गौतम चौधरी
झारखंड फिर एक बार सुर्खियों में है। लगभग एक लाख करोड़ रुपये के निवेश प्रस्ताव, राज्य का पहला परमाणु ऊर्जा संयंत्र, इस्पात उद्योग का विस्तार, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) में गूगल के साथ साझेदारी और पर्यटन क्षेत्र में नए समझौते-पहली नज़र में यह सब किसी औद्योगिक क्रांति की शुरुआत जैसा दिखाई देता है लेकिन पत्रकारिता का पहला धर्म है-स्मृति और झारखंड का इतिहास हमें उत्साह से पहले सावधानी बरतना सिखाता है।
राज्य गठन के बाद से झारखंड में निवेश के नाम पर हजारों करोड़ रुपये के एमओयू हुए। वर्ष 2017 के ‘मोमेंटम झारखंड’ निवेश सम्मेलन में ही लगभग ₹3 लाख करोड़ के 200 से अधिक समझौते हुए थे। उससे पहले और बाद में भी अनेक बड़े निवेश प्रस्ताव आए। किंतु नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की एक रिपोर्ट ने बताया कि राज्य गठन के बाद जुलाई 2016 तक हुए 79 एमओयू में से केवल 18 परियोजनियाँ ही आगे बढ़ सकीं। 38 समझौते रद्द हो गए और 23 परियोजनियाँ शुरू ही नहीं हुईं। प्रस्तावित ₹3.51 लाख करोड़ के निवेश के मुकाबले वास्तविक निवेश लगभग ₹33,000 करोड़ के आसपास दर्ज किया गया।
यही कारण है कि आज सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं है कि कितने करोड़ रुपये के MOU हुए, बल्कि यह है कि कितने करोड़ रुपये वास्तव में जमीन पर उतरेंगे?
इस बार सबसे बड़ी घोषणा 1400 मेगावाट के परमाणु ऊर्जा संयंत्र की है। यह निश्चय ही महत्वाकांक्षी परियोजना है। परंतु परमाणु ऊर्जा केवल निवेश का विषय नहीं है; यह सुरक्षा, पर्यावरण, जल संसाधन, विकिरण प्रबंधन, स्थानीय स्वीकृति और केंद्र सरकार की बहुस्तरीय मंजूरियों से जुड़ा विषय भी है। क्या परियोजना का स्थान तय हो चुका है? क्या प्रारंभिक तकनीकी और पर्यावरणीय अध्ययन पूरे हो चुके हैं? स्थानीय समुदायों से संवाद की क्या योजना है? इन प्रश्नों के स्पष्ट उत्तर सामने आने चाहिए।
इसी प्रकार ₹40,000 करोड़ के इस्पात निवेश और अन्य औद्योगिक परियोजनाओं को लेकर भी सरकार को स्पष्ट करना चाहिए कि इनमें कितनी परियोजनाएँ बिल्कुल नई हैं और कितनी पहले से प्रस्तावित विस्तार योजनाएँ हैं। हर बड़े निवेश के साथ सार्वजनिक रूप से यह भी बताया जाना चाहिए कि निर्माण कब शुरू होगा, उत्पादन कब होगा और स्थानीय युवाओं के लिए कितने रोजगार सृजित होंगे।
गूगल के साथ एआई प्रशिक्षण का समझौता भविष्य की दृष्टि से स्वागतयोग्य है। लेकिन झारखंड की डिजिटल वास्तविकता भी सामने है। अनेक सरकारी विद्यालयों में आज भी इंटरनेट, कंप्यूटर और प्रशिक्षित शिक्षकों की कमी है। ऐसे में केवल एआई का नारा पर्याप्त नहीं होगा; डिजिटल आधारभूत संरचना को समान गति से मजबूत करना होगा।
मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने ‘माइंस से माइंड्स’ की बात कही है। यह आकर्षक नारा है लेकिन इसे वास्तविक नीति में बदलना आसान नहीं होगा। झारखंड ने दशकों तक देश को खनिज दिए हैं, परंतु बदले में उसे अपेक्षित औद्योगिक समृद्धि, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, बेहतर स्वास्थ्य सेवाएँ और बड़े पैमाने पर रोजगार नहीं मिल सके। यदि इस बार भी निवेश केवल खनिज-आधारित उद्योगों तक सीमित रह गया, तो राज्य की आर्थिक संरचना में बहुत बड़ा परिवर्तन नहीं आएगा।
एक और महत्वपूर्ण प्रश्न स्थानीय भागीदारी का है। आदिवासी उद्यमियों के लिए औद्योगिक भूमि में अधिक अवसर देने का विचार स्वागतयोग्य है। लेकिन इससे भी आगे बढ़कर यह सुनिश्चित करना होगा कि उद्योगों में स्थानीय लोगों को रोजगार, कौशल प्रशिक्षण और आपूर्ति श्रृंखला में भागीदारी मिले। विकास तभी टिकाऊ होगा जब स्थानीय समाज उसे अपना विकास माने, न कि केवल बाहरी पूंजी का विस्तार।
सरकार यदि वास्तव में निवेश को लेकर गंभीर है, तो उसे हर परियोजना का सार्वजनिक प्रगति-पत्र (Project Dashboard) जारी करना चाहिए। किस परियोजना को भूमि मिली? किसे पर्यावरणीय मंजूरी मिली? किसका निर्माण शुरू हुआ? किसने उत्पादन प्रारंभ किया? कितने रोजगार बने? ऐसी जानकारी नियमित रूप से सार्वजनिक होनी चाहिए। इससे निवेशकों का विश्वास भी बढ़ेगा और जनता का भी।
झारखंड को निवेश की आवश्यकता है, इसमें कोई विवाद नहीं। लेकिन झारखंड को उससे भी अधिक आवश्यकता घोषणाओं की नहीं, क्रियान्वयन की संस्कृति की है। निवेश सम्मेलन एक दिन की घटना है, जबकि उद्योग दशकों की प्रक्रिया है।
इसलिए इस बार जनता का स्वागत भी होना चाहिए और उसका संशय भी। तालियाँ बजाने में कोई हर्ज नहीं, लेकिन ताली के साथ सवाल भी होने चाहिए। क्योंकि लोकतंत्र में सबसे अच्छा निवेश वही होता है, जिसका लाभ आँकड़ों में नहीं, बल्कि लोगों के जीवन में दिखाई दे।
झारखंड अब एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहाँ उसे एमओयू की राजनीति से आगे बढ़कर परिणामों की राजनीति करनी होगी। यदि ऐसा हुआ, तो यह निवेश राज्य के इतिहास का नया अध्याय लिखेगा। यदि नहीं, तो यह भी उन चमकदार घोषणाओं की सूची में जुड़ जाएगा, जिन्हें समय की धूल ने ढँक दिया।
