दीनी और आधुनिक शिक्षा से ही मुसलमान बनेंगे मजबूत, मदरसों के पाठ्यक्रम में वैज्ञानिकता जरूरी

दीनी और आधुनिक शिक्षा से ही मुसलमान बनेंगे मजबूत, मदरसों के पाठ्यक्रम में वैज्ञानिकता जरूरी


राजनी राणा


औपचारिक शिक्षा की बात करें तो भारत की मुस्लिम आबादी अपने गैर-मुस्लिम समकक्षों से पीछे है। महिलाओं की शिक्षा के मामले में और खराब स्थिति है। उच्च शिक्षा में यह अनुपातिक अंतर और भी बढ़ जाता है। यद्यपि वे भारत की जनसंख्या का लगभग 13 प्रतिशत हैं, प्राथमिक विद्यालय स्तर (कक्षा 1-5) में उनकी नामांकन दर 2006 के कुल नामांकन आंकड़ों का मात्र 9.39 प्रतिशत थी। हालाँकि, जब इस आंकडे की तुलना उन लोगों से की जाती है, जो इसी अवधि के लिए मदरसों में नामांकित थे, तो प्रतिशत बहुत अधिक है।

यह विषय बेहद गंभीर है और इसपर गंभीरता से विचार करने की जरूर है। मदरसा भारत के शैक्षिक ढांचे का अभिन्न अंग है, जिसमें भारत में 90 प्रतिशत से अधिक मदरसा छात्र गरीब परिवारों से संबंधित हैं। गरीब मुस्लिम छात्र मदरसों को क्यों चुनते हैं और औपचारिक शिक्षा प्रणाली की तुलना में मदरसों में इतनी बड़ी संख्या में नामांकन प्रतिशत के पीछे क्या कारण है? क्या मदरसा शिक्षा प्रणाली में सुधार की आवश्यकता है? दारुल उलूम, नदवा का एक केस स्टडी, उक्त सवालों का जवाब देगा।

दारुल उलूम नदवतुल उलमा और दारुल उलूम देवबंद, ये दो केवल भारत के ही नहीं दुनिया के सबसे बड़े मदरसे हैं, जो वर्तमान में भारत के विभिन्न हिस्सों के हजारों मुस्लिम युवाओं को धार्मिक शिक्षा प्रदान कर रहे हैं। दारुल उलूम नदवतुल उलमा पूर्वी उत्तर प्रदेश और पूर्वी बिहार के अपेक्षाकृत पिछड़े क्षेत्र की जरूरतों को पूरा करता है।

यहां हर साल, बड़ी संख्या में छात्र मदरसा से स्नातक होते हैं और मुसलमानों के सामाजिक हलकों में ‘‘नदवी‘‘ के रूप में जाने जाते हैं। नदवा की शिक्षा प्रणाली के प्रकार और शिक्षा प्रणाली की संरचना पर एक नजर डालने से पता चलता है कि मदरसा पूरी तरह से आध्यात्मिक, धार्मिक शिक्षा प्रदान करने के लिए समर्पित है और वैज्ञानिक, औपचारिक शिक्षा का यहां गंभीर अभाव है। नदवतुल उलमा में आलिम, शरिया पाठ्यक्रम मोटे तौर पर अरबी भाषा, हदीस और उसके उसूल (मूल्य), फिक्ह और उसके उसूल, कुरान और तफसीर और उसके उसूल के अनुवाद से संबंधित है।

यद्यपि पाठ्यक्रम में अंग्रेजी को शामिल किया गया है और छात्रों में इसके प्रति उत्साह भी है परतुं, धार्मिक शिक्षा प्रणाली के साथ-साथ आधुनिक शिक्षा जैसे विज्ञान, गणित, दर्शन और भी बहुत कुछ शामिल करने के लिए काम करने की आवश्यकता है। इससे न केवल उन्हें नौकरी मिलने में मदद मिलेगी बल्कि उन्हें आधुनिक समाज के साथ तालमेल बिठाने में भी मदद मिलेगी।

नदवा आने वाले छात्रों की वित्तीय पृष्ठभूमि के विश्लेषण से पता चलता है कि उच्च वर्ग के मुसलमान, संपन्न मुसलमान अपने बच्चों को मदरसा भेजना और अपने बच्चों को स्कूल और कॉलेजों में दाखिला दिलाना पसंद नहीं करते हैं। नदवा आने वाले ज्यादातर छोटे किसान, मजदूर, हस्तशिल्पकारों आदि का प्रतिनिधित्व करने वाले पिछड़े परिवारों के होते हैं। वे अपने मूल स्थान पर बेहतर शिक्षा के सीमित विकल्प के के कारण बिहार, झारखंड, असम, पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश के दूरदराज के गांवों से आते हैं।

नदवतुल उलूम का मामला स्पष्ट रूप से दो महत्वपूर्ण पहलुओं की ओर इशारा करता है। सबसे पहले, संसाधनों की कमी, गरीब पृष्ठभूमि के बहुत से मुस्लिम युवाओं को मदरसा शिक्षा प्रणाली में शामिल होने पर मजबूर होना पड़ता है। दूसरा, मदरसा पाठ्यक्रम में औपचारिक, वैज्ञानिक एवं आधुनिक शिक्षा प्रणाली का सर्वथा अभाव होता है।

पहली समस्या का समाधान मुस्लिम आबादी वाले पिछड़े क्षेत्रों में अधिक सरकारी वित्त पोषित स्कूल खोलकर और वैज्ञानिक शिक्षा प्रणाली को बढ़ावा देकर समाधान किया जा सकता है। साथ ही इसके लाभों के बारे में मुस्लिम आबादी के बीच जागरूकता पैदा करके समाज में शिक्षा का उचित महत्व समझाया जा सकता है। दूसरी समस्या का समाधान मदरसा शिक्षा प्रणाली को विनियमित करके और मदरसों के लिए औपचारिक वैज्ञानिक शिक्षा को अपने पाठ्यक्रम में शामिल करके किया जा सकता सकता है। मदरसों में संसाधनों की कमी को वित्तीय प्रोत्साहन प्रदान करके और मदरसों में वैज्ञानिक शिक्षा को बढ़ावा देने की आवश्यकता के बारे में संपन्न मुसलमानों के बीच जागरूकता पैदा करके इस दिशा में बड़ी उपलब्धि हासिल की जा सकती है।

इस्लाम के कई विद्वानों का मानना है कि दीनी शिक्षा के साथ ही साथ आधुनिक शिक्षा बेहद जरूरती है। आधुनिक शिक्षा के माध्यम से ही इस्लाम का दुनिया के कोणे-कोणें में प्रचार हुआ है। आॅटोमन साम्राज्य हो या फिर बगदा, दोनों में विज्ञान और आधुनिक ज्ञान का इतना व्यापक आधार था कि उस समय की दुनिया का वे नेतृत्व करते थे। केवल दीनी शिक्षा से ही आसन्न एवं दैनिक चुनौतियों का सामना नहीं किया जा सकता है। इसके लिए आधुनिक शिक्षा का होना बेहद जरूरती है।

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