आधुनिक संसार का हर व्यक्ति ओवरलोडेड है, ‘‘आइए, बोझ को हल्का करें’’

आधुनिक संसार का हर व्यक्ति ओवरलोडेड है, ‘‘आइए, बोझ को हल्का करें’’

प्रेम रावत जी

सभी मनुष्य इस संसार के अंदर ओवरलोड हो रखे हैं। जब मनुष्य ओवरलोड होता है, जब बोझ ज्यादा हो जाता है तो दुख होता है। जब इतना वजन पड़ने लगता है इन कंधों पर, इस गरदन पर, जो सहा नहीं जा सकता तो फिर दुख होता है। सबके साथ यही हाल है।

एक कहानी है। एक आदमी था। वह अपने घर से बहुत परेशान हो गया। उसके घर में इतना सारा समान था कि पैर रखने की भी जगह नहीं थी। एक दिन वह अपनी समस्या लेकर गांव के एक विद्वान आदमी के पास गया। उसने कहा कि ‘‘मेरा बहुत ही सुन्दर और बड़ा घर है। परन्तु अब ऐसा हो गया है कि उस घर में पैर रखने की भी जगह नहीं बची है।’’

विद्वान आदमी ने उससे पूछा कि ‘‘घर के बाहर और कुछ है तुम्हारे पास ?’’
तो उसने कहा, ‘‘हां! कुछ बत्तख पाल रखी हैं, वो बाहर रहती हैं।’’
उन्होंने कहा, ‘‘उनको अपने घर के अंदर ले आओ!’’

तो वह बत्तख को अपने घर के अंदर ले आया। हफ्ते भर के बाद वह गया और कहा ‘‘जी! अब तो और भी काम खराब हो गया। पहले तो थोड़ी-बहुत जगह मिल जाती थी पैर रखने के लिए, अब वो भी नहीं मिल रही है। जो थोड़ी-सी जगह बची थी, वो बत्तखों ने ले ली।’’

तो कहा, ‘‘और कुछ है तुम्हारे पास ?’’
कहा, ‘‘हां! कुछ बकरियां हैं!’’
कहा, ‘‘उनको भी अंदर कर दो और हफ्ते के बाद मेरे पास आना।’’

एक हफ्ते बाद वह फिर वापिस आया। कहा, ‘‘जी! अब तो और भी बुरी हालत हो गयी है। अब तो घर में सांस लेने की भी जगह नहीं हो रही है।’’

कहा, ‘‘और कुछ है तुम्हारे पास ?’’
कहा, ‘‘हां! दो-तीन गाय हैं।’’
कहा, ‘‘उनको भी अंदर कर दो और हफ्ते बाद फिर आना।’’

एक हफ्ते बाद वह वापिस आया और बहुत ही गुस्से में उसने कहा कि ‘‘जी! आप कैसे बुद्धिमान आदमी हो! मेरे घर में थोड़ी-बहुत जगह थी और मैं आपके पास मदद मांगने के लिए आया था पर आपने तो मेरे घर की और भी बुरी हालत कर दी!’’

विद्वान व्यक्ति ने कहा, ‘‘अब वो जितने भी बत्तखें हैं, जितनी बकरियां हैं, जितनी गायें हैं, उन सबको बाहर कर दो और फिर मेरे पास आना।’’

उसने अपने घर से सारी बत्तखें, सारी बकरियां और गाय को घर से बाहर कर दिया। दूसरे दिन वह खुशी-खुशी वापिस आया और विद्वान व्यक्ति से कहा कि “अब तो मेरे घर में इतनी जगह हो गई है कि पूछिए मत!“

तो बदला कुछ नहीं। ये नहीं कि उन्होंने कुछ ये कर दिया या वो कर दिया। हमारे साथ भी यही हाल होता है। हम जहां जाते हैं, बोझ लेकर चलते हैं। और ऐसी-ऐसी चीजों का बोझ, जिनका कोई तुक नहीं है। बोझ को हल्का करें और आगे चलें! नई चीजों को देखें! इस जिंदगी में देखने के लिए बहुत-कुछ है। वो रास्ता बाहर नहीं जा रहा है, वो रास्ता अंदर जा रहा है। और अंदर सुकून है।

मनुष्य की स्वतंत्रता उसकी संतुष्टि से है, जब मनुष्य के अंदर स्वतंत्रता होती है तो वह उसके चेहरे पर प्रगट होती है। जब हम एक बच्चे को देखते हैं तो वह प्यारा लगता है। वह प्यारा और सुंदर क्यों लगता है क्यांेकि उस बच्चे की सुंदरता उसकी संतुष्टि में है और अभी संसार का बोझ उसके कन्धों पर नहीं पड़ा है, अभी उसके चेहरे पर स्वतंत्रता झलक रही है और वह स्वतंत्रता अंदर से आती है।

एक छोटी-सी कहानी है। एक नौजवान लड़का था। वह ग्रेजुएट होकर अपने घर की तरफ जा रहा था। उसने देखा, एक बहुत ही वृद्ध आदमी जा रहा था, उसके कंधे पर लकड़ियों का बहुत बड़ा बोझ था। बोझ से उसकी गरदन नीचे झुक रही थी। तो उस लड़के ने वृद्ध आदमी को देख करके सोचा कि इनसे कुछ शिक्षा प्राप्त कर लेना चाहिए। तो वह वृद्ध आदमी के पास गया और उसने कहा कि ‘‘बाबा! आप अपने जीवन को काफी सालों से जी रहे हैं और मैं अपने जीवन की एक नई शुरुआत करने जा रहा हूं। क्या आप मुझे कोई शिक्षा दे सकते हंै ? क्या कोई ऐसी चीज है, जिससे मैं इस संसार में कुछ अच्छा काम कर सकूं ?’’

तो वह वृद्ध आदमी जो झुका हुआ था, वह रुका और उसने अपने बोझ को नीचे रखा फिर सीधा खड़ा हो गया। उसने उस लड़के की तरफ देखा और फिर उसने अपने कंधे पर बोझ उठाया, झुका और फिर चला गया।

अर्थात वह वृद्ध आदमी यह कह रहा था कि ये जो बोझ हम अपने कंधों पर रखते हैं, ये सांसारिक बोझ हमारा बनाया हुआ है। इस बोझ को नीचे रखें तो हम भी खड़े हो सकते हैं। और यदि इस बोझ को लेकर के चलेंगे तो सारी जिंदगी हमें झुक करके चलना पड़ेगा। और यह जानते हुए भी कि बोझ को नीचे रखने से सब ठीक हो जाएगा, फिर भी हम उस बोझ को अपने कंधों पर रख करके चलते रहते हैं।

अगर मनुष्य अपनी समस्याओं के बोझ से, संशयों के बोझ से लदा हुआ है और बाहर से स्वतंत्र होने का कितना भी दिखावा करे, परन्तु उसके चेहरे पर वह बात झलकेगी नहीं। जब मनुष्य अपने जीवन में अन्य सारी चीजों को भूलकर उस सुंदरता, उस स्वतंत्रता को, उस शांति को स्वीकार करने लगेगा तब उसकी जो रोशनी है, उसकी जो चमक है वह चेहरे पर प्रगट होती है।

(नोट: प्रेम रावत, जिन्हें शांतिदूत के रूप में भी जाना जाता है, उन्होंने शांति के बारे में चर्चा करना तभी से शुरू कर दिया था जब वे मात्र 4 वर्ष के थे। तब से उन्होंने शांति के अपने सरल सन्देश से विश्व भर में लाखों लोगों को प्रेरित किया है। उनका संदेश दुनिया भर के लोगों को आत्म-खोज के एक अनूठे अवसर की ओर प्रेरित करता है। उनके संदेश के संबंध में अधिक जानकारी वेबसाइट www.premrawat.com द्वारा प्राप्त की जा सकती है।)

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