जगदीश ओटवाल
पश्चिमी देशों में चुम्बन खुले आम लिया जाता है। खुलेआम स्त्री -पुरूष चुम्बन पर नाराज नहीं हुआ जाता। वस्तुतः स्त्री के चुम्बन हमारे देश में भी लिए जाते हैं पर यहां खुलेआम स्त्री का चुम्बन लेने में आम व्यक्ति झिझक महसूस करता है।
खुलेआम स्त्री चुम्बन को हमारे देश में अश्लीलता समझा गया है जबकि वैचारिक स्वतंत्राता के लिए इसका लिया और दिया जाना जरूरी है, इसलिए कि बुरे-से-बुरे व्यक्ति में यदि लेशमात्र भी स्त्री के प्रति दुर्भावना है तो वह चुम्बन ले लेने से आसानी से दूर हो सकती है और कुछ क्षणों पश्चात ही दुर्भावनाग्रस्त व्यक्ति स्त्री से सद्व्यवहार करने लग सकता है।
उदाहरणार्थ यदि कोई कम वस्त्र पहने युवती उत्तेजक मुद्रा में किसी से मिलती है तो स्वाभाविक है उससे भेंट करने वाला नवयुवक उसे सम्पूर्ण निहारे बिना नहीं रह सकेगा, कमोबेश वह उसे छू लेने की तमन्ना अवश्य करेगा। यदि नवयुवती हैलो-हाय करके निकल जाती है तो पुरूष की तमन्ना दबी रह जायेगी और वह पुनः मिलने को तड़प उठेगा। दुबारा भी जब यही स्थिति रहेगी तो पुरूष उसे जबरदस्ती छूने का यत्न करेगा। तब सहमति-असहमति में दोनों में टकराव होगा और अश्लीलता का एक और उदाहरण प्रस्तुत होगा।
चुम्बन लेने-देने का संस्कार हमारे देश में भी अगर सरेआम हो जाये तो लोगों के दिलों में नैतिक भावनाएं जागृत होंगी। स्त्री के प्रति आदर-सम्मान बढ़ सकता है। समाज में यह प्रारम्भिक और नया प्रयोग हो सकता है।
कुछ लोग शुरूआत में इसे हमारे संस्कारों के प्रतिकूल अवश्य समझेंगे। उनकी समझ उचित हो सकती है क्योंकि ये संस्कार विश्व में पूजी जाने वाली हमारी सभ्यता संस्कृति के अनुकूल नहीं है पर यह भी महत्त्वपूर्ण है कि समाज में समय के साथ बदलाव आये और नये सामाजिक परिवर्तन होते रहें। इन्हीं नवीनताओं से संतुलित समाज की संकल्पना और शालीनताएं उजागर हो सकती हैं। अपराध भावना पर नियंत्रण भी हो सकता है।
भारत का एक बहुत बड़ा वर्ग पश्चिमी क्रियाकलापों में विश्वास रखता है। उनका मानना है कि आधुनिकता और स्वच्छंदता में विकास छिपा है। उनकी मान्यता सच प्रतीत होती है, कारण कि मानव सभ्यता का विकास नवीन अनुसंधानों के रहते फला-फूला है। मानव जहां पत्थर की रगड़ से अग्नि पैदा करता और वृक्षों की छाल से तन ढांपता था, वहीं हमने नवीन प्रयोगों को स्वीकारा, तभी चहुंमुखी विकास संभव हुआ किंतु इस सबके बावजूद भी कहीं न कहीं हमारी स्वच्छंदताओं पर प्रतिबन्ध लगाया गया है।
सिरों पर असंख्य कानूनों के फंदे बांध दिये गये हैं। स्त्री सुरक्षा के लिए ये फंदे आवश्यक हैं पर देश की स्त्रियां अभी भी सरेआम पति को भी चुम्बन देने में लज्जा महसूस करती हैं। वे स्वच्छंदता के लिए तैयार नहीं हैं। जब हमारा विकास नवीन संस्कारों में और स्वच्छंदताओं में छिपा है तो ऐसी शर्म और लज्जा का पर्दा क्यों है? हमारे कानून स्वच्छंदता की इजाजत क्यों नहीं देते?
(उर्वशी)
