चिंतन/ हिन्दू दर्शन में चार पुरूषार्था, धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष

चिंतन/ हिन्दू दर्शन में चार पुरूषार्था, धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष

अरविंद मिश्रा

धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष हिन्दू दर्शन के चार बड़े पुरुषार्थ हैं। मतलब मनुष्य इन्हंे प्राप्त कर ही खुद को साबित कर सकता है, मनुष्य होने को सार्थक बना सकता है। इसमें से किसी एक अथवा एकाधिक संयोगांे को प्राप्त करना भी मनुष्य होने की सार्थकता नहीं है। और इन सभी की प्राप्ति का भी एक संतुलन होना चाहिए।

अगर केवल धर्म ही साध्य रहा या फिर अर्थार्जन ही ध्येय हो रहा या फिर केवल काम ही प्रभावी बनी रहा तो जो अन्तिम प्राप्य मोक्ष है, नहीं मिलने वाला जबकि मोक्ष को मानव का सर्वोच्च प्राप्य माना गया है। हलांकि राजा भरत सभी को नकारते हुये कहते हैं कि धर्म न अर्थ न काम रुचि गति न चहऊं निर्वान, जनम-जनम रति राम पद यह बरदानु न आन। उन्हंे श्रीराम का चरणानुराग सबसे प्रिय है और मोक्ष पाकर वह सुख वे खोना नहीं चाहते।

यह भी है कि मोक्ष तक पहुंचने की सीढि़यां हैं धर्म, अर्थ और काम जो कि प्राथमिकता के क्रम में है मगर सभी की प्राप्ति एक मर्यादित सीमा में हो, तभी दूसरी सीढ़ी पर पदावतरण संभव है। धर्माधिक्य आपको धनार्जन से विमुख कर देगा और धनाधिक्य आपको अतिशय कामुक बनायेगा और अतिशय कामुकता आपको मोक्षमार्ग से च्युत कर देगी अर्थात सभी का एक समीचीन संयोग ही अपेक्षित है। अति सर्वत्रा वर्जयेत।

धर्म और अर्थ के अर्जन को तो फिर भी विवेक से मर्यादित किया जा सकता है मगर कामोन्मुखता पर अंकुश सबसे कठिन है। गीता में श्रीकृष्ण भी अर्जुन को चेताते हैं कि यह मन बड़ा पापी है। मन पर अंकुश कड़े अभ्यास से ही संभव है। संत तुलसीदास तो इसी ‘काम‘ से इतने आतंकित रहे कि स्वयं को प्रभु श्रीराम के चरणों में सम्पूर्णता से समर्पित कर दिया। वे कहते भी हैं कि काम वासना से कौन बच पाया है? नारी के नेत्रों ने भला किसको घायल नहीं किया। उन्होने आगाह किया कि दीपशिखा सम युवति तन मन जन होऊ पतंग।

गांधी जी सत्य के प्रयोगों को स्वीकारने के नैतिक साहस और साफगोई के बावजूद भी काम नियंत्राण के अपने प्रयासों में असफल दिखते हैं। ऐसा जिक्र उनकी आत्मकथा में है अर्थात मोक्ष की राह में सबसे बड़ी बाधा यही काम विह्वलता ही है। तुलसी ने इसके शमन के लिये भक्ति की राह चुन ली और सिफारिश की कि काम से बचने का बस एकमात्रा कारगर उपाय यही है। वे तर्क देते हैं कि काम रुपी माया और श्रीराम की भक्ति दोनों स्त्राी स्वरुपा हैं और इसलिये दोनों में स्वाभाविक डाह है – नारि न मोहे नारि के रुपा।

तुलसी ने ज्ञान विज्ञान को पुरुष रुप कहा है। मतलब एक चुटकी ली है ज्ञानियों विज्ञानियों की कि तुम स्त्राी रुपी काम के सहज वशीभूत हो रहोगे क्योंकि यहां स्त्राी पुरुष का स्वाभाविक आकर्षण है यानी प्रकारान्तर से कामभ्रष्ट ज्ञानियों को मोक्ष नहीं मिलने वाला है। भक्ति ही मोक्ष प्राप्ति का सहारा है।

काम सचमुच व्यथित करने वाला है। कितने विद्वानों की जिन्दगी इसने तबाह कर रखी है। मी टू की चपेट में कितने ही दिग्गज धराशायी हुये दिखते हैं। जो यह कहता है कि वह कामजेता है, वह नारद सा धोखे में है। काम प्रहार से संलिप्त हुये शंकर को भी अपना तीसरा नेत्रा खोलना पड़ता है।

मगर एक मार्ग है। इस अजस्त्रा काम ऊर्जा को डाइवर्ट किया जा सकता है दूसरे बड़े सृजनात्मक काम में। जैसे तुलसी रामकथा के प्रणयन में आजीवन संलिप्त हो गये। ऐसे ही अनेक कलात्मक कार्यों में कामेच्छा को चैनेलाइज कर इसे शमित किया जा सकता है। यह एक अनुभूत आजमूदा नुस्खा है अन्यथा काम प्रहार से बच पाना असंभव ही है अगर आप सही अर्थों में पुरुष हैं। और काम को जीते बिना मोक्ष संभव नहीं।

(उर्वशी)

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