किसी भी समावेशी समाज या सशक्त राष्ट्र के निर्माण के लिए प्रशिक्षित व प्रबुद्ध युवाओं का नेतृत्व बेहद जरूरी

किसी भी समावेशी समाज या सशक्त राष्ट्र के निर्माण के लिए प्रशिक्षित व प्रबुद्ध युवाओं का नेतृत्व बेहद जरूरी

किसी भी राष्ट्र का भविष्य उसके युवाओं के हाथों में होता है। युवाओं की ऊर्जा, रचनात्मकता और परिवर्तन की आकांक्षा समाज को नई दिशा देने की क्षमता रखती है। युवाओं को सही अवसर, उचित मार्गदर्शन और नेतृत्व का मंच मिला है, तब सामाजिक परिवर्तन, वैज्ञानिक नवाचार और राष्ट्र निर्माण में उल्लेखनीय योगदान स्वाभाविक रूप से प्रस्तुत होता है। इसलिए यदि हम एक सशक्त, समावेशी और उत्तरदायी समाज व प्रभावशाली राष्ट्र का निर्माण करना चाहते हैं, तो युवाओं के लिए नेतृत्व का मार्ग तैयार करना हमारी सर्वाेच्च प्राथमिकता होनी ही चाहिए।

नेतृत्व केवल किसी पद, अधिकार या प्रतिष्ठा का नाम नहीं है। वास्तविक नेतृत्व का अर्थ है-दूसरों की सेवा करना, समस्याओं का समाधान खोजना, लोगों को साथ लेकर चलना और समाज के व्यापक हित में कार्य करना। आज जब विश्व गरीबी, बेरोज़गारी, पर्यावरण संकट, सामाजिक ध्रुवीकरण, हिंसा और डिजिटल माध्यमों से फैल रही भ्रामक सूचनाओं जैसी अनेक चुनौतियों से जूझ रहा है, तब युवा केवल भविष्य के नागरिक नहीं हैं, बल्कि वर्तमान के सक्रिय परिवर्तनकर्ता भी हैं।

इस्लाम भी नेतृत्व को विशेषाधिकार नहीं, बल्कि ’’अमानत (उत्तरदायित्व)’’ मानता है। इस मामले बरेलवि फिरके के प्रभावशाली इस्लामिक विद्वान मुफ्ती तुफैल खान कादिरी साहब कहते हैं कि ‘‘कुरआन कहता है-निस्संदेह, अल्लाह तुम्हें आदेश देता है कि अमानतें उनके हकदारों को सौंपो और जब लोगों के बीच निर्णय करो तो न्यायपूर्वक करो।’’ (सूरह अन-निसा, 4ः58)

यह आयत स्पष्ट करती है कि नेतृत्व का आधार शक्ति नहीं, बल्कि ईमानदारी, न्याय और उत्तरदायित्व है। तुफैल फरमाते हैं, ‘‘इसी प्रकार पैगंबर मुहम्मद ﷺ ने फरमाया-तुममें से प्रत्येक एक संरक्षक है और प्रत्येक अपने अधीन लोगों के प्रति उत्तरदायी है।’’ (सहीह अल-बुखारी, 7138; सहीह मुस्लिम, 1829)

मौलाना बताते हैं, ‘‘इस हदीस का संदेश अत्यंत व्यापक है। नेतृत्व केवल शासकों तक सीमित नहीं है। माता-पिता, शिक्षक, सामाजिक कार्यकर्ता, स्वयंसेवक और युवाकृसभी अपने-अपने क्षेत्र में नेतृत्व की भूमिका निभाते हैं। इसलिए नेतृत्व की शुरुआत समाज के प्रति उत्तरदायित्व की भावना से होती है।’’

इस्लामी इतिहास इस बात का प्रमाण है कि युवाओं की क्षमता पर विश्वास किया गया। पैगंबर मुहम्मद ﷺ ने आयु के बजाय योग्यता और चरित्र को महत्व दिया। कम आयु में ही उसामा इब्न ज़ैद को एक महत्वपूर्ण सैन्य अभियान का नेतृत्व सौंपा गया, जबकि उनके अधीन अनेक वरिष्ठ सहाबी थे। इसी प्रकार अली इब्न अबी तालिब ने किशोरावस्था में इस्लाम स्वीकार किया और अपने साहस, ज्ञान तथा निष्ठा से मुस्लिम समाज के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। ये उदाहरण बताते हैं कि यदि युवाओं पर विश्वास किया जाए और उन्हें अवसर मिले, तो वे समाज के मजबूत स्तंभ बन सकते हैं।

आज आवश्यकता इस बात की है कि युवाओं को केवल शिक्षा ही नहीं, बल्कि नेतृत्व के व्यावहारिक अवसर भी दिए जाएँ। परिवार, विद्यालय, विश्वविद्यालय, सामाजिक संस्थाएँ और धार्मिक संगठन-सभी मिलकर ऐसा वातावरण तैयार करें, जहाँ युवा निर्णय लेना सीखें, समाज की समस्याओं को समझें और उनके समाधान में सक्रिय भूमिका निभाएँ।

सामुदायिक सेवा नेतृत्व का सबसे प्रभावी विद्यालय है। शिक्षा अभियान, स्वास्थ्य जागरूकता, पर्यावरण संरक्षण, आपदा राहत, रक्तदान, डिजिटल साक्षरता और सामाजिक समरसता जैसे कार्य युवाओं में सेवा-भाव के साथ नेतृत्व क्षमता भी विकसित करते हैं। ऐसी गतिविधियाँ उन्हें केवल समाज की समस्याओं से परिचित नहीं करातीं, बल्कि समाधान का हिस्सा भी बनाती हैं।

नेतृत्व का दूसरा आधार है-ज्ञान। बिना ज्ञान के नेतृत्व दिशा नहीं दे सकता। इस्लाम ज्ञान को अत्यंत महत्त्व देता है। पैगंबर मुहम्मद ﷺ ने कहा-‘‘ज्ञान प्राप्त करना प्रत्येक मुसलमान पर अनिवार्य है।’’ (सुनन इब्न माजाह, 224)

आज विज्ञान, प्रौद्योगिकी, प्रशासन, संचार, उद्यमिता और सामाजिक विज्ञान जैसे क्षेत्रों में दक्ष युवा ही भविष्य की जटिल समस्याओं का समाधान प्रस्तुत कर सकते हैं। इसलिए शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार प्राप्त करना नहीं, बल्कि जिम्मेदार नागरिक और सक्षम नेता तैयार करना भी होना चाहिए।

आज के समय में नेतृत्व को प्रायः प्रसिद्धि, सत्ता और प्रभाव से जोड़ा जाता है, जबकि इस्लाम ’’सेवा-आधारित नेतृत्व (Servant Leadership)’’ की अवधारणा प्रस्तुत करता है। पैगंबर मुहम्मद ﷺ का सम्पूर्ण जीवन इसका सर्वाेत्तम उदाहरण है। उन्होंने निर्धनों की सहायता की, सामाजिक विवादों को सुलझाया, कमजोरों का संरक्षण किया और समाज में भाईचारे की भावना को मजबूत किया। उनके जीवन से यह शिक्षा मिलती है कि सच्चा नेता वही है जो स्वयं से पहले समाज के हित को रखे।

युवा इस आदर्श को अपनाकर अनेक क्षेत्रों में परिवर्तन ला सकते हैं। वे वंचित बच्चों की शिक्षा में सहयोग कर सकते हैं, पर्यावरण संरक्षण अभियान चला सकते हैं, नशामुक्ति और स्वास्थ्य जागरूकता कार्यक्रम आयोजित कर सकते हैं, अंतरधार्मिक संवाद और सामाजिक सद्भाव को बढ़ावा दे सकते हैं तथा डिजिटल माध्यमों का उपयोग सकारात्मक संदेशों के प्रसार के लिए कर सकते हैं। छोटे-छोटे प्रयास भी समाज में बड़े परिवर्तन की आधारशिला बन सकते हैं।

आज सोशल मीडिया ने युवाओं को अभूतपूर्व अभिव्यक्ति का मंच दिया है। किंतु इसके साथ गलत सूचना, घृणा और सामाजिक ध्रुवीकरण जैसी चुनौतियाँ भी बढ़ी हैं। ऐसे समय में युवाओं का दायित्व है कि वे डिजिटल माध्यमों का उपयोग सत्य, सद्भाव और रचनात्मक संवाद के लिए करें। कुरआन भी यही प्रेरणा देता हैकृ

‘‘तुममें एक ऐसा समूह होना चाहिए जो भलाई की ओर बुलाए, अच्छे कार्यों का आदेश दे और बुराइयों से रोके।’’ (सूरह आल-इमरान, 3ः104)

यह शिक्षा बताती है कि नेतृत्व का उद्देश्य केवल व्यक्तिगत सफलता नहीं, बल्कि समाज में नैतिकता और सकारात्मक परिवर्तन को बढ़ावा देना है।

हालाँकि, नेतृत्व केवल कौशल से नहीं बनता; उसका वास्तविक आधार चरित्र होता है। ईमानदारी, विनम्रता, धैर्य, न्यायप्रियता और उत्तरदायित्व ऐसे गुण हैं जो किसी भी नेता को विश्वसनीय बनाते हैं। पैगंबर मुहम्मद ﷺ को पैगंबर बनने से पहले ही ’’अल-अमीन’’ अर्थात ‘विश्वसनीय’ के रूप में जाना जाता था। यही नैतिक विश्वसनीयता उनके नेतृत्व की सबसे बड़ी शक्ति थी। आज के युवाओं के लिए भी यह सबसे बड़ी सीख है कि व्यक्तित्व की मजबूती ही नेतृत्व की वास्तविक पहचान है।

मुफ्ती साहब अंत में एक बात और बताते हैं, ‘‘किसी भी समाज का भविष्य उसके युवा नेतृत्व की गुणवत्ता पर निर्भर करता है। यदि युवाओं को सही शिक्षा, उचित अवसर, नैतिक मार्गदर्शन और समाज की सेवा का वातावरण मिले, तो वे केवल सफल पेशेवर ही नहीं, बल्कि संवेदनशील, उत्तरदायी और दूरदर्शी नागरिक भी बनेंगे। इस्लाम ज्ञान, सेवा, न्याय, उत्तरदायित्व और श्रेष्ठ चरित्र पर आधारित नेतृत्व का जो आदर्श प्रस्तुत करता है, वह आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना चौदह सौ वर्ष पहले था। आज आवश्यकता इस बात की है कि हम युवाओं को केवल भविष्य का नेतृत्व सौंपने की बात न करें, बल्कि वर्तमान में ही उन्हें नेतृत्व के अवसर दें, उन पर विश्वास करें और उनके भीतर समाज-सेवा की भावना विकसित करें। क्योंकि जब युवा सही दिशा में आगे बढ़ते हैं, तभी समाज स्थायी शांति, प्रगति और नैतिक विकास की ओर अग्रसर होता है।

नोट : यह आलेख बरेलिवी फिरके के इस्लामिक विद्वान मुफ्ती तुफैल खान कादिरी साहब के साथ बातचीत पर आधारित तैयार किया गया है।

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