शाह अब्दुल लतीफ़ भिटाई : सरहदों से बड़ी एक आवाज़

शाह अब्दुल लतीफ़ भिटाई : सरहदों से बड़ी एक आवाज़

धर्म की जय हो। #सिंध के महान #सूफी, #शाह_अब्दुल_लतीफ_भिटाई।

कभी-कभी कोई कवि अपने समय से इतना आगे निकल जाता है कि उसकी आवाज सदियों बाद भी हमारे वर्तमान से सवाल करती है। शाह अब्दुल लतीफ़ भिटाई ऐसे ही कवि हैं। अठारहवीं शताब्दी के सिंध में जन्मे भिटाई सिंधी सूफी काव्य की महानतम आवाजों में गिने जाते हैं। उनकी प्रसिद्ध कृति ‘शाह जो रिसालो’ केवल कविताओं का संग्रह नहीं है। उसमें सिंध की लोककथाएं, संगीत, आध्यात्मिक खोज, प्रेम, विरह, मानवीय गरिमा और लोकजीवन एक साथ सांस लेते दिखाई देते हैं।

भिटाई को समझने के लिए उनकी कविता से अधिक उनके पात्रों को समझना उपयोगी है। सस्सी, मारवी, नूरी, सोहणी जैसी लोकनायिकाएं उनके यहां केवल प्रेमकथाओं की पात्र नहीं रह जातीं। वे मनुष्य की आंतरिक यात्रा के प्रतीक बन जाती हैं।

सस्सी अपने प्रिय पुन्हूं की तलाश में रेगिस्तान पार करती है। भिटाई के यहां यह यात्रा केवल प्रेमी की तलाश नहीं रह जाती। वह मनुष्य की उस अनंत खोज का रूप ले लेती है जिसमें वह अंतिम सत्य तक पहुंचना चाहता है। रेगिस्तान केवल बाहर नहीं है, वह मनुष्य के भीतर भी है। प्यास, थकान, अकेलापन और विरह उसी आध्यात्मिक यात्रा के पड़ाव हैं।

यहां एक और बात महत्वपूर्ण है। भिटाई की स्त्री पात्र निष्क्रिय नहीं हैं। वे निर्णय लेती हैं, संघर्ष करती हैं और अपनी राह खुद चुनती हैं। सस्सी इसलिए केवल प्रेमिका नहीं है, वह अपने लक्ष्य की तलाश में निकलने वाली मनुष्य की स्वतंत्र चेतना है।

मारवी की कथा दूसरी तरह का सवाल खड़ा करती है। सत्ता और वैभव के सामने अपनी मिट्टी को चुनने का सवाल। उसे राजमहल मिलता है, ऐश्वर्य मिलता है, मगर वह अपनी जन्मभूमि और अपने लोगों को नहीं भूलती। भिटाई के लिए मारवी केवल सिंध की बेटी नहीं है। वह अपनी जड़ों, आत्मसम्मान और आंतरिक स्वतंत्रता की प्रतीक है।

नूरी की कथा सामाजिक ऊंच-नीच के प्रश्न को सामने लाती है। साधारण पृष्ठभूमि की नूरी अपनी विनम्रता और मानवीयता के कारण महत्वपूर्ण बनती है। भिटाई जैसे यह कह रहे हों कि मनुष्य की असली पहचान उसका जन्म, कुल, पद या वैभव नहीं है। उसकी पहचान उसके भीतर की मनुष्यता है।

यहीं से भिटाई की कविता अपने समय से आगे निकलती है। आज जब समाज जाति, धर्म, भाषा, क्षेत्र और पहचान के अनेक खांचों में बंटता जा रहा है, भिटाई हमें मनुष्य के भीतर लौटने का आग्रह करते हैं। उन्हें आधुनिक लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता या राष्ट्रवाद का प्रवक्ता बना देना इतिहास के साथ न्याय नहीं होगा। वे अठारहवीं शताब्दी के कवि थे और उनकी अपनी धार्मिक-सांस्कृतिक दुनिया थी। फिर भी उनकी कविता में मौजूद मानवीय संवेदना आज के समाज के लिए असाधारण महत्व रखती है।

भिटाई की सबसे बड़ी ताकत यह है कि उन्होंने दर्शन को लोक से अलग नहीं किया। उन्होंने कठिन आध्यात्मिक प्रश्नों को लोककथाओं और लोकभाषा के माध्यम से व्यक्त किया। इसलिए उनकी कविता केवल पढ़ी नहीं जाती, गाई भी जाती है। तंबूरो के साथ उनकी काव्य परंपरा आज भी सिंध की सांस्कृतिक स्मृति का हिस्सा है।

यही वह बिंदु है जहां भिटाई का महत्व सिंध की सीमाओं से आगे बढ़ जाता है। सिंध और कच्छ के बीच सदियों से व्यापार, लोककथा, संगीत, भाषा और मानवीय आवाजाही के संबंध रहे हैं। आधुनिक राजनीतिक सीमाएं इन संबंधों से बहुत बाद में बनीं। सस्सी-पुन्हूं, सोहणी-महिवाल और मारवी जैसी कथाएं किसी एक देश की संपत्ति नहीं हैं। वे उस साझा लोक-संसार की स्मृतियां हैं जिसे राजनीतिक सीमाएं पूरी तरह विभाजित नहीं कर सकीं।

1947 में उपमहाद्वीप का विभाजन हुआ। सिंध पाकिस्तान में चला गया और बड़ी संख्या में सिंधी हिंदू भारत आए। एक भूगोल दो राजनीतिक व्यवस्थाओं में बंट गया। मगर संस्कृति को नक्शे पर खींची गई रेखा से पूरी तरह नहीं बांटा जा सका।

भिटाई की आवाज इसका प्रमाण है। भारत में बसे सिंधी समाज ने अपनी भाषा, साहित्य, लोकस्मृति और सांस्कृतिक परंपराओं को जीवित रखा। पाकिस्तान के सिंध में भी भिटाई उसी सांस्कृतिक चेतना के महत्वपूर्ण प्रतीक बने रहे। इस तरह एक कवि दोनों तरफ की स्मृति में मौजूद रहा।

यही कारण है कि भिटाई को केवल सूफी कवि या केवल सिंधी कवि के रूप में देखना उनके महत्व को छोटा करना होगा। वह उस लोक-संस्कृति के कवि हैं जिसमें धार्मिक पहचान से पहले मनुष्य का दुख, प्रेम, संघर्ष और आत्मसम्मान दिखाई देता है।

आज दुनिया फिर पहचान की राजनीति के दौर से गुजर रही है। धर्म के नाम पर अविश्वास है, राष्ट्र के नाम पर तनाव है और समाज के भीतर अनेक तरह की दीवारें खड़ी हो रही हैं। ऐसे समय में भिटाई की ओर लौटना किसी पुराने कवि को याद करना भर नहीं है। यह अपने सांस्कृतिक अतीत में मौजूद उस आवाज को सुनना है जो मनुष्य को उसकी बाहरी पहचान से आगे जाकर देखने का आग्रह करती है।

सवाल यह नहीं कि भिटाई हिंदू थे या मुसलमान। सवाल यह भी नहीं कि उन्हें आज की किसी राजनीतिक विचारधारा के खांचे में फिट किया जा सकता है या नहीं। सवाल यह है कि उनकी कविता मनुष्य के बारे में क्या कहती है?

सस्सी हमें तलाश का साहस देती है।
मारवी हमें अपनी जड़ों और आत्मसम्मान की याद दिलाती है।
नूरी हमें बताती है कि विनम्रता भी मनुष्य की शक्ति हो सकती है।
और इन सबके पीछे भिटाई का वह संसार है जिसमें प्रेम केवल दो व्यक्तियों के बीच का संबंध नहीं, बल्कि सत्य की ओर जाने वाली यात्रा बन जाता है।

शायद इसी वजह से शाह अब्दुल लतीफ़ भिटाई आज भी प्रासंगिक हैं। राजनीति सरहदें खींच सकती है। राज्य नक्शे बदल सकते हैं। इतिहास नए अध्याय लिख सकता है। मगर लोक की स्मृति इतनी आसानी से नहीं बदलती। वह गीतों में बची रहती है, कथाओं में बची रहती है, भाषा में बची रहती है और कभी-कभी किसी कवि की आवाज में सदियों तक जीवित रहती है।

भिटाई ऐसी ही आवाज हैं। उन्हें पढ़ना सिंध को पढ़ना है। उन्हें समझना उस साझा सांस्कृतिक भूगोल को समझना है जो भारत और पाकिस्तान की राजनीतिक सीमाओं से बहुत पुराना है। सरहदें नक्शे बांट सकती हैं।

लोक-स्मृति को नहीं।

प्रेम की यात्रा को नहीं।

मनुष्य की तलाश को नहीं।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Translate »