गौतम चौधरी
देश के अनेक हिस्सों में तापमान के लगातार बढ़ते स्तर ने एक बार फिर चेतावनी की घंटी बजा दी है। भारत मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) द्वारा जारी उष्ण लहर संबंधी परामर्श केवल मौसमी सूचना भर नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य और जीवनशैली से जुड़ा एक गंभीर संकेत है। सवाल यह नहीं है कि गर्मी हर साल पड़ती है; सवाल यह है कि क्या हम हर साल उसके लिए तैयार भी होते हैं?
आईएमडी के दिशा-निर्देश में बताया गया है कि दोपहर के समय धूप से बचना, पर्याप्त पानी पीना, हल्के और ढीले कपड़े पहनना, तथा अत्यधिक श्रम से परहेज, साधारण लग सकते हैं, किंतु इनका पालन ही जीवन और स्वास्थ्य के बीच अंतर तय कर सकता है। विशेष रूप से उन तबकों के लिए, जो खुले में काम करने को विवश हैंकृमजदूर, किसान, रिक्शा चालकक, लू केवल असुविधा नहीं, बल्कि जानलेवा जोखिम है।
दरअसल, लू अब एक अस्थायी मौसमी घटना नहीं रह गई है। जलवायु परिवर्तन के बढ़ते प्रभाव ने इसे अधिक तीव्र और लंबा बना दिया है। शहरों में कंक्रीट का फैलाव, हरित क्षेत्र की कमी और “हीट आइलैंड” प्रभाव ने स्थिति को और गंभीर बना दिया है। ऐसे में यह मान लेना कि कुछ सावधानियों से समस्या हल हो जाएगी, वास्तविकता से आँख मूँदना होगा।
नीतिगत स्तर पर भी प्रश्न कम नहीं हैं। क्या हमारे शहरों में पर्याप्त छायादार सार्वजनिक स्थान हैं? क्या काम के घंटे इस प्रकार तय किए जाते हैं कि श्रमिकों को दोपहर की भीषण गर्मी से बचाया जा सके? क्या प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में लू से निपटने की पर्याप्त व्यवस्था है? इन सवालों के उत्तर अक्सर संतोषजनक नहीं मिलते।
यह भी ध्यान देने योग्य है कि जागरूकता का अभाव समस्या को और बढ़ाता है। कई लोग लू के शुरुआती लक्षण-चक्कर आना, अत्यधिक प्यास, सिरदर्द को नजरअंदाज कर देते हैं, जो आगे चलकर गंभीर स्थिति में बदल सकते हैं। ऐसे में आईएमडी का परामर्श केवल सरकारी दस्तावेज न रहकर जन-जन तक पहुँचना चाहिए।
समाधान बहुस्तरीय होना चाहिए। एक ओर सरकारों को शहरी नियोजन, जल प्रबंधन और स्वास्थ्य ढाँचे को सुदृढ़ करना होगा, वहीं दूसरी ओर समाज और व्यक्ति स्तर पर भी व्यवहार में बदलाव आवश्यक है। स्कूलों के समय में बदलाव, निर्माण कार्यों के लिए समय-सीमा का पुनर्निर्धारण, और सार्वजनिक स्थानों पर पेयजल की उपलब्धता जैसे कदम तत्काल प्रभाव से उठाए जा सकते हैं।
बढ़ती गर्मी हमें यह याद दिलाती है कि प्रकृति के साथ असंतुलन की कीमत चुकानी पड़ती है। लू से बचाव अब केवल व्यक्तिगत सावधानी का विषय नहीं, बल्कि सामूहिक जिम्मेदारी बन चुका है। यदि चेतावनियों को गंभीरता से नहीं लिया गया, तो यह संकट हर वर्ष और गहराता जाएगा। गर्मी का मुकाबला केवल मौसम से नहीं, हमारी तैयारी से तय होगा।
