गौतम चौधरी
एक समय युद्ध तलवारों से लड़े जाते थे। फिर बंदूकें और तोपें आईं। बीसवीं शताब्दी में परमाणु हथियारों ने शक्ति का नया संतुलन बनाया। लेकिन इक्कीसवीं शताब्दी का सबसे प्रभावशाली हथियार न परमाणु बम है, न मिसाइल और न ही टैंक। आज सबसे शक्तिशाली हथियार है-नैरेटिव (Narrative)।
जिस समाज की धारणाओं पर नियंत्रण हो जाए, उसकी राजनीति, अर्थव्यवस्था और भविष्य पर भी प्रभाव डाला जा सकता है। इसलिए आज युद्ध केवल सीमाओं पर नहीं, बल्कि समाचार कक्षों, सोशल मीडिया, फिल्मों, विश्वविद्यालयों और डिजिटल मंचों पर भी लड़े जा रहे हैं।
शीत युद्ध के दौरान सोवियत संघ और पश्चिमी देशों ने एक-दूसरे पर मीडिया को वैचारिक हथियार बनाने का आरोप लगाया। सोवियत प्रकाशनों में ‘साम्राज्यवादी प्रचार’ पर पुस्तकें लिखी गईं, जबकि पश्चिमी विद्वानों ने भी बाद में Manufacturing Consent और Media Imperialism जैसे सिद्धांत विकसित किए। दोनों पक्षों का दावा था कि दूसरा पक्ष जनमत को नियंत्रित कर रहा है। इतिहास का निष्कर्ष यह है कि दोनों पक्ष नैरेटिव के महत्व को समझते थे और दोनों उसका उपयोग करते थे।
भारत जैसे लोकतंत्र के लिए यही सबसे बड़ी सीख है। हमारे सामने चुनौती केवल पूंजीवादी नैरेटिव की नहीं है और न ही केवल साम्यवादी नैरेटिव की है। आज धार्मिक कट्टरता, भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा, कॉरपोरेट हित, डिजिटल एल्गोरिद्म और वैश्विक महाशक्तियाँ-सभी अपने-अपने नैरेटिव गढ़ रही हैं। ऐसे समय में किसी एक नैरेटिव का अंधानुकरण हमें दूसरे नैरेटिव का बंदी बना सकता है।
भारतीय राजनीति भी इससे अछूती नहीं रही। बोफोर्स का मामला केवल न्यायालय का विषय नहीं था; वह जनविश्वास का प्रश्न बन गया। 2जी स्पेक्ट्रम विवाद ने भ्रष्टाचार के विरुद्ध व्यापक जनमत तैयार किया, जबकि बाद में न्यायिक प्रक्रिया का परिणाम अलग रहा। कोयला ब्लॉक आवंटन ने शासन और नीति निर्माण पर गंभीर प्रश्न उठाए, जिनमें न्यायिक हस्तक्षेप भी हुआ। दूसरी ओर, अजमल कसाब को बिरयानी खिलाए जाने जैसी बातें वर्षों तक राजनीतिक विमर्श में रहीं, जबकि उनके समर्थन में विश्वसनीय प्रमाण सामने नहीं आए। इन उदाहरणों से एक ही बात स्पष्ट होती है-राजनीति में धारणा कई बार न्यायिक निष्कर्ष से पहले अपना काम कर चुकी होती है।
यह केवल भारत की कहानी नहीं है। इराक युद्ध से पहले ‘विनाशकारी हथियारों’ (Weapons of Mass Destruction) का नैरेटिव पूरी दुनिया में स्थापित किया गया। बाद में ऐसे हथियार नहीं मिले लेकिन तब तक युद्ध हो चुका था। ब्रेक्सिट, अमेरिकी चुनाव, रूस-यूक्रेन संघर्ष और सोशल मीडिया के युग ने यह सिद्ध कर दिया है कि सूचना अब केवल सूचना नहीं रही; वह रणनीतिक शक्ति बन चुकी है।
तो क्या समाधान यह है कि एक नैरेटिव का उत्तर दूसरे नैरेटिव से दिया जाए? राजनीति में ऐसा होता है लेकिन पत्रकारिता का धर्म इससे भिन्न है। यदि पत्रकार भी केवल प्रति-नैरेटिव गढ़ने लगें, तो समाज अंतहीन प्रचार-युद्ध का मैदान बन जाएगा। लोकतंत्र का आधार प्रचार नहीं, बल्कि विवेकपूर्ण नागरिक है। इसलिए पत्रकारिता का उद्देश्य किसी विचारधारा का प्रचार करना नहीं, बल्कि प्रत्येक दावे की परीक्षा करना होना चाहिए।
आज आवश्यकता ‘फैक्ट-चेक’ से भी आगे बढ़ने की है। कई बार झूठ नहीं, बल्कि आधा सच सबसे प्रभावशाली हथियार बनता है। किसी तथ्य को संदर्भ से काट देना, कुछ आँकड़े दिखाना और कुछ छिपा लेना, या भावनात्मक भाषा के माध्यम से निष्कर्ष थोप देना-यही आधुनिक नैरेटिव की सबसे बड़ी शक्ति है।
भारत के सामने चुनौती इसलिए और बड़ी है क्योंकि वह अनेक प्रकार के वैश्विक प्रभावों के बीच खड़ा है। एक ओर बाजार की शक्ति है, दूसरी ओर वैचारिक ध्रुवीकरण; कहीं धार्मिक उग्रवाद है तो कहीं तकनीकी वर्चस्व; कहीं भू-राजनीतिक विस्तारवाद है तो कहीं सूचना का साम्राज्यवाद। ऐसे समय में भारत यदि अपनी सभ्यतागत दृष्टि को बचाना चाहता है, तो उसे किसी एक वैश्विक नैरेटिव का अनुयायी नहीं, बल्कि स्वतंत्र विचार का निर्माता बनना होगा।
भारतीय चिंतन की सबसे बड़ी विशेषता यही रही है कि उसने प्रश्न पूछने की परंपरा को जीवित रखा। उपनिषदों के संवाद, बुद्ध की तर्क-पद्धति, महावीर का अनेकांतवाद, गांधी का सत्याग्रह, लोहिया का वैचारिक असहमति का आग्रह और दीनदयाल उपाध्याय का एकात्म मानववाद-इन सबमें एक साझा तत्व दिखाई देता है। वह है-मनुष्य को विचारधारा से बड़ा मानना। शायद आज भारत की सबसे बड़ी आवश्यकता भी यही है।
हमें न पश्चिम-विरोधी प्रचार की आवश्यकता है, न पश्चिम-समर्थक प्रचार की, न पूर्व का अंधानुकरण और न किसी विचारधारा की अंधभक्ति। आवश्यकता इस बात की है कि प्रत्येक नैरेटिव से पहले हम पूछें-प्रमाण क्या हैं? संदर्भ क्या है? कौन-सा तथ्य छूट गया है? और इस कथा से लाभ किसे मिल रहा है?
लोकतंत्र में सबसे बड़ा संकट विचारों का संघर्ष नहीं, बल्कि विचारों की जगह प्रचार का ले लेना है। जिस दिन समाज प्रश्न पूछना छोड़ देता है, उसी दिन नैरेटिव सत्य का स्थान ले लेता है। इसलिए आज भारत को केवल वैकल्पिक नैरेटिव की नहीं, बल्कि वैकल्पिक बौद्धिक संस्कृति की आवश्यकता है-जहाँ किसी भी विचार को उसकी लोकप्रियता से नहीं, बल्कि उसके प्रमाण, तर्क और समाजहित की कसौटी पर परखा जाए। यही स्वतंत्र और जीवंत राष्ट्र की पहचान है और शायद यही स्वतंत्र चेतना का भी पहला प्रमाण भी है।
