबूर हो रहा है। युद्ध के भू-राजनीतिक विश्लेषण होते हैं, लेकिन उस प्रवासी मजदूर की कहानी गायब रहती है जो रोजगार घटने पर वापस अपने गाँव लौट रहा है।
यही कारण है कि पी. साईनाथ जैसे पत्रकारों की टिप्पणियाँ महत्वपूर्ण हो जाती हैं। वे हमें याद दिलाती हैं कि किसी भी अंतरराष्ट्रीय संकट का अंतिम अर्थ स्टॉक मार्केट के उतार-चढ़ाव में नहीं, बल्कि उन लोगों के जीवन में खोजा जाना चाहिए जो पहले से ही आर्थिक असुरक्षा की रेखा पर खड़े हैं।
ईरान संकट पर भारत में असली प्रश्न यह नहीं है कि तेल का बैरल कितने डॉलर तक जाएगा। असली प्रश्न यह है कि उसकी कीमत अंततः कौन चुकाएगा। और इतिहास बार-बार बताता है कि इसका उत्तर वही होता हैकृकिसान, मजदूर और गरीब नागरिक। युद्ध की सबसे लंबी क्रूर छाया हमेशा सीमाओं पर नहीं, समाज के सबसे कमजोर लोगों पर पड़ती है। यही वह सत्य है जिसे हमारी राजनीति और मीडिया अक्सर सबसे अंत में देखती है, जबकि युद्ध में इनकी कोई प्रत्यक्ष भूमिका नहीं होती है।
