असहमति पर बार काउंसिल का डंडा : भारत के लोकतांत्रिक ढ़ंचे पर प्रहार तो नहीं?

असहमति पर बार काउंसिल का डंडा : भारत के लोकतांत्रिक ढ़ंचे पर प्रहार तो नहीं?

लोकतंत्र की ताकत इस बात में नहीं कि उसके नागरिक सत्ता और संवैधानिक संस्थाओं से कितनी सहमति रखते हैं, लोकतंत्र की असली ताकत, असहमति व्यक्त करने बाद भी शासन तटस्थ रहे।  NALSAR विश्वविद्यालय के छात्रों और बार काउंसिल ऑफ इंडिया के बीच पैदा हुआ विवाद इसी बुनियादी कसौटी पर लोकतंत्र को परख रहा है।

मामला इतना-सा था कि  NALSAR के कुछ छात्रों ने विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में भारत के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत को आमंत्रित किए जाने का विरोध किया। इसके जवाब में BCI अध्यक्ष मनन कुमार मिश्रा ने 13 अगस्त को राज्य बार काउंसिलों को निर्देश दिया कि  NALSAR के 2026 बैच के किसी भी विधि स्नातक का अधिवक्ता के रूप में नामांकन अगले आदेश तक न किया जाए। साथ ही विरोध अभियान में शामिल छात्रों की पहचान संबंधी रिपोर्ट भी मांगी गई।

सवाल है-BCI को यह अधिकार किस कानून ने दिया?

Bar Council of India Advocates Act, 1961  के तहत बनी वैधानिक संस्था है। उसका दायित्व विधि-शिक्षा और अधिवक्ता पेशे के मानक तय करना तथा पेशेवर आचरण को विनियमित करना है। अधिनियम की धाराएं 24 से 26 अधिवक्ता के रूप में प्रवेश और नामांकन की प्रक्रिया से संबंधित हैं, जबकि अनुशासनात्मक प्रावधान पेशेवर Misconduct  से जुड़े हैं।

लेकिन NALSAR के छात्र उस समय अधिवक्ता थे ही नहीं। वे विधि के विद्यार्थी थे। किसी दीक्षांत समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में CJI को बुलाए जाने का विरोध करना-जब तक उसमें कोई अपराध, धमकी या हिंसा शामिल न हो, किस प्रावधान के तहत ऐसा उपेबवदकनबज बन जाता है, जिसके आधार पर किसी छात्र का पेशेवर भविष्य रोक दिया जाए?

यही वह प्रश्न है जिसका उत्तर BCI को देना चाहिए और उससे भी गंभीर बात यह है कि पूरे बैच को एक साथ दंडित करने की कोशिश क्यों हुई? यदि कुछ छात्रों ने अभियान चलाया था तो उन्हीं के आचरण की जांच हो सकती थी। उन छात्रों का भी पक्ष सुना जा सकता था लेकिन जिन्होंने विरोध में भाग ही नहीं लिया, उन्हें भी पेशेवर भविष्य के संकट में डाल देना न्याय के किस सिद्धांत के अनुरूप है?

सौभाग्य से BCI को जल्द ही अपनी गलती का एहसास हुआ और उसने अपना आदेश वापस ले लिया। उसने माना कि अधिकांश छात्र निर्दाेष हैं और 2026 बैच के नामांकन का रास्ता खोल दिया लेकिन तब तक एक बड़ा संवैधानिक सवाल खड़ा हो चुका था।

क्या किसी छात्र की वैचारिक असहमति को उसके पेशेवर भविष्य से जोड़ा जा सकता है? इस प्रश्न का उत्तर शायद स्वयं CJI सूर्यकांत ने दे दिया। 14 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान उन्होंने BCI की कार्रवाई पर तीखी आपत्ति जताई और कहा कि छात्रों को शांतिपूर्ण विरोध का अधिकार है। उन्होंने यह भी पूछा कि BCI को इस मामले में हस्तक्षेप करने की जरूरत ही क्या थी-यह मामला उनके और छात्रों के बीच था।

विडंबना देखिए। जिस संवैधानिक पद की गरिमा बचाने के नाम पर BCI ने छात्रों के खिलाफ कार्रवाई की, उसी पद के धारक ने छात्रों के अधिकार की रक्षा की। CJI का पद निस्संदेह अत्यंत गरिमामय है लेकिन संवैधानिक पद की गरिमा का अर्थ यह नहीं कि उस पद पर बैठे व्यक्ति की आलोचना या असहमति पर रोक लगा दी जाए। लोकतंत्र में संस्था का सम्मान और व्यक्ति से असहमति एक साथ संभव हैं।

यहां BCI अध्यक्ष की राजनीतिक भूमिका भी सवालों को संवेदनशील बनाती है। मनन कुमार मिश्रा BCI के अध्यक्ष होने के साथ-साथ भाजपा के राज्यसभा सांसद भी हैं। इसलिए उनकी ऐसी कार्रवाई, जिसमें छात्रों की अभिव्यक्ति और राजनीतिक असहमति का प्रश्न जुड़ा हो, संस्थागत निष्पक्षता पर सवाल जरूर खड़े करती है। हालांकि केवल राजनीतिक संबद्धता के आधार पर यह निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा कि कार्रवाई किसी पार्टी के निर्देश पर हुई। उसके लिए ठोस प्रमाण चाहिए।

याद रहे लोकतंत्र में संदेह से बचना भी संस्थागत जिम्मेदारी का हिस्सा है। BCI को यह समझना होगा कि उसका काम वकीलों के पेशे को नियंत्रित करना है, छात्रों की वैचारिक निष्ठा जांचना नहीं। विधि विश्वविद्यालयों में पढ़ने वाले युवाओं को संविधान, मौलिक अधिकार और असहमति का महत्व सिखाया जाता है। यदि वही छात्र किसी संवैधानिक पदाधिकारी से असहमति जताने पर अपने भविष्य के पेशेवर अधिकार को खतरे में पाएंगे, तो कानून की शिक्षा का नैतिक आधार ही कमजोर होगा।

इस प्रकरण ने इसलिए एक व्यक्ति या एक संस्था से बड़ा सवाल खड़ा किया है-क्या भारत में असहमति की कीमत किसी युवा के पेशेवर भविष्य से वसूली जा सकती है? यदि उत्तर ‘नहीं’ है, तो BCI की वापसी पर्याप्त नहीं। उसे यह भी स्पष्ट करना चाहिए कि ऐसा आदेश जारी करने का वैधानिक आधार क्या था और भविष्य में ऐसी स्थिति दोबारा न आए, इसके लिए संस्थागत मर्यादा की सीमा क्या होगी। कानून का शासन तभी सार्थक है जब कानून लागू करने वाली संस्था भी कानून की चौखट के भीतर रहे। क्योंकि लोकतंत्र में सम्मान आदेश से नहीं, स्वतंत्रता से पैदा होता है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Translate »