गौतम चौधरी
आज हम कुछ ऐसे विवादित विषय पर चर्चा करने वाले हैं, जिसके कारण नाहक दुनिया आतंकवाद की चपेट में आ गयी है। आतंकवाद को जब हम परिभाषित करते हैं तो हमें सतर्क रहना होता है। इसके लिए कोई सर्वमान्य परिभाषा नहीं है, हर सल्तनत अपने तरीके से आतंकवाद को परिभाषित करता रहा है। इधर के दिनों में इस्लाम के पवित्र ग्रंथ कुरान की व्याख्या यानी तफ़्सीर को लेकर कई धरे खड़े हो गए हैं। हालांकि हर धरों में लगभग एक जैसी ही व्याख्या है लेकिन आधुनिक युग में कुछ ऐसे भी समूह हैं, जो साम्राज्यवादी ताकतों को सहयोग कर रहे हैं और इस्लाम को चरमपंथ की ओर ढ़केलने की कोशिश कर रहे हैं। मसलन, तफ्सीर एक अरबी शब्द है। आम तौर पर क़ुरान के व्याख्या के लिए इसका प्रयोग किया जाता है। हिंदी में तफ़्सीर का अर्थ टीका या फिर भाष्य हो सकता है। तफ़्सीर के लेखक को ‘मुफ़स्सिर’ कहते हैं। तफ़्सीर, अक्सर क़ुरान को अच्छी तरह समझाने के लिये इस्तेमाल किया जाता है। मतलब, छंद, विचार, तात्पर्य, अर्थ, हेतु, वगैरा को समझाने के लिये तफ़्सीर का प्रयोग किया जाता है। अब तफ्सीर के माध्यम से कुरान की मनोनुकूल व्याख्या करने वाले समूह इसका उपयोग आतंकवाद को बढ़ावा देने के लिए भी करने लगे हैं।
इस्लाम का पवित्र ग्रंथ, क़ुरान शरीफ़, कई भागों में विभाजित है। कुरान मजीद में कुल 114 सूरहें, लगभग 6,236 आयतें, 30 पारे और 7 मंज़िलें हैं। यह ग्रंथ 23 वर्षों में हज़रत मुहम्मद (स.अ.व.) पर नाज़िल हुआ। क़ुरान की सूरहें मक्का और मदीना दोनों स्थानों पर नाज़िल हुईं – मक्की सूरहें आमतौर पर ईमान, तौहीद और सब्र पर केन्द्रित होत है, जबकि मदनी सूरहें सामाजिक नियम, शरीयत और मुस्लिम समुदाय के कायदे-कानूनों से जुड़ी है। पवित्र ग्रंथ का 47ः4 श्लोक बेहद महत्व का है। यह ईमान वालों को निर्देशित करता है, “तो जब तुम अविश्वासियों से (युद्ध में) भिड़ो, तो गर्दनों पर वार करो, यहाँ तक कि जब उन्हें पूरी तरह परास्त कर लो तो उन्हें मज़बूती से बाँध लो। फिर उसके बाद या तो उन्हें एहसान के साथ रिहा कर दो या फ़िदया लेकर छोड़ दो, यहाँ तक कि युद्ध अपने बोझ उतार दे।’’ चरंपंथी इसी प्रकार के आयतों को अपने तरीके से व्याख्यायित करते हैं। कट्टरपंथी जिस वाक्यांश को अलग कर देते हैं वह है -“गर्दनों पर वार करो।” इसे उसके ऐतिहासिक, भाषाई और कानूनी संदर्भ से काटकर नागरिकों, अल्पसंख्यकों, पत्रकारों और निर्दाेष गैर-मुस्लिमों पर लागू कर दिया जाता है। यह व्याख्या नहीं है-यह विचारधारात्मक हिंसा है जिसे धर्मग्रंथ का आवरण पहना दिया जाता है।
इस मामले में बरेलवी संप्रदाय के इस्लामिक विद्वान मुफ्ती तुफैल खान ‘कादरी साहब बताते हैं, ‘‘यह आयत सामान्य सामाजिक संबंधों के बारे में नहीं, बल्कि सशस्त्र संघर्ष के बारे में है। यह उस समय उतरी जब मदीना की प्रारंभिक मुस्लिम समुदाय और मक्का के क़ुरैश के बीच सक्रिय युद्ध चल रहा था-वे लोग जिन्होंने मुसलमानों को सताया, निकाला और उनसे युद्ध किया।’’ इस्लामिक पवित्र ग्रंथ के प्रसिद्ध व्याख्याकार इब्न कासिर लिखते हैं कि यह “जब तुम उनसे युद्ध में मिलो” (इज़ा लक़ीतुमूहुम फ़ी अल-किताल) के संदर्भ में है।’’ वैसे क़ुरानी भाषा में “मिलना” ऐसे प्रसंगों में युद्धभूमि में भिड़ंत का अर्थ देता है। कुछ इस्लामिक विद्वानों का मत है कि क़ुरान स्वयं युद्ध को रक्षात्मक बताता है, “जिनसे युद्ध किया जा रहा है उन्हें अनुमति दी गई है, क्योंकि उन पर अत्याचार हुआ” (22ः39)। इस प्रकार यह धार्मिक विस्तार का आदेश नहीं, बल्कि अन्याय के विरुद्ध युद्ध की अनुमति है।
भाषाई दृष्टि से “फ़-दर्ब अल-रक़ाब” (गर्दनों पर वार करना) शास्त्रीय अरबी का एक युद्धकालीन मुहावरा है, जिसका अर्थ निर्णायक रूप से युद्ध करना है। यह किसी व्यक्ति की हत्या का शाब्दिक आदेश नहीं है। आयत आगे हिंसा को सीमित करती है – जब शत्रु परास्त हो जाएँ तो उन्हें क़ैदी बनाओ, फिर या तो कृपा से रिहा करो या फ़िदया लेकर छोड़ दो-“यहाँ तक कि युद्ध अपने बोझ उतार दे।” इस मामले में तुफैल खान साहब बताते हैं कि ‘‘अगर उद्देश्य केवल अविश्वासियों की हत्या होता, तो आखिर रिहाई का आदेश क्यों दिया जाता?’’
चरमपंथी इस प्रकार के आयतों को बहुत अच्छी तरह समझते हैं लेकिन वे अपने हितों के लिए इसकी आधी-अधूरी व्याख्या करते हैं। इस मामले में वे “गर्दनों पर वार करो” उद्धृत करते हैं, लेकिन “फिर उन्हें कृपा से छोड़ दो या फ़िदया लेकर” और “जब तक युद्ध समाप्त न हो जाए” को नज़रअंदाज़ कर देते हैं। यहाँ हिंसा अस्थायी और नियंत्रित है, स्थायी नहीं है।
इस्लामिक जगत के प्रमुख व्याख्याकार अल-तबरि ने इसे ‘‘युद्ध के नियम बताया’’, न कि धार्मिक संहार। इस्लामिक विद्वान अल-कुरतुबीय साहब ने स्पष्ट किया कि इस आयत ने युद्धबंदियों की हत्या की प्राचीन प्रथा को समाप्त कर दया या फ़िदया का विकल्प दिया-जो आतंकवादी व्यवहार के बिल्कुल विपरीत है।
पैग़ंबर मुहम्मद ﷺ का आचरण इस आयत की जीवित व्याख्या है। बद्र के युद्ध के बाद क़ैदियों के साथ अच्छा व्यवहार किया गया। कुछ को शिक्षा देने के बदले मुक्त किया गया। उन्होंने आदेश दिया- “क़ैदियों के साथ अच्छा व्यवहार करो।” उन्होंने महिलाओं, बच्चों और वृद्धों की हत्या से मना किया। क़ुरान कहता है- “अत्याचार मत करो, अल्लाह अत्याचारियों को पसंद नहीं करता” (2ः190)। “धर्म में कोई बाध्यता नहीं” (2ः256) और जो तुमसे युद्ध नहीं करते, उनके साथ भलाई और न्याय से पेश आने की अनुमति है (60ः8)। ये आयतें स्पष्ट करती हैं कि अविश्वास स्वयं मृत्यु-दंड का कारण नहीं है। सत्य तो यह है कि यह आयत युद्ध को सीमित और मानवीय बनाने के लिए उतरी गयी थी। इसे निजी हिंसा का लाइसेंस बनाना न केवल पाठ का, बल्कि इस्लाम की नैतिक परंपरा के साथ भी विश्वासघात है। त्रासदी यह नहीं कि इस्लाम हिंसक है, बल्कि यह है कि उसकी दया, न्याय और संयम की परंपरा को उन्हीं के नाम पर विकृत किया जा रहा है।
इस प्रकार की व्याख्या साम्राज्यवादी सोच का नतीजा है। यही नहीं इस प्रकार के व्याख्या को आधार बना इस्लाम विरोधी पश्चिमी जमात, मुसलमानों के खिलाफ षड्यंत्र करते रहे हैं। इसलिए इस प्रकार की व्याख्या से इस्लाम को ज्यादा घाटा पहुंचाया गया है। इस मामले में सतर्क रहने की जरूरत है। साथ ही गैर-इस्लामिक लोगों को भी यह समझना होगा कि इस प्रकार की व्याख्या इस्लाम का अंग नहीं है और यह एक षड्यंत्र का हिस्सा है, जो किसी के साथ कभी भी साम्राज्यवादी शक्तियां कर सकती है।
