गुरु-शिष्य का कभी क्षय न हो !

गुरु-शिष्य का कभी क्षय न हो !

अविनाश कुमार सिंह 

भारतीय धार्म चिंतन में सभी प्रकार के मानवीय आयाम और मूल्यों पर विस्तार से मिमांसा प्रस्तुत की गयी है। वह मिमांसा सूत्रों के माध्यम से हमारे सामने प्रस्तुत होता रहा है। पहले तो श्रुति में था और उस श्रुतियों को जानने वाले अधिक संख्या में होते थे। क्योंकि भारतीय चिंतन की यह परंपरा बन गयी थी। बाद के कालखंड में उपाध्यायों ने कब्जा कर लिया और ज्ञान अभिजात्य वर्ग की संपत्ति बन कर रह गयी। हमारे युग में ज्ञान लेखन में है। उस ज्ञान को कोई भी पढ़ और समझ सकता है लेकिन वह ज्ञान बिना अनुभव से संभव नहीं है। हमने भारतीय ज्ञान परंपरा में से कुछ ज्ञान को आपके समक्ष लाने की कोशिश की है। इसमें हमें झारखंड सरकार के पूर्व प्रशासनिक अधिकारी अविनाश कुमार सिंह जी का सहयोग प्राप्त हो रहा है। निम्नलिखित ज्ञान और उसकी व्याख्या उन्हीं के माध्यम से प्रस्तुत हो रही है। यह क्रमशः और लगातार जारी रहेगा। 

तो आइए हम भारतीय ज्ञान परंपरा पर कुछ जानने और उसे समझने की कोशिश करते हैं : –

कठोपनिषद्

कठोपनिषद् उपनिषदों बहुत प्रसिद्ध है। यह कृष्ण यजुर्वेद की कठशाखा के अन्तर्गत है। इसमें नचिकेता और यम के संवाद रुप में परमात्मा के रहस्यमय तत्त्व का बड़ा ही उपयोगी और विशद वर्णन है। इसमें दो अध्याय है और प्रत्येक अध्याय में तीन-तीन वल्लियाँ हैं।

शान्तिपाठ

ॐ सह नाववतु। सह नौ भुनक्तु। सह वीर्यं करवावहै। तेजस्विनावधीतमस्तु मा विद्विषावहै॥

ॐ शांतिः शांतिः शांतिः

भावार्थ एवं व्याख्या : हे परमात्मन्! हम गुरु-शिष्य  दोनों की साथ-साथ सब प्रकार से रक्षा करें। हम दोनों का आप साथ-साथ समुचित रूप से पालन-पोषण करें। हम दोनों साथ-ही-साथ सब प्रकार से बल प्राप्त करें, हम दोनों की अध्ययन की हुई विद्या तेजपूर्ण हो – कहीं किसी से हम विद्या में परास्त न हों और हम दोनों जीवनभर परस्पर स्नेह-सूत्र में बँधे रहें। हमारे अंदर परस्पर कभी द्वेष न हो।               

हे परमात्मन्! तीनों तापों की निवृत्ति हो।

हर हर महादेव।

क्रमशः….

(उक्त मंत्र की पूरी व्याख्या अविनाश कुमार सिंह जी ने की है।) 

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