अक्षपाद् गौतम
झारखंड की राजनीति में हेमंत सोरेन का दूसरा कार्यकाल केवल सत्ता की वापसी नहीं है; यह जनादेश का दूसरा अवसर भी है। जनता ने उन्हें केवल सरकार बनाने का अधिकार नहीं दिया, बल्कि उस वैकल्पिक विकास-दृष्टि को परखने का अवसर भी दिया है, जिसकी चर्चा झारखंड आंदोलन के दिनों से होती रही है। इसलिए इस कार्यकाल का मूल्यांकन सामान्य राजनीतिक कसौटियों पर नहीं, बल्कि इस प्रश्न पर होना चाहिए कि क्या झारखंड अब अपनी ऐतिहासिक आकांक्षाओं को प्रशासनिक उपलब्धियों में बदल रहा है।
हेमंत के दूसरे कार्यकाल की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि सरकार ने अपनी राजनीतिक पहचान को और स्पष्ट किया है। ‘जल, जंगल, जमीन’, आदिवासी अस्मिता, स्थानीय अधिकार, सामाजिक न्याय और कल्याणकारी राज्य की अवधारणा उसके शासन की केंद्रीय धुरी बनी हुई है। महिलाओं के आर्थिक सशक्तीकरण के लिए ‘मंईयां सम्मान योजना’, गरीबों के लिए ‘अबुआ आवास योजना’, स्थानीय समुदायों और ग्रामीण क्षेत्रों पर विशेष ध्यान तथा प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (DBT) आधारित योजनाओं का विस्तार इस बात का संकेत है कि सरकार अपनी सामाजिक आधार-भूमि को मजबूत करने के साथ-साथ कल्याणकारी राजनीति का नया मॉडल विकसित करना चाहती है।
राजनीतिक दृष्टि से यह रणनीति सफल दिखाई देती है। झारखंड के ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में सरकार ने यह संदेश देने में सफलता पाई है कि राज्य की नीतियाँ अब केवल विकास के आँकड़ों से नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय और स्थानीय भागीदारी के दृष्टिकोण से भी संचालित होंगी। अब यहीं से शासन की वास्तविक परीक्षा आरम्भ होती है।
झारखंड के सामने आज सबसे बड़ी चुनौती रोजगार की है। राज्य की लाखों युवा आबादी अब केवल पहचान की राजनीति से संतुष्ट नहीं है। वह सम्मानजनक रोजगार, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, आधुनिक कौशल और उद्यमिता के अवसर चाहती है। यदि राज्य का युवा आज भी रोज़गार के लिए राँची, जमशेदपुर और धनबाद से आगे दिल्ली, बेंगलुरु, हैदराबाद या पुणे की ओर पलायन करने को विवश है, तो यह संकेत है कि आर्थिक ढाँचे को और मजबूत करने की आवश्यकता है।
इसी प्रकार, खनिज संपदा से समृद्ध झारखंड के सामने सबसे कठिन प्रश्न संसाधनों के उपयोग का है। क्या खनन केवल राजस्व अर्जित करने का माध्यम रहेगा, या उसे स्थानीय विकास, पर्यावरणीय संतुलन और समुदायों की समृद्धि से भी जोड़ा जाएगा? यदि सरकार इस संतुलन का सफल मॉडल प्रस्तुत करती है, तो झारखंड पूरे देश के लिए उदाहरण बन सकता है।
दूसरे कार्यकाल में प्रशासनिक दक्षता भी एक बड़ी कसौटी होगी। योजनाओं की घोषणा और राजनीतिक इच्छाशक्ति महत्वपूर्ण हैं, लेकिन अंतिम निर्णय जनता उनके क्रियान्वयन के आधार पर करेगी। समय पर भुगतान, पारदर्शिता, भ्रष्टाचार पर नियंत्रण, अधिकारियों की जवाबदेही और डिजिटल सेवा वितरण जैसे क्षेत्र सरकार की विश्वसनीयता तय करेंगे।
हेमंत सोरेन सरकार की एक बड़ी उपलब्धि यह भी है कि उसने आदिवासी विमर्श को रक्षात्मक राजनीति से निकालकर शासन के केंद्र में स्थापित किया लेकिन अब आवश्यकता है कि यह विमर्श केवल सांस्कृतिक अस्मिता तक सीमित न रहे। इसे आधुनिक शिक्षा, तकनीकी प्रशिक्षण, कृषि-आधारित उद्योग, वन उत्पादों की मूल्य श्रृंखला, पर्यटन, हरित अर्थव्यवस्था और नवाचार से जोड़ा जाए। झारखंड की नई पीढ़ी अपनी पहचान भी चाहती है और वैश्विक अवसरों में भागीदारी भी।
सरकार के सामने राजनीतिक चुनौती भी कम नहीं है। एक ओर कल्याणकारी योजनाओं की निरंतरता बनाए रखनी है, दूसरी ओर राज्य की वित्तीय स्थिति को संतुलित रखना है। सामाजिक सुरक्षा और आर्थिक अनुशासन के बीच संतुलन ही दीर्घकालिक सफलता का आधार बनेगा।
दूसरे कार्यकाल का सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं है कि सरकार कितनी लोकप्रिय है। असली प्रश्न यह है कि क्या वह झारखंड की विकास-यात्रा को नई दिशा दे पा रही है? क्या वह खनिज संपदा को मानव संपदा में बदलने की रणनीति विकसित कर रही है? क्या वह युवाओं को राज्य में ही अवसर उपलब्ध करा पाएगी? क्या वह आदिवासी जीवन-दर्शन और आधुनिक अर्थव्यवस्था के बीच एक व्यवहारिक सेतु बना पाएगी?
यदि इन प्रश्नों का उत्तर सकारात्मक दिशा में विकसित होता है, तो हेमंत सोरेन का दूसरा कार्यकाल केवल एक सफल सरकार का नहीं, बल्कि झारखंड के वैकल्पिक विकास मॉडल का आधार बन सकता है।
झारखंड आंदोलन का सपना केवल अलग राज्य बनाना नहीं था। सपना था-ऐसा राज्य, जहाँ विकास का अर्थ केवल खदानों से निकलने वाला खनिज नहीं, बल्कि गाँवों में बढ़ती समृद्धि, युवाओं को मिलता रोजगार, महिलाओं का सशक्तिकरण, आदिवासी समाज का सम्मान और प्राकृतिक संसाधनों का न्यायपूर्ण उपयोग हो।
दूसरे कार्यकाल में हेमंत सोरेन सरकार के सामने यही सबसे बड़ी ऐतिहासिक जिम्मेदारी है। जनादेश ने उन्हें अवसर दिया है; अब इतिहास परिणामों की प्रतीक्षा कर रहा है। यहां हेमंत सोरेन के सामने दो रास्ते साफ तौर पर हैं। पहला रास्ता-नवीन पटनायक की तरह हेमंत झारखंड के लिए विकास की नयी दिशा तय करें, या फिर दूसरा रास्ता-लालू प्रसाद यादव वाला, इसमें सामाजिक न्याय तो है लेकिन विकास की अवधारणा कुंठित-सी दिखाई देती है।
