जिस गीतकार ने हिंदी सिनेमा को कई अमर गीत दिए, उसका नाम आज कितने लोग जानते हैं?
गौतम चौधरी
हिंदी सिनेमा के स्वर्णिम दौर के गीतों की चर्चा होते ही कुछ नाम सहज रूप से हमारी स्मृति में उभरते हैं। शैलेंद्र, साहिर लुधियानवी, मजरूह सुल्तानपुरी, हसरत जयपुरी, आनंद बख्शी और गुलजार जैसे गीतकारों ने भारतीय जनमानस पर अपनी ऐसी छाप छोड़ी कि उनके नाम गीतों के साथ ही याद आते हैं।
इस चमकदार स्मृति के बीच एक नाम ऐसा भी है जिसके लिखे गीत आज भी गुनगुनाए जाते हैं, मगर गीतकार का नाम बहुत कम लोगों को याद है—शम्सुल हुदा बिहारी, जिन्हें फिल्म जगत में एस. एच. बिहारी के नाम से जाना गया। यह विडंबना ही है कि जिन पंक्तियों ने प्रेम, विरह, सौंदर्य और रोमांस को हिंदी सिनेमा की लोकप्रिय भाषा दी, उनके रचनाकार का नाम धीरे-धीरे हमारी सांस्कृतिक स्मृति से धुंधला होता चला गया।
“ये चाँद सा रोशन चेहरा, ज़ुल्फ़ों का रंग सुनहरा…”
“इशारों इशारों में दिल लेने वाले…”
“दीवाना हुआ बादल…”
“बहुत शुक्रिया बड़ी मेहरबानी…”
“कजरा मोहब्बत वाला, अँखियों में ऐसा डाला…”
इन गीतों को सुनते ही एक पूरा दौर आंखों के सामने जीवित हो उठता है। मगर क्या हम जानते हैं कि इन गीतों के पीछे किस शायर की कलम थी?
वह नाम था—एस. एच. बिहारी।
बिहार से मुंबई तक का सफर
एस. एच. बिहारी का जीवन बिहार और झारखंड की सांस्कृतिक धरती से गहरे जुड़ा हुआ था। उनका जन्म बिहार के आरा में हुआ था और मधुपुर से भी उनका पारिवारिक और भावनात्मक रिश्ता रहा। मधुपुर उस समय केवल एक रेलवे स्टेशन या स्वास्थ्य-स्थल नहीं था। वह बंगाल, बिहार और झारखंड की मिली-जुली सांस्कृतिक दुनिया का एक महत्वपूर्ण पड़ाव था।
इसी सांस्कृतिक वातावरण ने शायद उनकी संवेदना को वह विस्तार दिया जिसमें उर्दू की नजाकत, हिंदी की सहजता और बंगाल-बिहार की लोक-संस्कृति एक-दूसरे में घुलती दिखाई देती है। 1947 के बाद वे मुंबई पहुंचे। फिल्मी दुनिया में उस समय जगह बनाना आसान नहीं था। संघर्ष के दौर से गुजरते हुए उन्होंने छोटे-मोटे काम भी किए। मगर उनके पास एक ऐसी पूंजी थी जिसे कोई आर्थिक संकट छीन नहीं सकता था—शायरी। उनकी भाषा में बनावटी कठिनाई नहीं थी। वे प्रेम को भारी-भरकम शब्दों में नहीं कहते थे। उनकी कविता का जादू उसकी सहजता में था।
गीत जो कहानी कहने लगे
1950 और 1960 के दशक में हिंदी फिल्म संगीत अपने उत्कर्ष पर था। संगीतकार धुन बना रहे थे, गायक अपनी आवाज से उसे जीवन दे रहे थे और गीतकार उन धुनों में भावनाओं की आत्मा भर रहे थे। एस. एच. बिहारी ने इस दौर में अपनी विशिष्ट जगह बनाई। फिल्म ‘शर्त’ का गीत “न ये चाँद होगा, न तारे रहेंगे…” उनके शुरुआती यादगार गीतों में शामिल है। बाद के वर्षों में उन्होंने अनेक फिल्मों के लिए गीत लिखे। मगर उन्हें असाधारण लोकप्रियता मिली ओ. पी. नैयर के साथ उनके रचनात्मक सहयोग से। ओ. पी. नैयर की संगीत शैली में पंजाब की मस्ती, पश्चिमी वाद्यों की चमक, घोड़ों की टाप जैसी लय और भारतीय लोकधुनों की सहजता थी। एस. एच. बिहारी के शब्द इस संगीत पर कुछ इस तरह बैठते थे जैसे शब्द और धुन एक-दूसरे के लिए ही पैदा हुए हों।
‘कश्मीर की कली’ इसका सबसे खूबसूरत उदाहरण है।
“ये चाँद सा रोशन चेहरा…”
“इशारों इशारों में दिल लेने वाले…”
“दीवाना हुआ बादल…”
“बहुत शुक्रिया बड़ी मेहरबानी…”
इन गीतों में प्रेम है, छेड़छाड़ है, सौंदर्य है, रोमांस है और सबसे बढ़कर एक ऐसी सहजता है जो आज भी श्रोता को अपनी ओर खींचती है।
उनकी खासियत क्या थी?
एस. एच. बिहारी की सबसे बड़ी विशेषता शायद यह थी कि वे मुश्किल भाव को आसान शब्दों में कहने की कला जानते थे। फिल्मी गीत के लिए यह बहुत महत्वपूर्ण गुण है। साहित्यिक कविता और फिल्मी गीत में अंतर होता है। कविता पाठक से एकाग्रता मांग सकती है, मगर फिल्मी गीत को पहली बार सुनने वाला व्यक्ति भी उससे जुड़ सके—यह उसकी सफलता है। एस. एच. बिहारी ने यही किया।
उनके गीतों में उर्दू शायरी की मिठास थी, मगर वे इतने कठिन नहीं थे कि सामान्य श्रोता उनसे दूर हो जाए। उनकी पंक्तियां प्रेम की उस सार्वभौमिक भाषा में थीं जिसे समझने के लिए किसी शब्दकोश की जरूरत नहीं पड़ती। इसीलिए उनके गीत रेडियो से निकलकर घरों तक पहुंचे और घरों से निकलकर लोगों की निजी स्मृतियों का हिस्सा बन गए।
‘कश्मीर की कली’ से ‘किस्मत’ तक
एस. एच. बिहारी के रचनात्मक संसार को केवल रोमांटिक गीतों तक सीमित करना भी उनके साथ न्याय नहीं होगा। ‘किस्मत’ का “कजरा मोहब्बत वाला, अँखियों में ऐसा डाला…” आज भी हिंदी फिल्म संगीत के सबसे लोकप्रिय गीतों में गिना जाता है। यह गीत केवल शब्दों की खूबसूरती के कारण लोकप्रिय नहीं हुआ। इसमें भाषा का खेल, संवाद जैसी लय और लोक-स्वर की सहजता थी। यही एस. एच. बिहारी की ताकत थी—वे शायरी को लोकप्रिय संस्कृति में बदलना जानते थे। उनके गीतों में मुहब्बत महज दार्शनिक अवधारणा नहीं थी। वह आंखों की शरारत थी, मौसम की आहट थी, चांद की रोशनी थी, किसी के इंतजार की बेचैनी थी।
ओ. पी. नैयर और एस. एच. बिहारी
हिंदी फिल्म संगीत में कुछ जोड़ियां ऐसी रही हैं जिनका मूल्यांकन अलग-अलग करके नहीं किया जा सकता। एस. डी. बर्मन और मजरूह, शंकर-जयकिशन और शैलेंद्र-हसरत, आर. डी. बर्मन और गुलजार की तरह ओ. पी. नैयर और एस. एच. बिहारी की जोड़ी ने भी एक खास संगीत संसार बनाया। ओ. पी. नैयर ने उनकी प्रतिभा को पहचाना और उनके शब्दों को अपनी धुनों में वह जगह दी जहां वे पूरी तरह खिल सके। नैयर ने उन्हें ‘शायर-ए-आज़म’ तक कहा था। यह संबोधन अपने आप में उनके प्रति संगीतकार के सम्मान को बताता है। एस. एच. बिहारी की सफलता इस बात में भी थी कि वे धुन के गुलाम नहीं बने। वे धुन की प्रकृति समझते थे और उसके भीतर शब्दों के लिए जगह बनाते थे।
फिर ऐसा क्या हुआ कि नाम गायब हो गया?
यही सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न है। किसी कलाकार की लोकप्रियता और उसकी स्मृति हमेशा समानांतर नहीं चलती। एस. एच. बिहारी के गीत लोकप्रिय रहे, मगर उनका नाम उतनी मजबूती से स्थापित नहीं हुआ जितना उनके समकालीन कुछ अन्य गीतकारों का हुआ।
इसके पीछे हिंदी सिनेमा की अपनी स्मृति-व्यवस्था भी जिम्मेदार है। फिल्म संगीत का इतिहास अक्सर कुछ बड़े नामों के आसपास लिख दिया जाता है। सैकड़ों रचनाकार, संगीतकार, गायक और तकनीशियन उस इतिहास के हाशिए पर चले जाते हैं जिनके योगदान के बिना वह स्वर्णिम दौर संभव नहीं था।
एस. एच. बिहारी भी उन्हीं नामों में एक हैं। विडंबना देखिए—आज अगर कोई “ये चाँद सा रोशन चेहरा” सुनता है तो उसे शम्मी कपूर, शर्मिला टैगोर और ओ. पी. नैयर याद आते हैं। गीतकार का नाम बहुत कम लोग याद करते हैं। यही सांस्कृतिक विस्मृति है।
जावेद अख्तर का संदर्भ
एस. एच. बिहारी की रचनात्मक प्रतिभा का महत्व इस बात से भी समझा जा सकता है कि बाद की पीढ़ी के प्रमुख गीतकार जावेद अख्तर ने उन्हें अपने लिए एक महत्वपूर्ण प्रेरणा माना। यह बात महत्वपूर्ण है क्योंकि किसी कलाकार का वास्तविक प्रभाव केवल उसकी लोकप्रियता से नहीं मापा जाता। यह भी देखा जाना चाहिए कि बाद की पीढ़ी के रचनाकार उसे किस नजर से देखती है। एस. एच. बिहारी के मामले में यह स्वीकारोक्ति बताती है कि उनका महत्व केवल पुराने लोकप्रिय गीतों के संग्रह तक सीमित नहीं था। वे एक ऐसी गीत-परंपरा का हिस्सा थे जिसमें शायरी और लोकप्रिय संगीत के बीच कोई दीवार नहीं थी।
मधुपुर की हवेली और एक भूली हुई विरासत
एस. एच. बिहारी का मधुपुर से संबंध इस कहानी को झारखंड के लिए और भी महत्वपूर्ण बना देता है। मधुपुर की सांस्कृतिक स्मृति में बंगाल, बिहार और झारखंड की अनेक धाराएं मिलती रही हैं। साहित्यकार, कलाकार, संगीतकार और फिल्म जगत से जुड़े लोग इस इलाके से जुड़े रहे हैं। ऐसे में एस. एच. बिहारी की विरासत को केवल मुंबई के फिल्म इतिहास का हिस्सा मानना अधूरा दृष्टिकोण होगा। यह झारखंड की सांस्कृतिक विरासत का भी हिस्सा है।
सवाल यह है कि क्या मधुपुर में उनके नाम पर कोई स्थायी सांस्कृतिक स्मृति है? क्या उनकी हवेली को संरक्षित करने, उनके गीतों का संग्रह बनाने या उनके जीवन पर कोई शोध केंद्र विकसित करने की कोशिश हुई है? अगर नहीं हुई है तो यह केवल एक व्यक्ति की उपेक्षा नहीं है। यह हमारी सांस्कृतिक स्मृति की कमजोरी है।
गीतकार को याद करना क्यों जरूरी है?
आज जब हिंदी सिनेमा के पुराने गीतों को नए सिरे से सुना जा रहा है, एस. एच. बिहारी को फिर से पढ़ने और सुनने की जरूरत है। क्योंकि किसी समाज की सांस्कृतिक स्मृति केवल बड़े पुरस्कारों, बड़े सितारों और बड़ी फिल्मों से नहीं बनती। वह उन शब्दों से बनती है जिन्हें लोग अपने जीवन के सबसे निजी क्षणों में याद करते हैं।
किसी ने प्रेम में “ये चाँद सा रोशन चेहरा…” गुनगुनाया होगा।
किसी ने विरह में “न ये चाँद होगा, न तारे रहेंगे…” सुना होगा।
किसी ने दोस्तों के बीच “कजरा मोहब्बत वाला…” पर ठुमके लगाए होंगे।
गीत बदलते रहे, पीढ़ियां बदलती रहीं, संगीत सुनने के माध्यम बदल गए। रेडियो से कैसेट, कैसेट से सीडी और सीडी से मोबाइल स्ट्रीमिंग तक दुनिया पहुंच गई।
मगर शब्द बच गए। यही किसी गीतकार की सबसे बड़ी सफलता है।
स्मृति में लौटने का समय
एस. एच. बिहारी का निधन 25 फरवरी 1987 को हुआ। उन्हें गए हुए लगभग चार दशक हो चुके हैं। इस दौरान हिंदी फिल्म संगीत की कई पीढ़ियां बदल गईं। डिजिटल युग आ गया। संगीत सुनने का तरीका बदल गया। फिर भी उनके गीत आज भी सुने जाते हैं।
ऐसे में शायद सवाल यह नहीं होना चाहिए कि एस. एच. बिहारी कितने लोकप्रिय थे। सवाल यह होना चाहिए कि हम उन्हें कितना याद रखते हैं। किसी कलाकार का वास्तविक सम्मान केवल उसकी रचनाओं को दोबारा सुन लेने में नहीं है। उसकी रचनाओं के पीछे छिपे व्यक्ति को भी पहचानना जरूरी है।
एस. एच. बिहारी इसी पहचान के इंतजार में हैं।
वे हमारे बीच नहीं हैं, मगर उनके शब्द आज भी हैं—
चांद है, सितारे हैं, बादल हैं, आंखें हैं, कजरा है, मोहब्बत है।
बस एक चीज कम है—
गीतकार का नाम।
और शायद अब उस नाम को फिर से हमारी सांस्कृतिक स्मृति में लिखने का समय आ गया है—
शम्सुल हुदा बिहारी।
एस. एच. बिहारी।
