कुमार कृष्णन
जंगल को बचाने वाली पीढ़ियां आज अपने ही जंगल पर अधिकार साबित करने के लिए सरकारी दफ्तरों के चक्कर काट रही हैं। जिन वनवासी समुदायों ने प्रकृति के साथ अपनी संस्कृति और आजीविका विकसित की, उन्हें अब भी कानूनी मान्यता का इंतजार है। ऐतिहासिक अन्याय दूर करने के उद्देश्य से बने वनाधिकार अधिनियम, 2006 के करीब दो दशक बाद भी सवाल कायम है कि वनवासियों को उनका हक मिला या वे सरकारी प्रक्रियाओं में उलझकर रह गए?
9 अक्टूबर 2026 को कोलकाता में वनाधिकार कानून के क्रियान्वयन पर आयोजित दूसरे क्षेत्रीय समीक्षा सम्मेलन में इस सवाल पर चर्चा हुई। केंद्रीय जनजातीय कार्य मंत्रालय की पहल पर आयोजित सम्मेलन में पश्चिम बंगाल, असम, त्रिपुरा, झारखंड, ओडिशा, बिहार, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के अधिकारियों ने हिस्सा लिया। आंध्र प्रदेश को वनाधिकार पत्रों के डिजिटलीकरण, सरकारी अभिलेखों में दर्जीकरण और लाभार्थियों को आजीविका योजनाओं से जोड़ने के अनुभव साझा करने के लिए आमंत्रित किया गया था।
सम्मेलन का उद्देश्य लंबित दावों की बाधाओं को पहचानना और क्रियान्वयन में सुधार के उपाय तलाशना था। इसकी सफलता बैठकों और निर्देशों से नहीं, बल्कि इस बात से तय होगी कि कितने पात्र परिवारों को अधिकार मिला और उनके जीवन में कितना बदलाव आया।
जनजातीय कार्य मंत्रालय की ओर से संसद में दी गई जानकारी के अनुसार, 30 जून 2026 तक देशभर में 54,01,561 वनाधिकार दावे प्राप्त हुए थे। इनमें 25,42,359 के तहत अधिकार पत्र वितरित किए गए, 18,13,232 दावे खारिज हुए और 10,45,970 लंबित थे। सम्मेलन से संबंधित विवरण में 31 अगस्त तक लगभग 11 लाख दावे लंबित और 18 लाख से अधिक खारिज बताए गए। दोनों अवधियों के आंकड़े अलग-अलग हैं, लेकिन वे स्पष्ट करते हैं कि कानून का क्रियान्वयन अभी अधूरा है।
हर लंबित दावे के पीछे किसी परिवार की जमीन, आजीविका और भविष्य का सवाल हो सकता है। इसी तरह, दावे का खारिज होना भी अपने आप में अंतिम सत्य नहीं है। अस्वीकृति के कारणों की जानकारी, अपील का अवसर और निष्पक्ष पुनर्विचार सुनिश्चित करना जरूरी है। प्रशासनिक निपटारे को न्याय की पूर्ति मान लेना उचित नहीं होगा।
वनाधिकार अधिनियम का उद्देश्य पात्र परिवारों को व्यक्तिगत वनाधिकार देने के साथ समुदायों के परंपरागत वन संसाधनों पर अधिकारों को मान्यता देना भी है। मगर दूरदराज के गांवों में पुराने भूमि दस्तावेजों का अभाव और वन तथा राजस्व विभागों के अभिलेखों में अंतर दावों की प्रक्रिया कठिन बनाते हैं। ऐसे में स्थानीय परंपराओं, उपलब्ध साक्ष्यों और जमीन के पारंपरिक उपयोग को भी महत्व मिलना चाहिए, ताकि दस्तावेजों की कमी के कारण पात्र व्यक्ति अधिकार से वंचित न रह जाएं।
व्यक्तिगत वनाधिकार, सामुदायिक वनाधिकार और सामुदायिक वन संसाधन अधिकार अलग-अलग श्रेणियां हैं। सामुदायिक अधिकारों के तहत लघु वनोपज, चराई, जलस्रोतों और पारंपरिक संसाधनों के उपयोग को मान्यता मिल सकती है। सामुदायिक वन संसाधन अधिकार ग्रामसभा को परंपरागत वन क्षेत्र के संरक्षण, पुनर्जीवन और प्रबंधन में महत्वपूर्ण भूमिका देते हैं।
सम्मेलन से संबंधित विवरण के अनुसार, 30 जून 2026 तक देश में 19,845 सामुदायिक वन संसाधन अधिकार मान्यता प्राप्त थे। यह संख्या सभी प्रकार के सामुदायिक वनाधिकारों की नहीं है। महुआ, शहद, औषधीय पौधों और दूसरे वन संसाधनों पर निर्भर समुदायों के लिए इन अधिकारों का व्यावहारिक उपयोग बेहद महत्वपूर्ण है। गांधीवादी कार्यकर्ता और एकता परिषद के संस्थापक पी. वी. राजगोपाल का जनांदोलन भी भूमि तथा प्राकृतिक संसाधनों तक पहुंच को वंचित समुदायों की आजीविका और गरिमा से जोड़ता रहा है।
वन संरक्षण के नाम पर स्थानीय समुदायों को निर्णय प्रक्रिया से बाहर रखना न्यायसंगत नहीं है। उनके पारंपरिक ज्ञान और अनुभव की उपेक्षा करके टिकाऊ संरक्षण की कल्पना अधूरी रहेगी। दूसरी ओर, अधिकारों की मान्यता का अर्थ पर्यावरणीय संतुलन की अनदेखी भी नहीं है। जरूरत ऐसी व्यवस्था की है, जिसमें समुदायों के अधिकार, उनकी जिम्मेदारी और जंगलों का संरक्षण साथ-साथ आगे बढ़ें।
वनाधिकार पत्रों का डिजिटलीकरण और सरकारी अभिलेखों में उनका दर्जीकरण उपयोगी कदम हैं। इससे रिकॉर्ड सुरक्षित रखने और लंबित मामलों की निगरानी में मदद मिलेगी। हालांकि, गलत अभिलेखों को डिजिटल कर देने से त्रुटियां दूर नहीं होंगी। रिकॉर्ड में सुधार, पारदर्शी निर्णय और ग्रामीणों को स्थानीय स्तर पर प्रशासनिक सहायता देना भी आवश्यक है।
बिहार की स्थिति विशेष समीक्षा की मांग करती है। मंत्रालय की ओर से संसद में दी गई जानकारी के अनुसार, 30 जून 2026 तक राज्य में 4,696 वनाधिकार दावे प्राप्त हुए थे। इनमें 191 के तहत अधिकार पत्र जारी हुए, 4,496 खारिज हुए और नौ लंबित थे। सभी 191 अधिकार पत्र व्यक्तिगत वनाधिकार के थे। आंकड़ों में कोई सामुदायिक वनाधिकार दावा दर्ज नहीं था।
यह स्थिति कई सवाल उठाती है। क्या संभावित पात्र समुदायों तक कानून की जानकारी पहुंची? क्या ग्रामसभाओं को दावे तैयार करने और साक्ष्य जुटाने में सहायता मिली? क्या परंपरागत वन संसाधनों पर निर्भर गांवों की पहचान की गई? सामुदायिक दावों का शून्य होना अपने आप यह साबित नहीं करता कि बिहार में पात्र समुदाय नहीं हैं। यह पात्रता की पहचान, जागरूकता और प्रशासनिक प्रक्रिया की समीक्षा की जरूरत भी दर्शाता है। इसी तरह, बड़ी संख्या में दावों के खारिज होने के कारणों की जांच और पात्र परिवारों के लिए प्रभावी अपील व्यवस्था जरूरी है।
राष्ट्रीय स्तर पर व्यक्तिगत, सामुदायिक और सामुदायिक वन संसाधन अधिकारों के आंकड़े अलग-अलग सार्वजनिक किए जाने चाहिए। लंबित मामलों के निपटारे की समय-सीमा तय हो और अनावश्यक देरी के लिए जवाबदेही निर्धारित की जाए। वन, राजस्व और जनजातीय कल्याण विभागों के बीच समन्वय बढ़ाने के साथ ग्रामसभाओं को जरूरी कानूनी तथा प्रशासनिक सहायता उपलब्ध कराई जानी चाहिए।
कोलकाता सम्मेलन की असली कसौटी यह होगी कि लंबित दावों पर समयबद्ध निर्णय हुए या नहीं, गलत तरीके से खारिज मामलों की समीक्षा हुई या नहीं और ग्रामसभाओं को उनके अधिकारों का वास्तविक उपयोग करने का अवसर मिला या नहीं। वनाधिकार कानून केवल जमीन का सवाल नहीं, बल्कि सम्मान, आजीविका और लोकतांत्रिक न्याय से भी जुड़ा है। वनवासियों का अधिकार सरकार की कृपा नहीं, कानून से मिला हक है। उसे कागजों में दर्ज करके जमीन पर अधूरा छोड़ देना ऐतिहासिक अन्याय को समाप्त करना नहीं, बल्कि उसे नए रूप में जारी रखना है।
आलेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं। इससे जनलेख प्रबंधन का कोई सरोकार नहीं है।
