गौतम चौधरी
लोकतंत्र की सबसे बड़ी विशेषता भिन्न-भिन्न जीवनशैलियों के साथ सम्मानपूर्वक जीने का अधिकार है। भारत जैसे बहुलतावादी समाज में यह सिद्धांत और भी अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है, क्योंकि यहाँ भाषा, वेशभूषा, पूजा-पद्धति और भोजन-सभी में विविधता है। यदि किसी लोकतंत्र में भोजन की थाली ही सामाजिक स्वीकार्यता और नैतिक श्रेष्ठता का पैमाना बनने लगे, तो समझ लेना चाहिए कि समस्या भोजन में नहीं, समाज की वैचारिक दिशा में उत्पन्न हो रही है।
भारतीय संविधान किसी नागरिक को शाकाहारी बनने का आदेश नहीं देता, न ही मांसाहारी बनने का अधिकार विशेष रूप से प्रदान करता है। संविधान प्रत्येक नागरिक की गरिमा, स्वतंत्रता और समानता की रक्षा करता है। अनुच्छेद 21 के अंतर्गत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार केवल जीवित रहने का अधिकार नहीं, बल्कि अपनी वैध जीवनशैली के अनुसार जीने का अधिकार भी है। न्यायपालिका ने भी समय-समय पर यह स्पष्ट किया है कि व्यक्तिगत पसंद और गरिमा, संविधान के मूल तत्व हैं। इसलिए भोजन की पसंद को सामाजिक या राजनीतिक संघर्ष का विषय बना देना संवैधानिक भावना के अनुरूप नहीं कहा जा सकता।
रांची के कांके रोड पर एक रेस्टोरेंट संचालक की हत्या ने इस बहस को और गंभीर बना दिया है। सार्वजनिक रूप से उपलब्ध जानकारी के अनुसार, विवाद भोजन के ऑर्डर से जुड़ा था। यदि किसी ग्राहक को शाकाहारी भोजन के स्थान पर गलती से मांसाहारी भोजन पैक कर दिया गया और यह विवाद हिंसा तक पहुँच गया, तो यह घटना केवल कानून-व्यवस्था की विफलता नहीं है, यह उस सामाजिक मनोविज्ञान का भी संकेत है जिसमें भोजन का प्रश्न मनुष्य के जीवन से बड़ा बना दिया जाता है। किसी भी परिस्थिति में ऐसी हिंसा का कोई नैतिक, धार्मिक या कानूनी औचित्य नहीं हो सकता।
यह भी स्वीकार करना होगा कि अनेक लोगों को कुछ प्रकार के भोजन की गंध से वास्तविक असुविधा होती है। यह असुविधा सम्मान की पात्र है लेकिन लोकतांत्रिक समाज का उत्तर प्रतिबंध नहीं, बल्कि ‘उचित समायोजन’ (Reasonable Accommodation) है। यही सिद्धांत आधुनिक संवैधानिक लोकतंत्र की पहचान है। यदि सार्वजनिक नीति, व्यक्तिगत पसंद और घृणा की भावना के आधार पर बनने लगे, तो कल कोई व्यक्ति लहसुन, प्याज़, हींग, सरसों के तेल या किसी अन्य खाद्य पदार्थ पर भी प्रतिबंध की मांग कर सकता है। ऐसी सोच अंततः समाज को अंतहीन टकराव की ओर ले जाएगी।
सबसे बड़ी चिंता उस मानसिकता से होनी चाहिए जो भोजन की पसंद को नैतिक श्रेष्ठता का प्रमाणपत्र बना देती है। जब किसी भोजन-पद्धति को ‘अधिक पवित्र’, ‘अधिक सभ्य’ या ‘अधिक राष्ट्रीय’ घोषित करने का प्रयास होता है, तब अनजाने में ही दूसरे नागरिकों के प्रति असहिष्णुता को वैचारिक आधार मिलने लगता है। अधिकांश लोग हिंसक नहीं होते लेकिन कट्टर सोच रखने वाले कुछ लोग ऐसे विमर्शों को अपने आचरण का औचित्य बना लेते हैं। इसलिए सार्वजनिक जीवन में विचार और भाषा-दोनों की जिम्मेदारी अत्यंत महत्वपूर्ण है।
भारत की सभ्यता का निर्माण किसी एक भोजन-पद्धति ने नहीं किया। यहाँ वैष्णव परंपरा का कठोर शाकाहार भी है, कश्मीर, तिरहुत, बंगाल, ओड़िशा, पूर्वाेत्तर, तटीय भारत और अनेक जनजातीय समाजों की विविध आहार-परंपराएँ भी हैं। किसी एक को भारतीयता का पर्याय और दूसरे को संदेह की दृष्टि से देखना हमारी सांस्कृतिक विरासत का सरलीकरण होगा। भारतीयता की पहचान विविधता के सम्मान में है, एकरूपता के आग्रह में नहीं।
लोकतंत्र की कसौटी यह नहीं है कि हम अपने अधिकारों की कितनी जोर से मांग करते हैं; उसकी कसौटी यह है कि हम दूसरों के अधिकारों का कितना सम्मान करते हैं। यदि कोई नागरिक शाकाहारी है, तो उसका सम्मान होना चाहिए। यदि कोई नागरिक कानून के दायरे में रहकर मांसाहार करता है, तो उसकी स्वतंत्रता का भी समान सम्मान होना चाहिए। किसी भी पक्ष को दूसरे की वैध जीवनशैली पर नैतिक या सामाजिक वर्चस्व स्थापित करने का अधिकार नहीं है।
रांची की घटना हमें चेतावनी देती है कि जब भोजन की थाली मनुष्य की पहचान बन जाती है, तब समाज का विवेक सिकुड़ने लगता है। सभ्य समाज का मार्ग थाली की निगरानी से नहीं, बल्कि संवैधानिक मूल्यों की रक्षा से होकर जाता है।
आज आवश्यकता इस बात की नहीं है कि हम यह तय करें कि कौन क्या खाए। आवश्यकता इस बात की है कि हम यह सुनिश्चित करें कि किसी की थाली किसी दूसरे के जीवन का कारण न बने। भारत की लोकतांत्रिक आत्मा इसी संतुलन में सुरक्षित है।
