गौतम चौधरी
धर्म और कानून का संबंध केवल आस्था या परंपरा का मामला नहीं है। यह न्याय, नैतिकता और समाज के संचालन से भी जुड़ा है। प्रत्येक धर्म के सामने समय-समय पर यह प्रश्न उपस्थित होता रहा है कि उसकी मूल शिक्षाओं को बदलती सामाजिक परिस्थितियों में किस प्रकार समझा जाए और उनका व्यावहारिक उपयोग कैसे किया जाए। इस्लाम के संदर्भ में यह प्रश्न शरीआ, फिकह और इज्तिहाद की अवधारणाओं के माध्यम से सामने आता है। समकालीन इस्लामी चिंतन की एक प्रमुख चुनौती यह है कि धार्मिक विधान की मूल भावना को सुरक्षित रखते हुए आधुनिक समाज की जटिल समस्याओं का समाधान कैसे खोजा जाए।
इस बहस को समझने के लिए सबसे पहले शरीआ और फिकह के बीच के अंतर को समझना आवश्यक है। यह केवल इस्लाम के मानने वालों के लिए ही जरूरी नहीं है अपितु भारत जैसे देश के उन सभी जिम्मेदार व्यक्तियों को जानना चाहिए, जो समाज को समुन्नत बनाने में अपनी भूमिका निभाना चाहते हैं। सामान्यतः शरीआ को ईश्वर द्वारा निर्धारित जीवन-पथ और नैतिक मार्गदर्शन के व्यापक सिद्धांतों के रूप में देखा जाता है। इसके इतर, फिकह उन सिद्धांतों को समझने, उनकी व्याख्या करने और उनसे व्यावहारिक कानूनी निष्कर्ष निकालने की मानवीय बौद्धिक प्रक्रिया है। दोनों को एक ही मान लेने से एक महत्त्वपूर्ण अंतर समाप्त हो जाता है। ईश्वरीय मार्गदर्शन के प्रति आस्था अपनी जगह है, जबकि उस मार्गदर्शन को समझने और लागू करने में मनुष्य की व्याख्या, परिस्थिति और विवेक की भूमिका अपनी जगह है। बरेलवी फिरके के इस्लामिक विद्वान मुफ्ती तुफैल खान कादरी साहब का कहना है कि दोनों के महत्व को इस्लामिक चिंतन में तरजीह दी गयी है।
यही वह वजह है, जिसमें इस्लामी न्यायशास्त्र रचनात्मक चिंतन की संभावनाओं को खोलता है। यदि फिकह को केवल अतीत के विद्वानों द्वारा निर्धारित निष्कर्षों का संग्रह मान लिया जाए, तो बदलती परिस्थितियों में नए प्रश्नों का समाधान कठिन हो सकता है। दूसरी ओर, यदि धार्मिक परंपरा के मूल स्रोतों, स्थापित सिद्धांतों और नैतिक उद्देश्यों की उपेक्षा करके किसी भी नए विचार को स्वीकार कर लिया जाए, तो न्यायशास्त्र की अपनी वैचारिक निरंतरता प्रभावित होगी। इसलिए आवश्यकता न तो अंधानुकरण की है और न ही परंपरा के पूर्ण निषेध की। आवश्यकता ऐसी विवेकपूर्ण व्याख्या की है जो परंपरा के ज्ञान और वर्तमान समय की वास्तविकताओं के बीच सार्थक संवाद स्थापित कर सके।
इसी संदर्भ में इज्तिहाद का महत्त्व सामने आता है। इज्तिहाद की व्याख्या करते हुए तुफैल साहब बताते हैं, ‘‘इज्तिहाद का सामान्य अर्थ किसी कानूनी या धार्मिक प्रश्न पर उपलब्ध स्रोतों और मान्य विधियों के आधार पर गंभीर बौद्धिक प्रयास करना है। यह केवल व्यक्तिगत इच्छा के अनुसार नियम बदल देने का नाम नहीं है। इसके लिए धार्मिक ग्रंथों का ज्ञान, न्यायशास्त्रीय परंपरा की समझ, तर्कशक्ति और संबंधित सामाजिक परिस्थितियों का विवेकपूर्ण अध्ययन आवश्यक है।’’
इस्लामिक विद्वानों का मानना है कि इस्लामी बौद्धिक इतिहास में इज्तिहाद की अलग-अलग व्याख्याएँ रही हैं। विभिन्न न्यायशास्त्रीय परंपराओं ने इसकी सीमाओं, विधियों और अधिकार-क्षेत्र पर अलग-अलग मत प्रस्तुत किए हैं। इसी कारण यह कहना कि किसी एक समय में पूरे इस्लामी जगत में इज्तिहाद के दरवाजे पूरी तरह बंद हो गए थे, ऐतिहासिक वास्तविकता का अत्यधिक सरलीकरण होगा। इसके बावजूद यह प्रश्न प्रासंगिक है कि क्या कुछ सामाजिक और धार्मिक परिस्थितियों में स्थापित व्याख्याओं का अनुकरण इतना प्रभावशाली हो गया कि स्वतंत्र कानूनी चिंतन की संभावनाएँ सीमित होने लगीं।
तुफैल साहब कहते हैं, ‘‘आज इस प्रश्न पर विचार करना इसलिए आवश्यक है कि आधुनिक समाज के सामने ऐसी समस्याएँ हैं, जिनका स्वरूप पहले से काफी अलग है। जैव प्रौद्योगिकी, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डिजिटल निजता, पर्यावरण संरक्षण, आधुनिक वित्तीय व्यवस्था और नागरिक अधिकारों से जुड़े प्रश्नों का समाधान केवल पुराने उदाहरणों को दोहराकर नहीं किया जा सकता। इनके लिए मूल धार्मिक सिद्धांतों की समझ के साथ-साथ आधुनिक विज्ञान, सामाजिक विज्ञान, कानून और मानवीय अनुभवों का ज्ञान भी आवश्यक है।’’
इस दृष्टि से इज्तिहाद अतीत से विच्छेद का माध्यम नहीं, बल्कि परंपरा को जीवंत बनाए रखने का एक रास्ता है। वह यह सुनिश्चित कर सकता है कि धार्मिक चिंतन अपने मूल नैतिक सरोकारों को सुरक्षित रखते हुए नए प्रश्नों का सामना करे।
इस्लामी न्यायशास्त्र में ’मक़ासिद अल-शरीआ’ अर्थात शरीआ के व्यापक उद्देश्यों की अवधारणा इस विमर्श को एक महत्त्वपूर्ण आधार प्रदान करती है। इस परंपरा में धर्म, जीवन, बुद्धि, वंश या परिवार तथा संपत्ति की सुरक्षा जैसे उद्देश्यों पर विशेष बल दिया गया है। विभिन्न विद्वानों ने समय के साथ इन उद्देश्यों की व्याख्या का विस्तार भी किया है। आधुनिक विमर्श में मानवीय गरिमा, स्वतंत्रता, सामाजिक न्याय और सार्वजनिक कल्याण को भी इनके साथ जोड़कर समझने के प्रयास किए जाते हैं।
इन उद्देश्यों की प्रासंगिकता केवल धार्मिक सिद्धांतों की चर्चा तक सीमित नहीं है। इनका वास्तविक महत्त्व तब सामने आता है, जब किसी नियम की व्याख्या से उत्पन्न सामाजिक परिणामों का मूल्यांकन किया जाता है। यदि किसी प्रचलित व्याख्या के आधार पर अन्याय, उत्पीड़न या अनावश्यक मानवीय पीड़ा को बढ़ावा मिलता है, तो उस व्याख्या की समीक्षा का प्रश्न उठना स्वाभाविक है। कुछ आधुनिक इस्लामिक चिंतकों का मानना है कि किसी नियम के कठिन परिणाम सामने आने मात्र से उसे स्वतः निरर्थक घोषित नहीं किया जा सकता। यह देखना भी जरूरी है कि उसका मूल आधार क्या है, उसका उद्देश्य किस प्रकार समझा गया है और क्या उसकी कोई दूसरी, अधिक न्यायसंगत तथा परंपरा-सम्मत व्याख्या संभव है।
इस प्रकार न्याय की कसौटी पर विचार करने का अर्थ धार्मिक विधान को मनमाने ढंग से बदलना नहीं है। इसका अर्थ है कि व्याख्या की प्रक्रिया में उसके नैतिक उद्देश्यों, मानवीय परिणामों और सामाजिक परिस्थितियों को गंभीरता से लिया जाए। धर्म की नैतिक शक्ति तभी व्यापक सामाजिक विश्वास अर्जित कर सकती है, जब उसके अनुयायी उसके सिद्धांतों को न्याय, दया और मानवीय गरिमा के साथ जोड़कर समझने का प्रयास करें।
आज मानवाधिकार, लैंगिक समानता, लोकतंत्र, धार्मिक स्वतंत्रता और व्यक्तिगत गरिमा जैसे विषय सार्वजनिक विमर्श के केंद्र में हैं। इन विषयों पर इस्लामी विद्वानों और विचारकों के बीच भी मतभेद हैं और बहस जारी हैं। कुछ विचारक पारंपरिक व्याख्याओं के भीतर समाधान खोजते हैं, जबकि कुछ स्थापित मान्यताओं की व्यापक समीक्षा की आवश्यकता पर बल देते हैं। इन मतभेदों को केवल धर्म और आधुनिकता के संघर्ष के रूप में देखना उचित नहीं होगा। इनके भीतर धार्मिक स्रोतों की व्याख्या, सामाजिक बदलाव और न्याय की अलग-अलग अवधारणाओं से जुड़े गंभीर प्रश्न भी शामिल हैं।
उदाहरण के लिए, परिवार और महिलाओं के अधिकारों से संबंधित प्रश्नों पर विचार करते समय केवल किसी एक प्रचलित मत को अंतिम उत्तर मान लेना पर्याप्त नहीं है। संबंधित धार्मिक स्रोतों, न्यायशास्त्रीय मतभेदों, ऐतिहासिक संदर्भों और वर्तमान सामाजिक परिस्थितियों का अध्ययन आवश्यक है। इसी प्रकार वित्तीय लेन-देन के क्षेत्र में डिजिटल भुगतान, नए निवेश माध्यमों और बदलते आर्थिक संबंधों से उत्पन्न प्रश्नों पर विचार करने के लिए धार्मिक सिद्धांतों के साथ आधुनिक अर्थव्यवस्था की समझ भी जरूरी है।
इन मामलों में न तो हर आधुनिक विचार को बिना परीक्षण स्वीकार करना चाहिए और न ही केवल इसलिए अस्वीकार कर देना चाहिए कि वह अतीत में प्रचलित नहीं था। किसी भी प्रस्ताव का मूल्यांकन उसके तर्क, प्रमाण, नैतिक आधार और व्यावहारिक परिणामों के आधार पर किया जाना चाहिए। यही दृष्टिकोण धार्मिक चिंतन को संकीर्णता से बचाते हुए उसे समकालीन समाज के साथ संवाद करने योग्य बना सकता है।
रचनात्मक इज्तिहाद को केवल एक सैद्धांतिक नारा बनाकर छोड़ देना पर्याप्त नहीं होगा। इसे व्यवहार में उतारने के लिए कुछ ठोस कदम आवश्यक हैं। पहला, धार्मिक शिक्षा में मूल ग्रंथों के अध्ययन के साथ इतिहास, दर्शन, तर्कशास्त्र और समकालीन सामाजिक विज्ञानों को पर्याप्त स्थान दिया जाना चाहिए। इससे विद्वान धार्मिक परंपरा को उसके ऐतिहासिक संदर्भ में समझ सकेंगे और वर्तमान समस्याओं का अधिक व्यापक विश्लेषण कर पाएँगे।
दूसरा, जटिल सामाजिक, आर्थिक और वैज्ञानिक प्रश्नों पर विचार करने के लिए विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञों के बीच संवाद विकसित किया जाना चाहिए। किसी नई चिकित्सा तकनीक, वित्तीय व्यवस्था या डिजिटल निगरानी के नैतिक पक्ष का आकलन केवल एक विषय के ज्ञान से संभव नहीं है। ऐसे मामलों में धार्मिक विद्वानों, वैज्ञानिकों, विधिवेत्ताओं, अर्थशास्त्रियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं की संयुक्त भागीदारी अधिक उपयोगी हो सकती है।
तीसरा, धार्मिक व्याख्याओं में मतभेद को बौद्धिक शत्रुता का कारण बनाने के बजाय तर्कपूर्ण विमर्श का अवसर समझना चाहिए। इस्लामी न्यायशास्त्र का इतिहास विभिन्न मतों और विधियों से समृद्ध रहा है। इस विरासत का रचनात्मक उपयोग तभी संभव है, जब असहमति को स्थान मिले और किसी मत की आलोचना को स्वतः धार्मिक आस्था पर आक्रमण न माना जाए।
चौथा, किसी भी नई व्याख्या के सामाजिक परिणामों का गंभीर परीक्षण होना चाहिए। यह देखा जाना चाहिए कि उससे न्याय, मानवीय गरिमा और सार्वजनिक कल्याण को कितना लाभ मिलता है। साथ ही, उसके आधार, तर्क और सीमाएँ सार्वजनिक रूप से स्पष्ट की जानी चाहिए, ताकि धार्मिक निर्णय केवल अधिकारपूर्ण घोषणा बनकर न रह जाएँ।
इन उपायों का उद्देश्य धार्मिक परंपरा को बाहरी दबावों के अनुरूप ढालना नहीं, बल्कि उसके भीतर मौजूद बौद्धिक संसाधनों का उपयोग करके वर्तमान समय की समस्याओं का उत्तर खोजना है।
धार्मिक परंपराओं की शक्ति केवल उनकी प्राचीनता में नहीं होती। उनकी शक्ति इस बात में भी होती है कि वे मनुष्य के बदलते अनुभवों, नई चुनौतियों और नैतिक प्रश्नों के साथ किस प्रकार संवाद करती हैं। इस्लामी न्यायशास्त्र के सामने भी यही चुनौती है। यदि फिकह को केवल अतीत में दिए गए निर्णयों की पुनरावृत्ति तक सीमित कर दिया जाए, तो उसके सामने नई परिस्थितियों को समझने की क्षमता कमजोर पड़ सकती है। यदि दूसरी ओर हर प्रश्न का समाधान केवल वर्तमान सामाजिक प्रचलन के आधार पर खोजा जाए, तो धार्मिक परंपरा की विशिष्टता और आंतरिक तर्क की उपेक्षा होने का खतरा रहेगा।
इसलिए रचनात्मक इज्तिहाद का रास्ता दोनों अतियों से बचने का रास्ता है। इसमें धार्मिक स्रोतों के प्रति गंभीरता, ऐतिहासिक परंपरा का सम्मान, स्वतंत्र विवेक, प्रमाण-आधारित तर्क और मानवीय परिणामों के प्रति संवेदनशीलता एक साथ आवश्यक हैं। यह प्रक्रिया आसान नहीं है। इसमें असहमति होगी, बहस होगी और कुछ प्रश्नों पर लंबे समय तक एकमत निष्कर्ष भी नहीं निकलेंगे। फिर भी गंभीर बौद्धिक संवाद से बचना किसी जीवंत परंपरा का समाधान नहीं हो सकता।
ईश्वर के विधान की खोज को मनुष्य द्वारा उसके अर्थ को समझने के निरंतर प्रयास के रूप में देखा जा सकता है। इस्लामी चिंतन में यह प्रयास तभी सार्थक होगा, जब वह आस्था और विवेक, परंपरा और परिवर्तन तथा धार्मिक प्रतिबद्धता और मानवीय न्याय के बीच संतुलन स्थापित करने का प्रयास करे। किसी भी धार्मिक व्याख्या की विश्वसनीयता केवल उसके प्राचीन होने से सिद्ध नहीं होती। उसके तर्क, संदर्भ और मानवीय परिणाम भी महत्त्वपूर्ण होते हैं।
तुफैल साहब कहते हैं, ’’धर्म की बौद्धिक जीवंतता का प्रमाण यह नहीं कि उसके पास हर प्रश्न का एक अपरिवर्तित उत्तर मौजूद है, बल्कि यह है कि वह अपने मूल नैतिक सरोकारों के प्रति निष्ठावान रहते हुए नए प्रश्नों का सामना करने का साहस रखता है। रचनात्मक इज्तिहाद इसी साहस का नाम है।’’
