2019 और 2024 के आंकड़े बता रहे हैं कि असली संकट संगठन, गठबंधन और सामाजिक आधार के बीच तालमेल का है
गौतम चौधरी की खास रपट
झारखंड की राजनीति को केवल लोकसभा और विधानसभा चुनाव के अलग-अलग परिणामों से समझना पर्याप्त नहीं है। 2019 के लोकसभा चुनाव, 2019 के विधानसभा चुनाव और 2024 के लोकसभा चुनाव के आंकड़ों को एक साथ रखकर देखने पर एक दिलचस्प तस्वीर सामने आती है।
भाजपा का मत आधार पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है। इसके बावजूद सीटों में उल्लेखनीय गिरावट हुई। दूसरी तरफ विपक्षी दलों का संयुक्त मत प्रतिशत और विधानसभा क्षेत्रों में उनका प्रभाव बढ़ा। इससे संकेत मिलता है कि झारखंड में चुनाव केवल लोकप्रिय मतों का खेल नहीं है। गठबंधन, स्थानीय संगठन, उम्मीदवार, क्षेत्रीय अस्मिता और सामाजिक समीकरण सीटों के परिणाम को निर्णायक रूप से प्रभावित करते हैं।
2019 लोकसभा : भाजपा के पक्ष में व्यापक बढ़त
2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को झारखंड में लगभग 76.17 लाख वोट मिले थे। आजसू को लगभग 6.48 लाख वोट मिले। दोनों को जोड़ने पर NDA का मत लगभग 82.66 लाख बैठता है। उस समय भाजपा-आजसू गठबंधन ने राज्य की 14 लोकसभा सीटों में 12 सीटें जीती थीं।
और अधिक महत्वपूर्ण बात यह थी कि लोकसभा परिणाम को विधानसभा क्षेत्रों में तोड़कर देखने पर NDA की बढ़त बहुत व्यापक थी। आपकी गणना के अनुसार भाजपा/NDA लगभग 65 विधानसभा क्षेत्रों में आगे था। यानी लोकसभा चुनाव में भाजपा के पक्ष में केवल कुछ शहरी या चुनिंदा क्षेत्रों में नहीं, बल्कि राज्य के बड़े हिस्से में चुनावी बढ़त मौजूद थी। मगर पांच महीने बाद विधानसभा चुनाव में तस्वीर बदल गई।
विधानसभा चुनाव ने दूसरी कहानी बताई
2019 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को 50,22,374 वोट मिले और वह 25 सीटें जीत सकी। आजसू को 12,19,535 वोट मिले, लेकिन दोनों दल अलग-अलग चुनाव लड़े। भाजपा और आजसू के मतों को जोड़ने पर लगभग 62.42 लाख वोट होते हैं।
वहीं झामुमो, कांग्रेस और राजद ने मिलकर 53,19,472 वोट हासिल किए और 47 सीटें जीतीं। यदि इसमें JVM और CPI(ML) के वोट भी जोड़ दिए जाएं तो कुल संख्या लगभग 63,12,704 हो जाती है। यह आंकड़ा राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है। क्योंकि यहां सवाल केवल यह नहीं है कि किस दल को कितने वोट मिले। सवाल यह है कि वे वोट कितने प्रभावी ढंग से सीटों में बदल पाए। यही वह जगह है जहां 2019 का विधानसभा चुनाव भाजपा के लिए महत्वपूर्ण सबक देता है।
भाजपा और आजसू के अलगाव का प्रभाव
2019 में भाजपा और आजसू अलग-अलग चुनाव लड़े। भाजपा को 25 और आजसू को 2 सीटें मिलीं। यदि दोनों दलों के मतों को एक साथ देखा जाए तो उनका संयुक्त मत लगभग 62.42 लाख था। यह संख्या बताती है कि दोनों के बीच चुनावी तालमेल होता तो कई सीटों पर मुकाबले की तस्वीर अलग हो सकती थी।
हालांकि यह कहना कि केवल दोनों के वोट जोड़ देने से निश्चित रूप से इतनी या उतनी सीटें जीत जातीं, चुनावी गणित को जरूरत से ज्यादा सरल बना देना होगा। उम्मीदवार, स्थानीय समीकरण और वोटों का वास्तविक हस्तांतरण भी महत्वपूर्ण होता है। फिर भी 2019 ने एक बात स्पष्ट कर दी थी—समान या निकट सामाजिक आधार वाले दलों के बीच वोटों का विभाजन सीटों पर बड़ा असर डाल सकता है।
2024 लोकसभा : भाजपा का मत आधार बना रहा, लेकिन सीटें घटीं
2024 में भाजपा को झारखंड में लगभग 76.82 लाख वोट मिले। यानी 2019 के लोकसभा चुनाव की तुलना में भाजपा का कुल मत आधार बहुत नाटकीय ढंग से नहीं बदला। फिर भी भाजपा की लोकसभा सीटें 11 से घटकर 8 रह गईं। आजसू ने एक सीट जीती और NDA को कुल 9 सीटें मिलीं। दूसरी ओर INDIA गठबंधन ने 67,33,099 वोट हासिल किए और पांच सीटें जीतीं।
यहां सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि 2024 में भाजपा के वोट का बड़ा हिस्सा राज्य के गैर-आदिवासी और शहरी-औद्योगिक क्षेत्रों में मजबूत रहा, लेकिन अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित पांचों लोकसभा सीटों पर भाजपा हार गई। यह केवल पांच सीटों की हार नहीं है। यह भाजपा के लिए आदिवासी राजनीतिक आधार के संकट का संकेत भी है।
2024 का विधानसभा क्षेत्रों वाला आंकड़ा और अधिक महत्वपूर्ण है
2024 लोकसभा चुनाव को विधानसभा क्षेत्रों में देखने पर भाजपा 47 विधानसभा क्षेत्रों में आगे रही। NDA के घटक दलों को मिलाकर यह संख्या 52 तक पहुंचती है। INDIA गठबंधन 29 विधानसभा क्षेत्रों में आगे रहा। इसके विपरीत, 2024 विधानसभा चुनाव में NDA केवल 24 सीटों पर सिमट गया, जबकि JMM-कांग्रेस-राजद-CPI(ML) गठबंधन ने 56 सीटें जीत लीं। भाजपा स्वयं 21 सीटों पर रही। यही अंतर इस पूरे विश्लेषण का सबसे बड़ा सवाल है।
लोकसभा में जिस गठबंधन की बढ़त 52 विधानसभा क्षेत्रों तक पहुंचती है, वही विधानसभा चुनाव में केवल 24 सीटों तक क्यों सिमट जाता है?
इस प्रश्न का उत्तर केवल मोदी सरकार या राज्य सरकार के पक्ष-विपक्ष में नहीं खोजा जा सकता। इसके लिए संगठन, उम्मीदवार, स्थानीय नेतृत्व, बूथ प्रबंधन, सामाजिक समीकरण और चुनावी मुद्दों का अलग-अलग अध्ययन करना होगा।
JBKSS का उभार एक नया संकेत
2024 में झारखंड लोकतांत्रिक क्रांतिकारी मोर्चा यानी JBKSS/JLKM का उभार भी इस पूरी तस्वीर में महत्वपूर्ण है। 2024 विधानसभा चुनाव में JLKM को लगभग 6.20 प्रतिशत मत मिले और वह एक सीट जीतने में सफल रहा। इसका अर्थ यह नहीं कि उसका पूरा मत किसी एक राष्ट्रीय गठबंधन का स्वाभाविक मत है। ऐसा निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी।
मगर यह जरूर दिखाई देता है कि झारखंड में क्षेत्रीय और स्थानीय अस्मिता आधारित राजनीति के लिए पर्याप्त राजनीतिक जगह मौजूद है। यही कारण है कि भाजपा सहित सभी दलों के लिए यह समझना जरूरी है कि झारखंड की राजनीति को केवल राष्ट्रीय मुद्दों के आधार पर नहीं समझा जा सकता।
गैर-आदिवासी समाज की राजनीतिक मनःस्थिति
आपकी रिपोर्ट में उठाया गया एक मुद्दा विशेष ध्यान देने योग्य है—झारखंड के कुछ गैर-आदिवासी वर्गों में यह भावना कि राज्य बनने के बाद उनकी राजनीतिक और प्रशासनिक भूमिका अपेक्षाकृत कमजोर हुई है। यह भावना कितनी व्यापक है, इसे केवल राजनीतिक दावे से नहीं बल्कि क्षेत्रवार सर्वेक्षण और चुनावी आंकड़ों से जांचना चाहिए। मगर यदि ऐसी भावना मौजूद है तो इसे नजरअंदाज करना किसी भी राजनीतिक दल के लिए उचित नहीं होगा।
विशेष रूप से उत्तर छोटानागपुर के औद्योगिक और खनिज क्षेत्रों में गैर-आदिवासी समाज, आदिवासी समाज, पिछड़े वर्ग, दलित, अल्पसंख्यक, व्यापारी, कर्मचारी और शहरी मध्यवर्ग के राजनीतिक व्यवहार को अलग-अलग समझने की आवश्यकता है।
किसी समुदाय को दूसरे समुदाय के विरुद्ध खड़ा किए बिना उसकी वास्तविक राजनीतिक शिकायतों को स्वीकार करना अधिक टिकाऊ राजनीतिक रणनीति हो सकती है।
भाजपा के सामने असली चुनौती क्या है?
इन आंकड़ों को जोड़कर देखें तो भाजपा की समस्या केवल वोट की कमी नहीं दिखाई देती। समस्या के कम से कम चार स्तर हैं—
पहला — वोट को सीट में बदलने की क्षमता।
लोकसभा और विधानसभा चुनावों में एक ही मतदाता का राजनीतिक व्यवहार अलग हो सकता है। लोकसभा में राष्ट्रीय नेतृत्व के पक्ष में मतदान करने वाला मतदाता विधानसभा में स्थानीय उम्मीदवार और स्थानीय मुद्दे को प्राथमिकता दे सकता है।
दूसरा — आदिवासी क्षेत्रों में स्वीकार्यता।
2024 लोकसभा में पांचों ST सीटें हारना गंभीर संकेत है।
तीसरा — संगठन और स्थानीय नेतृत्व।
राज्य के जिलों में पार्टी कार्यकर्ताओं और स्थानीय नेतृत्व की बात सीधे प्रदेश नेतृत्व तक पहुंचना जरूरी है। केवल चुनाव के समय केंद्रीय नेतृत्व के दौरे से संगठनात्मक कमजोरी दूर नहीं होती।
चौथा — गठबंधन का प्रभाव।
भाजपा और आजसू के बीच 2019 का अलगाव तथा बाद के गठबंधन अनुभव बताते हैं कि झारखंड में सहयोगी दलों के साथ तालमेल को केवल सीट बंटवारे तक सीमित नहीं रखा जा सकता।
प्रदेश नेतृत्व को जिलों तक जाना होगा
इस संदर्भ में एक व्यावहारिक सुझाव यह हो सकता है कि प्रदेश प्रभारी, प्रदेश चुनाव प्रभारी और सह-प्रभारी नियमित रूप से जिलों का प्रवास करें। मगर उनका कार्यक्रम केवल सार्वजनिक सभाओं तक सीमित नहीं होना चाहिए।
जिला अध्यक्ष और जिला पदाधिकारियों के साथ अलग बैठक हो। मंडल स्तर के कार्यकर्ताओं से सीधे संवाद हो। बूथ स्तर की वास्तविक स्थिति समझी जाए। टिकट, संगठन, स्थानीय नेतृत्व और गठबंधन को लेकर कार्यकर्ताओं की असहमति भी सुनी जाए। किसी भी बड़े राजनीतिक दल के लिए अंदर की असहमति को समय रहते सुन लेना चुनाव के बाद हार का विश्लेषण करने से अधिक उपयोगी होता है।
JVM का विलय : निष्कर्ष या जांच का विषय?
आपकी मूल रिपोर्ट का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष JVM के भाजपा में विलय को लेकर है। 2019 में JVM को विधानसभा चुनाव में लगभग 8.21 लाख वोट और तीन सीटें मिली थीं। बाद में उसका भाजपा में विलय हुआ। इन आंकड़ों के आधार पर यह प्रश्न जरूर उठाया जा सकता है कि JVM के विलय से भाजपा को अपेक्षित चुनावी लाभ क्यों नहीं मिला। मगर इसे सीधे यह निष्कर्ष बना देना कि “JVM का विलय भाजपा के लिए घातक सिद्ध हुआ” अभी प्रमाणित निष्कर्ष नहीं होगा। इसके लिए 2019 में JVM को मिले विधानसभा क्षेत्रवार वोट और 2024 में उन्हीं क्षेत्रों में भाजपा के वोट की तुलना करनी होगी। फिर यह देखना होगा कि JVM के मतदाताओं का कितना हिस्सा भाजपा के साथ गया, कितना विपक्ष के पास गया और कितना मतदान से बाहर रहा। अगर यह अध्ययन किया जाए तो इस दावे की वास्तविकता अधिक स्पष्ट हो सकती है।
भाजपा को वोट नहीं, राजनीतिक भूगोल समझना होगा
झारखंड के चुनावी आंकड़ों का सबसे बड़ा संदेश शायद यही है कि भाजपा के पास अभी भी बड़ा मत आधार मौजूद है। 2024 में भाजपा ने लगभग 76.82 लाख लोकसभा वोट हासिल किए और NDA ने 81.33 लाख। फिर भी विधानसभा स्तर पर उस मत शक्ति का रूपांतरण सीमित रहा। इसलिए झारखंड में भाजपा के सामने प्रश्न यह नहीं होना चाहिए कि “हमारे पास वोट कितने हैं?”
असल प्रश्न होना चाहिए—
“हमारे वोट कहां हैं?”
“वे किन विधानसभा क्षेत्रों में केंद्रित हैं?”
“कहां वोट सीट में बदल नहीं पा रहा है?”
“कहां संगठन कमजोर है?”
“कहां उम्मीदवार कमजोर है?”
“कहां गठबंधन का लाभ नहीं मिल रहा?”
और सबसे महत्वपूर्ण—
“झारखंड के अलग-अलग सामाजिक समूह भाजपा से क्या चाहते हैं?”
लोकसभा और विधानसभा चुनावों के बीच 47 बनाम 21 सीटों का अंतर यही बताता है कि केवल लोकप्रियता पर्याप्त नहीं है। झारखंड में अगली चुनावी लड़ाई जीतने के लिए किसी भी दल को केवल राज्य का राजनीतिक तापमान नहीं, बल्कि उसका विधानसभा-वार राजनीतिक भूगोल समझना होगा।
और भाजपा के लिए सबसे बड़ी चुनौती शायद यही है—अपने बड़े मत आधार को सामाजिक स्वीकार्यता, मजबूत स्थानीय संगठन और प्रभावी उम्मीदवारों के साथ सीटों में बदलना।
ECI स्वयं 2024 और 2019 के विस्तृत सांख्यिकीय चुनावी प्रतिवेदनों को उपलब्ध कराता है, इसलिए अंतिम प्रकाशित रिपोर्ट में इन्हीं आंकड़ों को आधार बनाया गया है।
| आंकड़ा | नोटशीट | संशोधित/उपलब्ध स्रोत |
|---|---|---|
| 2019 विधानसभा भाजपा | 50,22,374 | 50,22,374 |
| 2019 विधानसभा आजसू | 12,19,535 | 12,19,535 |
| भाजपा + आजसू | 62,41,909 | 62,41,909 |
| 2019 JMM+INC+RJD | 55,19,472 | 53,19,472 |
| 2019 JMM+INC+RJD+JVM+CPI(ML) | 63,12,704 | 63,12,704 |
| 2024 लोकसभा INDIA | 67,33,099 | 67,33,099 |
| 2024 लोकसभा भाजपा | 76,77,729 | 76,81,990 |
| 2024 लोकसभा NDA | 81,28,868 | 81,33,129 |
