हरमूज से सिलिकॉन वैली तक : क्या ईरान के साथ टकराव से बदलने लगा है वैश्विक कूटनीतिक संतुलन?

हरमूज से सिलिकॉन वैली तक : क्या ईरान के साथ टकराव से बदलने लगा है वैश्विक कूटनीतिक संतुलन?

दुनिया की राजनीति में अक्सर ऐसे क्षण आते हैं जब किसी एक निर्णय का असर केवल युद्धक्षेत्र तक सीमित नहीं रहता, बल्कि वह पूरी वैश्विक व्यवस्था को प्रभावित कर देता है। हाल के समय में चीनी शिक्षाविद प्रोफेसर जियांग की कुछ भविष्यवाणियाँ सोशल मीडिया पर तेजी से चर्चा का विषय बनी हुई हैं। इस शिक्षाविद की चर्चा खुब हो रही है। चर्चा होना स्वाभाविक भी है क्योंकि उन्होंने कुछ ऐसे विश्लेषण प्रस्तुत किए हैं, जो सचमुच में कमाल के हैं। उनका दावा है कि 2024 के बाद की दुनिया वैसी नहीं रहेगी जैसी हम आज देखते हैं। उनके अनुसार, यह केवल मिसाइलों और हथियारों की जंग नहीं होगी, बल्कि पानी, भोजन, ऊर्जा और वैश्विक पूँजी के प्रवाह से जुड़ी एक व्यापक भू-राजनीतिक लड़ाई होगी।

प्रोफेसर जियांग ने तीन प्रमुख भविष्यवाणियाँ की थीं-पहली, डोनाल्ड ट्रंप चुनाव जीतेंगे; दूसरी, ट्रंप ईरान पर हमला करेंगे और तीसरी, अंततः यह युद्ध अमेरिका के लिए रणनीतिक हार में बदल जाएगा। इन भविष्यवाणियों को लेकर भले ही अलग-अलग मत हों, लेकिन उनका विश्लेषण जिस भू-राजनीतिक परिदृश्य की ओर इशारा करता है, वह आज की दुनिया की कमजोर नसों को उजागर करता है। तो आइए आज हम चीनी विश्लेषक की भविष्यवानी पर थोड़ी चर्चा करते हैं।

जियांग के अनुसार, यदि अमेरिका और ईरान के बीच टकराव बढ़ता है तो ईरान सीधे पारंपरिक युद्ध में उलझने के बजाय “असिमेट्रिक वॉरफेयर” यानी असमान युद्ध रणनीति अपनाएगा। इसका सबसे बड़ा केंद्र होगा हरमूज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz)। दुनिया के लगभग एक-तिहाई समुद्री तेल व्यापार का रास्ता इसी संकरे समुद्री मार्ग से होकर गुजरता है। यदि ईरान इस मार्ग को बंद कर देता है, या जहाजों की आवाजाही बाधित करता है, तो वैश्विक तेल आपूर्ति पर तत्काल प्रभाव पड़ सकता है। तेल की कीमतों में उछाल केवल ऊर्जा क्षेत्र को नहीं, बल्कि पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था को बुरी तरह से प्रभावित करेगा।

जियांग का तर्क है कि खाड़ी क्षेत्र की सबसे बड़ी कमजोरी पानी है। सऊदी अरब, यूएई, कतर और अन्य खाड़ी देश बड़े पैमाने पर डिसेलिनेशन प्लांट्स पर निर्भर हैं, जो समुद्री पानी को पीने योग्य बनाते हैं। यदि इन संयंत्रों को सस्ते ड्रोन या मिसाइलों से निशाना बनाया जाता है, तो कुछ ही दिनों में मध्य पूरव के अधिकतर देशों में पानी का संकट पैदा हो सकता है। रेगिस्तानी भूगोल वाले इन देशों के पास प्राकृतिक मीठे पानी के स्रोत बहुत सीमित हैं। ऐसे में पानी की आपूर्ति बाधित होना सामाजिक और आर्थिक संकट को जन्म दे सकता है।

खाड़ी देशों का लगभग 70-80 प्रतिशत भोजन आयात पर निर्भर माना जाता है। यदि समुद्री मार्ग बाधित होते हैं, तो खाद्य आपूर्ति भी प्रभावित हो सकती है। यह स्थिति केवल आर्थिक समस्या नहीं बल्कि मानवीय संकट का रूप ले सकती है। जियांग के अनुसार, यदि ऊर्जा, पानी और भोजनकृइन तीनों पर एक साथ दबाव पड़ता है, तो खाड़ी देशों की स्थिरता पर गंभीर असर पड़ सकता है।

प्रोफेसर जियांग की सबसे विवादास्पद लेकिन चर्चित बात आर्थिक मोर्चे से जुड़ी है। उनका कहना है कि खाड़ी देशों का बड़ा निवेश अमेरिकी टेक और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस उद्योग में जा रहा है। यदि युद्ध या क्षेत्रीय अस्थिरता के कारण यह निवेश रुकता है, तो अमेरिकी टेक सेक्टर पर दबाव बढ़ सकता है। उनका तर्क है कि वर्तमान तकनीकी उछाल-विशेष रूप से AI क्षेत्र-आंशिक रूप से वैश्विक पूँजी के प्रवाह पर आधारित है। यदि यह प्रवाह अचानक रुकता है, तो टेक सेक्टर में “बबल” जैसी स्थिति उजागर हो सकती है।

हालांकि कई अर्थशास्त्री इस विचार से सहमत नहीं हैं और मानते हैं कि अमेरिकी अर्थव्यवस्था कहीं अधिक मजबूत है। फिर भी यह बहस इस बात को उजागर करती है कि वैश्विक पूँजी और तकनीकी उद्योग के बीच संबंध कितना गहरा है।

ईरान लंबे समय से “असिमेट्रिक वॉरफेयर” की रणनीति अपनाता रहा है। इसमें अपेक्षाकृत सस्ते ड्रोन, मिसाइल और समुद्री रणनीतियों का उपयोग करके महंगे सैन्य सिस्टम को चुनौती दी जाती है। इस तरह के युद्ध में उद्देश्य प्रत्यक्ष जीत नहीं बल्कि विरोधी की लागत और दबाव को बढ़ाना होता है। जियांग का मानना है कि यही रणनीति अमेरिका और उसके सहयोगियों को लंबे समय तक उलझाए रख सकती है।

प्रोफेसर जियांग का निष्कर्ष यह है कि यदि ऐसी परिस्थितियाँ बनती हैं, तो यह केवल एक क्षेत्रीय संघर्ष नहीं रहेगा। ऊर्जा आपूर्ति, वैश्विक निवेश, तकनीकी उद्योग और खाद्य सुरक्षाकृइन सभी पर प्रभाव पड़ सकता है।

हालांकि यह स्पष्ट करना भी जरूरी है कि ये भविष्यवाणियाँ एक विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण हैं, न कि निश्चित भविष्य। अंतरराष्ट्रीय राजनीति में कई ऐसे कारक होते हैं जो किसी भी अनुमान को बदल सकते हैं-कूटनीति, गठबंधन, आर्थिक नीतियाँ और वैश्विक बाज़ार की प्रतिक्रिया। फिर भी जियांग की चेतावनी एक महत्वपूर्ण सवाल उठाती है, क्या आधुनिक दुनिया की शक्ति केवल सैन्य क्षमता से तय होगी, या पानी, भोजन, ऊर्जा और पूँजी जैसे संसाधन ही भविष्य के असली हथियार बनेंगे?

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Translate »