OECD के आईने में भारतीय अर्थव्यवस्था, विकास की रफ्तार और जेब की हकीकत

OECD के आईने में भारतीय अर्थव्यवस्था, विकास की रफ्तार और जेब की हकीकत

गौतम चौधरी

भारतीय अर्थव्यवस्था की तस्वीर इन दिनों दो विरोधी रंगों में दिखाई देती है। एक ओर भारत दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में तेज गति से बढ़ रहा है। दूसरी ओर आम परिवार के लिए आर्थिक स्थिति का आकलन GDP की दर से नहीं, बल्कि भोजन की कीमत, रोजगार, बचत और महीने के अंत में बचने वाली रकम से होता है।

OECD की जून 2026 की Economic Outlook इसी अंतर को समझने का एक महत्वपूर्ण अवसर देती है। OECD ने भारत की वास्तविक GDP वृद्धि FY2026-27 में 6.3 प्रतिशत और FY2027-28 में 6.4 प्रतिशत रहने का अनुमान लगाया है। यह वैश्विक परिस्थितियों को देखते हुए निश्चित रूप से मजबूत वृद्धि है। लेकिन रिपोर्ट साथ ही खाद्य और ऊर्जा कीमतों, रुपये की कमजोरी, रोजगार तथा वैश्विक मांग से जुड़े जोखिमों की ओर भी संकेत करती है। इसलिए भारत की आर्थिक कहानी को न तो केवल सफलता की कहानी कहा जा सकता है, न संकट की।

6.3 प्रतिशत की वृद्धि यह बताती है कि भारतीय अर्थव्यवस्था में आर्थिक गतिविधियां मजबूत हैं। बड़ा घरेलू बाजार, आंतरिक मांग और निवेश की संभावनाएं भारत की ताकत हैं। लेकिन तेज GDP वृद्धि और तेज होती पारिवारिक समृद्धि एक ही बात नहीं है।

GDP अर्थव्यवस्था के आकार और उत्पादन में वृद्धि बताता है, लेकिन यह नहीं बताता कि उस वृद्धि का लाभ किसे कितना मिला। यदि किसी परिवार की आय 7 प्रतिशत बढ़ती है, लेकिन उसकी आवश्यक खपत की लागत 8 प्रतिशत बढ़ जाती है, तो कागज पर आय बढ़ी है, पर उसकी वास्तविक क्रय-शक्ति घट गई। इसीलिए आर्थिक स्वास्थ्य को केवल GDP से नहीं, बल्कि वास्तविक आय, वास्तविक मजदूरी, रोजगार, उपभोग और महंगाई के साथ देखना होगा।

OECD ने FY2026-27 में भारत की महंगाई 4.8 प्रतिशत रहने का अनुमान लगाया है। लेकिन औसत महंगाई का प्रभाव सभी परिवारों पर समान नहीं होता। उच्च आय वाला परिवार अपनी आय का अपेक्षाकृत छोटा हिस्सा भोजन पर खर्च करता है, जबकि गरीब और निम्न-मध्यवर्गीय परिवार के बजट में भोजन, ईंधन और परिवहन की हिस्सेदारी अधिक होती है। इसलिए आवश्यक वस्तुओं की कीमत बढ़ने का असर उनकी क्रय-शक्ति पर कहीं अधिक पड़ता है। इसलिए सवाल सिर्फ यह नहीं होना चाहिए कि महंगाई कितने प्रतिशत है। सवाल यह भी है कि महंगाई किन वस्तुओं में है और उनका भार किस वर्ग के घरेलू बजट पर कितना है।

ऊर्जा कीमतों में वृद्धि का असर पेट्रोल पंप तक सीमित नहीं रहता। ईंधन महंगा होने से परिवहन लागत बढ़ती है, कृषि उत्पाद और औद्योगिक उत्पादन महंगे हो सकते हैं और अंततः उसका कुछ हिस्सा उपभोक्ता तक पहुंचता है। भारत की ऊर्जा आयात पर निर्भरता इस जोखिम को और बढ़ाती है। अंतरराष्ट्रीय तेल और गैस कीमतों में उछाल घरेलू महंगाई के साथ-साथ चालू खाते पर भी दबाव डाल सकता है। रुपये की कमजोरी भी इसी तरह अप्रत्यक्ष रूप से आम आदमी तक पहुंचती है। आयातित तेल, गैस, उर्वरक, मशीनरी और कच्चा माल महंगा होने से उत्पादन लागत बढ़ सकती है। इसलिए विनिमय दर और ऊर्जा बाजार की खबरें अंततः घरेलू बजट की खबरें भी हैं।

भारत की आर्थिक नीति के सामने सबसे बड़ा सवाल शायद यही है कि विकास कितने और किस तरह के रोजगार पैदा कर रहा है। युवा आबादी भारत की ताकत है, लेकिन पर्याप्त उत्पादक और स्थिर रोजगार के बिना यही जनसांख्यिकीय लाभांश चुनौती बन सकता है। OECD के आकलन में रोजगार वृद्धि और labour-market participation को लेकर भी जोखिमों का उल्लेख है। इसलिए भविष्य में यह पूछना उतना ही जरूरी होगा कि GDP की प्रत्येक अतिरिक्त प्रतिशत वृद्धि कितने नए और बेहतर रोजगार पैदा करती है।

ऊर्जा और खाद्य कीमतों से परिवारों को राहत देने के लिए सरकार को राजकोषीय सहायता बढ़ानी पड़ सकती है। लेकिन इससे राजकोषीय घाटे और सार्वजनिक ऋण को नियंत्रित करने की चुनौती बढ़ सकती है।

OECD के अनुसार ऊर्जा-संबंधी उपायों के कारण FY2026-27 में राजकोषीय घाटा बजट में निर्धारित रास्ते की तुलना में लगभग 0.4 प्रतिशत GDP अधिक हो सकता है। इसलिए सरकार के सामने दोहरी चुनौती है—महंगाई से परिवारों को राहत भी मिले और राजकोषीय अनुशासन भी बना रहे। इसका रास्ता व्यापक और स्थायी सब्सिडी के बजाय अधिक लक्षित और अस्थायी सहायता में तलाशना बेहतर होगा।

भारत की अर्थव्यवस्था में झटकों को सहने की क्षमता है। OECD का 2027-28 में 6.4 प्रतिशत वृद्धि का अनुमान भी बताता है कि भारत की दीर्घकालीन विकास क्षमता को लेकर संभावनाएं बनी हुई हैं।

अब आर्थिक विमर्श को केवल विकास दर से आगे ले जाने की जरूरत है, क्या वास्तविक मजदूरी बढ़ रही है, क्या रोजगार की गुणवत्ता सुधर रही है, क्या छोटे किसान और छोटे उद्यमी विकास का लाभ उठा रहे हैं, क्या परिवारों की बचत और उपभोग क्षमता मजबूत हो रही है, क्या आर्थिक वृद्धि अवसर और आय की असमानता को कम कर रही है? इन सवालों के जवाब ही बताएंगे कि भारत की तेज GDP वृद्धि वास्तव में कितनी व्यापक समृद्धि में बदल रही है।

OECD की रिपोर्ट को न तो भारत के लिए खतरे की घंटी माना जाना चाहिए और न ही महज एक सकारात्मक विकास पूर्वानुमान के रूप में छोड़ देना चाहिए। इसका संदेश अधिक संतुलित है—भारत की विकास क्षमता मजबूत है, लेकिन महंगाई, ऊर्जा लागत, मुद्रा, रोजगार और वैश्विक अनिश्चितता वास्तविक चुनौतियां हैं। किसी देश की आर्थिक सफलता का प्रमाण केवल यह नहीं कि उसका GDP कितने प्रतिशत बढ़ा।

सवाल यह है कि एक सामान्य परिवार की आय कितनी बढ़ी, उसकी क्रय-शक्ति कितनी बढ़ी, उसके बच्चों के लिए रोजगार की संभावनाएं कितनी बढ़ीं और महीने के अंत में उसकी जेब में कितना बचा। भारत के लिए अगला लक्ष्य इसलिए केवल “तेज विकास” नहीं होना चाहिए। लक्ष्य होना चाहिए—“तेज, टिकाऊ, रोजगारपरक और व्यापक रूप से महसूस किया जाने वाला विकास।” क्योंकि विकास की असली कहानी, GDP के आंकड़ों में नहीं, भारतीय परिवार के बजट में लिखी जाती है।

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