गौतम चौधरी
युद्ध अक्सर राजनीतिक बहसों, सैन्य रणनीतियों और शक्तिशाली नेताओं के उच्च महत्वाकांक्षा और उस पर आधारित आपसी विवाद से प्रारंभ होता है लेकिन उसका अंत हमेशा आम लोगों की भयंकर पीड़ा व त्रासदि पर जाकर समात्प होती है। ईरान बनाम इज़राइल और संयुक्त राज्य अमेरिका के युद्ध ने एक बार फिर से यह साबित कर दिया है कि देशों के बीच होने वाले संघर्ष केवल सरकारों या सेनाओं तक सीमित नहीं रहते-वे आम लोगों के घरों, स्कूलों और सड़कों तक पहुँच जाते हैं, जहाँ निर्दाेष जनता मारी जाती है। ऐसे समय में, जब दुनिया लगातार विभाजित होती दिख रही है, केवल भू-राजनीति की नहीं, मानवीय गरिमा, न्याय और शांति की तत्काल आवश्यकता पर भी गंभीरता से विचार करना आवश्यक है।
हालिया सैन्य कार्रवाइयों-विशेषकर संयुक्त राज्य अमेरिका और इज़राइल द्वारा ईरान के विरुद्ध हमलों ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तीखी आलोचना को जन्म दिया है। कई वैश्विक नेताओं ने इस युद्ध की खुल कर आलोचना की है। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि यह युद्ध अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन है। यही नहीं उन नेताओं ने चेतावनी देते हुए कहा, ‘‘इस प्रकार की कार्रवाई क्षेत्रीय अस्थिरता को और गहरा कर सकती है।’’ कुछ यूरोपीय नेताओं ने तो यह आशंका भी जताई कि यदि यह प्रवृत्ति जारी रही, तो “नियम-आधारित व्यवस्था” की जगह “शक्ति का कानून” स्थापित हो सकता है, जिससे वैश्विक संस्थाओं की विश्वसनीयता कमजोर पड़ जाएगी।
स्थिति और भी त्रासद तब हो जाती है जब आम नागरिक इसकी कीमत चुकाते हैं। हालिया संघर्षों के दौरान ईरान के एक स्कूल में हुए विस्फोट में सैंकड़ों बच्चों की मृत्यु की खबरें युद्ध की नैतिकता पर गंभीर प्रश्न खड़े करती हैं। ये घटनाएँ याद दिलाती हैं कि जब शक्तिशाली राष्ट्र टकराव में उतरते हैं, तो केवल सैनिक ही नहीं मरते-परिवार उजड़ते हैं, बच्चे अपना भविष्य खो देते हैं और समाज ऐसे घावों के साथ जीने को मजबूर होता है जिन्हें भरने में पीढ़ियाँ लग जाती हैं।
सैन्य आक्रामकता, विशेषकर जब वह भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा से प्रेरित हो, शायद ही कभी मूल समस्याओं का समाधान हो पाता है। इसके विपरीत, यह अविश्वास और आक्रोश को और गहरा बना देता है। यही कारण है कि दुनिया भर में कई लोग शक्तिशाली देशों-विशेषकर संयुक्त राज्य अमेरिका की भूमिका पर गंभीर सवाल उठा रहे हैं। उनके अनुसार, ऐसी हस्तक्षेपकारी नीतियाँ अक्सर मानवीय जीवन से अधिक रणनीतिक प्रभुत्व को प्राथमिकता देती हैं।
हालाँकि, सैन्य आक्रामकता का विरोध करने का अर्थ यह नहीं है कि किसी देश के भीतर हो रहे दमन का समर्थन कर दिया जाए। ईरान की धार्मिक सरकार के द्वारा अपने जनता पर किए जा रहे दमन को भी हल्के में नहीं लिया जा सकता है। यह भी एक गंभीर चुनौती है लेकिन उस चुनौती को बाहरी हस्तक्षेप से खत्म करने की बात बेईमानी है। ईरान में नागरिकों-विशेषकर महिलाओं, प्रगतिशील एवं लोकतांत्रिक कार्यकर्ताओं तथा अल्पसंख्यकों के उपर सत्ता का अत्याचार लंबे समय से आलोचना का कारण रहा है। अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रतिबंध, मनमानी गिरफ्तारियां और कठोर दंड जैसी प्रवृत्तियों का लगातार दस्तावेजीकरण किया है। यह भी चिंता का विषय है।
ईरान में महिलाओं की स्थिति चिंताजनक है। अनिवार्य हिजाब जैसे कानूनों को सख्ती से लागू किया जाता है और इनके खिलाफ आवाज़ उठाने वाली महिलाओं को दंडित किया जाता है। समानता और स्वतंत्रता की मांग करने वाली कार्यकर्ताओं को गिरफ्तारियों और उत्पीड़न का सामना करना पड़ता है। इसके अतिरिक्त, उच्च स्तर की फाँसी की सज़ाएँ, कथित यातनाएँ और अल्पसंख्यकों का उत्पीड़न भी गंभीर चिंता के विषय बने हुए हैं।
यह पूरी स्थिति एक जटिल नैतिक द्वंद्व प्रस्तुत करती है। एक ओर बाहरी सैन्य हमले आम नागरिकों के लिए विनाश लाते हैं, तो दूसरी ओर आंतरिक नीतियाँ उनकी स्वतंत्रता और गरिमा को सीमित करती हैं। न्याय के पक्ष में खड़े होने के लिए इन दोनों सच्चाइयों को स्वीकार करना आवश्यक है। ईरान के लोग शांति और सम्मान के हकदार हैं-न बाहर से गिरते बमों के और न ही भीतर से होने वाले दमन के।
साधारण नागरिक-चाहे तेहरान की कोई माँ हो, इस्फ़हान का कोई छात्र या ग्रामीण क्षेत्र का कोई किसान, वैश्विक टकराव नहीं चाहता। अधिकांश लोग केवल सुरक्षा, स्वतंत्रता और अपने बच्चों के बेहतर भविष्य की कामना करते हैं लेकिन जब राजनीतिक नेतृत्व टकराव का रास्ता चुनता है, तो इसकी कीमत आम लोग ही चुकानी पड़ती है।
इतिहास हमें सिखाता है कि हिंसा किसी भी समस्या का स्थायी समाधान नहीं है। युद्ध शहरों को नष्ट कर सकते हैं, लेकिन शिकायतों को समाप्त नहीं कर सकते। सैन्य शक्ति अस्थायी रूप से आवाज़ों को दबा सकती है, पर विश्वास और मेल-मिलाप नहीं बना सकती। वास्तविक परिवर्तन संवाद, धैर्य और नैतिक साहस से आता है।
दूसरी ओर, वैश्विक तनाव के समय जनमत का ध्रुवीकरण स्वाभाविक है। कुछ लोग सुरक्षा के नाम पर सैन्य कार्रवाइयों का समर्थन कर रहे हैं, तो कुछ केवल पश्चिमी प्रभाव के विरोध में धार्मिक अधिनायकवादी शासन व्यवस्थाओं का महिमामंडन करने में लगे हैं। दोनों ही दृष्टिकोण मानवता के खिलाफ है। न्याय चयनात्मक नहीं हो सकता-मसलन, न युद्ध अपराधों की अनदेखी की जा सकती है, और न ही मानवाधिकार के उल्लंघनों को जायज ठहराया जा सकता है। एक सच्चा मानवीय दृष्टिकोण संतुलन और करुणा की मांग करता है। इसका अर्थ है नागरिकों पर होने वाले हमलों की निंदा करना, साथ ही उन सरकारों के खिलाफ आवाज़ उठाना जो अपने ही लोगों की स्वतंत्रता को सीमित करती हैं।
दक्षिण एशिया और मध्य पूर्व सहित पूरी दुनिया के लिए संदेश स्पष्ट है-शांति ही अंतिम लक्ष्य होना चाहिए। कोई भी विचारधारा या रणनीतिक हित निर्दाेष जीवन से बड़ा नहीं हो सकता। संघर्ष के समय धैर्य अत्यंत आवश्यक है। क्रोध और प्रतिशोध समाज को और हिंसा बना देता है, जबकि धैर्य, संवाद और समाधान का मार्ग खोलता है। शांतिपूर्ण तरीकों से प्राप्त न्याय ही स्थायी होता है।
आगे का रास्ता कूटनीति, जवाबदेही और मानवीय गरिमा पर आधारित होना चाहिए। शक्तिशाली देशों को सैन्य शक्ति के अंधाधुंध प्रयोग पर पुनर्विचार करना होगा और ईरान जैसी सरकारों को अपने नागरिकों-विशेषकर महिलाओं और अल्पसंख्यकों के अधिकारों का सम्मान करना होगा।
अंततः, यह संघर्ष केवल एक राजनीतिक मुद्दा नहीं, बल्कि एक गहरी मानवीय त्रासदी है। हर खबर के पीछे शोक में डूबे परिवार, भयभीत बच्चे और टूटे हुए समुदाय हैं। यदि दुनिया सचमुच इतिहास से सीखना चाहती है, तो उसे शत्रुता के इस चक्र को तोड़ना होगा। किसी भी संघर्ष की सबसे बड़ी जीत दुश्मन की हार नहीं, बल्कि शांति की पुनर्स्थापना होती है। यह केवल धैर्य, करुणा और ईमानदार संवाद के माध्यम से ही संभव है। भारत का सनातन मूल्य भी यही संदेश देता है। विवाद नहीं संवाद से काम लें।
