मकान गिरेंगे, आदमी मरेंगे, जब तक सही फैसला नहीं होगा, दिल्ली को बचाने की व्यापक योजना जरूरी

मकान गिरेंगे, आदमी मरेंगे, जब तक सही फैसला नहीं होगा, दिल्ली को बचाने की व्यापक योजना जरूरी

किदार नाथ बब्बर@ 9811020270

दिल्ली में रोज मकान गिरेंगे, रोज आदमी मरेंगे, अगर हमने अब भी दिल्ली के बारे में सही फैसला नहीं किया। मुझे लिखते हुए 20–30 साल हो गए। मैंने समय-समय पर दिल्ली और देश के शहरी विकास को लेकर अपने सुझाव दिए हैं। कुछ सुझावों पर ध्यान दिया गया, कुछ पर नहीं दिया गया। मेरा उद्देश्य किसी सरकार या व्यक्ति की आलोचना करना नहीं है। मेरी इच्छा केवल इतनी है कि दिल्ली को एक ऐसी राजधानी बनाया जाए, जहां रहने वाला आदमी सुरक्षित हो, सड़कें खुली हों, बिजली और दूसरी सेवाएं व्यवस्थित हों और विकास आने वाली पीढ़ियों को ध्यान में रखकर किया जाए।

मेरा मानना है कि इसके लिए सबसे पहले री-डेवलपमेंट मंत्री जैसी एक स्पष्ट जिम्मेदारी तय होनी चाहिए। दिल्ली के पुनर्विकास को अलग-अलग विभागों में बांटकर नहीं, बल्कि एक समग्र योजना के तहत आगे बढ़ाया जाना चाहिए।

पुरानी और अनधिकृत दिल्ली का नए सिरे से नियोजन

DDA में बड़ी संख्या में टाउन प्लानर और विशेषज्ञ हैं। उनका इस्तेमाल केवल फाइलों और नक्शों तक सीमित नहीं रहना चाहिए। पुरानी दिल्ली, अनधिकृत कॉलोनियों और लालडोरा क्षेत्रों के लिए व्यापक पुनर्विकास योजना तैयार होनी चाहिए। हर इलाके के लिए स्पष्ट नक्शा बने। जहां संभव हो, गलियों को चौड़ा किया जाए, मुख्य सड़कों का पुनर्गठन किया जाए, पार्क और सार्वजनिक स्थान सुरक्षित किए जाएं तथा भविष्य के यातायात को ध्यान में रखकर सड़क नेटवर्क तैयार किया जाए।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि योजना जनता से छिपी नहीं होनी चाहिए। बड़े नक्शे सार्वजनिक स्थानों पर लगाए जाएं। छोटे नक्शे लोगों को मामूली शुल्क पर उपलब्ध कराए जाएं, ताकि हर नागरिक जान सके कि अगले दस या बीस साल में उसके इलाके का स्वरूप क्या होगा।

लैंड पूलिंग को भी व्यापक स्तर पर लागू करने पर गंभीरता से विचार होना चाहिए। जमीन को छोटे-छोटे विवादों में फंसा रहने देने के बजाय उसे नियोजित विकास से जोड़ा जाए। इससे निजी संपत्ति के अधिकार और सार्वजनिक हित दोनों के बीच संतुलन बनाया जा सकता है। अगर सरकार स्पष्ट नक्शा दे और नियम सरल बनाए तो मेरा विश्वास है कि निर्माण की प्रक्रिया अपने आप तेज हो सकती है।

सड़क के नीचे नहीं, सड़क के साथ व्यवस्थित डक्ट

दिल्ली में बिजली, टेलीफोन, इंटरनेट और दूसरी सेवाओं के तारों का जाल किसी से छिपा नहीं है। हर बार सड़क खोदना, फिर सड़क बनाना और कुछ दिन बाद उसी सड़क को किसी दूसरी एजेंसी द्वारा फिर खोद देना जनता के पैसे की बर्बादी है। मेरा सुझाव है कि सर्विस डक् की ऐसी व्यवस्था हो जिसमें बिजली, संचार और दूसरी उपयोगिता सेवाओं की केबल व्यवस्थित तरीके से रखी जा सकें और खराबी आने पर सड़क तोड़ने की जरूरत न पड़े। जापान सहित अनेक देशों के शहरी ढांचे में उपयोगिता सेवाओं को व्यवस्थित करने के उदाहरण मिलते हैं। भारत को भी अपनी परिस्थितियों के अनुरूप ऐसा मॉडल विकसित करना चाहिए। दिल्ली को हर बार सड़क खोदकर नहीं, पहले से योजना बनाकर विकसित करना होगा।

सत्य निकेतन ने हमें क्या सिखाया?

सत्य निकेतन की हाल की इमारत दुर्घटना ने एक बार फिर यह सवाल सामने ला दिया है कि दिल्ली में पीजी और किराये के मकानों की सुरक्षा की जिम्मेदारी किसकी है। हाल की रिपोर्टों के अनुसार हादसे में कई लोगों की जान गई और भवन की संरचनात्मक सुरक्षा तथा निर्माण संबंधी नियमों पर गंभीर सवाल उठे। इस घटना को केवल एक इमारत की दुर्घटना मानना गलत होगा। दिल्ली में बड़ी संख्या में विद्यार्थी और कामकाजी लोग पीजी में रहते हैं। यदि सरकारी आवास पर्याप्त नहीं है और निजी मकान अनियोजित तरीके से पीजी में बदलते जाते हैं तो एक दिन हादसा होना स्वाभाविक है। इसलिए मेरा सुझाव है कि ऐसे क्षेत्रों का पूर्ण पुनर्विकास और सुरक्षा ऑडिट किया जाए। जहां मौजूदा निर्माण सुरक्षित नहीं है, वहां सरकार को कठोर फैसला लेना चाहिए। गरीबों और विद्यार्थियों के लिए सुरक्षित आवास की वैकल्पिक व्यवस्था किए बिना केवल बुलडोजर चलाना समाधान नहीं है।

ओखला को भी योजना चाहिए

ओखला फेज-1 और फेज-2 जैसे क्षेत्रों में सड़कों, फुटपाथों, पार्कों और सार्वजनिक स्थानों पर अतिक्रमण की शिकायतों की जांच होनी चाहिए। जहां सरकारी जमीन या सार्वजनिक रास्ते अतिक्रमण में हैं, उन्हें मुक्त कराया जाए लेकिन इसके साथ एक बात साफ होनी चाहिए—गरीब को हटाना विकास नहीं है। यदि किसी बस्ती को हटाया जाता है तो उसके निवासियों के पुनर्वास की स्पष्ट योजना पहले तैयार होनी चाहिए। अवैध निर्माण और गरीब व्यक्ति को एक ही चीज मान लेना गलत होगा। असली लक्ष्य होना चाहिए—अनधिकृत निर्माण खत्म हो, मगर इंसान सड़क पर न आए।

सरकारी जमीन का बेहतर इस्तेमाल

दिल्ली में सरकारी जमीन अत्यंत मूल्यवान है। यदि किसी सरकारी भूखंड पर अतिक्रमण है या उसका इस्तेमाल नियोजित तरीके से नहीं हो रहा है तो उसे खाली कराकर केवल खाली छोड़ देना भी समाधान नहीं है। ऐसी जमीन पर बहुमंजिला आवासीय और व्यावसायिक परियोजनाएं बनाई जा सकती हैं। इससे जमीन का बेहतर उपयोग होगा, राजस्व आएगा और आसपास रहने वाले लोगों के लिए भी नियोजित आवास तैयार किए जा सकेंगे। कालकाजी, गोविंदपुरी और आसपास के क्षेत्रों में ऐसी संभावनाओं का अध्ययन किया जा सकता है। ऊंची इमारतों के साथ पर्याप्त पार्किंग, सड़क, अग्नि सुरक्षा, स्कूल, स्वास्थ्य केंद्र और सार्वजनिक परिवहन की व्यवस्था भी अनिवार्य होनी चाहिए।

EWS आवास केवल कागज पर नहीं

दिल्ली के पुनर्विकास में सबसे बड़ा सवाल गरीब आदमी का है। अगर बहुमंजिला इमारतें बनती हैं और जमीन की कीमत बढ़ती है तो गरीब धीरे-धीरे शहर से बाहर चला जाएगा। ऐसा विकास दिल्ली को सुंदर तो बना सकता है, लेकिन न्यायपूर्ण नहीं। इसलिए हर बड़े पुनर्विकास प्रोजेक्ट में EWS और निम्न आय वर्ग के लिए निश्चित आवास होना चाहिए। इस आवास का मॉडल स्वामित्व आधारित हो या किराये आधारित, इस पर विशेषज्ञ और सरकार निर्णय लें। मगर यह सुनिश्चित होना चाहिए कि गरीब परिवार पुनर्विकास के बाद उसी शहर में सम्मानपूर्वक रह सके।

मेरी सरकार से अपील

दिल्ली को छोटे-छोटे अभियानों से नहीं, एक मास्टर री-डेवलपमेंट मिशन से बदलने की जरूरत है।

इसके लिए पांच काम तत्काल किए जा सकते हैं—

  1. दिल्ली का व्यापक पुनर्विकास मानचित्र तैयार हो।
  2. सभी अनधिकृत और पुराने क्षेत्रों का वैज्ञानिक सर्वेक्षण हो।
  3. सड़कों, गलियों, पार्कों और उपयोगिता सेवाओं का पुनर्गठन हो।
  4. सरकारी जमीन का अधिकतम सार्वजनिक और आर्थिक उपयोग हो।
  5. गरीबों, किरायेदारों और EWS परिवारों के पुनर्वास को विकास योजना का अनिवार्य हिस्सा बनाया जाए।

दिल्ली को केवल तोड़कर नहीं बनाया जा सकता। दिल्ली को योजना, कानून, तकनीक और मानवीय संवेदना—चारों के साथ बनाना होगा। मेरी सरकार से कोई व्यक्तिगत मांग नहीं है। मैं केवल इतना कहना चाहता हूं कि यदि नियत साफ हो और राजनीतिक इच्छाशक्ति हो तो दिल्ली को दुनिया की सबसे व्यवस्थित राजधानियों में शामिल किया जा सकता है।

आज फैसला नहीं करेंगे तो कल हादसे होंगे। आज योजना नहीं बनाएंगे तो कल बुलडोजर चलेंगे। और अगर आज गरीब के पुनर्वास के बारे में नहीं सोचेंगे तो कल एक समस्या हटाकर दूसरी समस्या पैदा कर देंगे। दिल्ली को बचाना है तो अब सही फैसला करना ही होगा।

आलेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं। इससे जनलेख प्रबंधन का कोई सरोकार नहीं है।

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